नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ नाट्यशास्त्रम्
यत् पलायनपरायणस्य ते
याति धूलिरधुना रथोद्धता¹ ॥ ३७ ॥
हे वीर, तुमने पूर्ण रूप से युद्धभूमि को छोड़ दी इस प्रकार तुमने
न तो अपना और न ही मित्रों का हित किया। क्योंकि युद्धभूमि से
भागने वाले तुम्हारे मार्ग से रथों से उठाई गई धूल अब भी उठ
रही है ॥ ३७ ॥
आद्यं तृतीयमन्त्यञ्च सप्तमं दशमं गुरु³।
यस्यास्तु त्रैष्टुभे पादे विज्ञेया स्वागता हि सा ॥ ३८ ॥
स्वागता—यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में पहिला, तीसरा, सातवां तथा
दसवां अक्षर गुरु हो तो 'स्वागता' वृत्त होता है ॥ ३८ ॥
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यथा—अद्य मे सफलमायतनेत्रे
जीवितं मदनसंश्रयभावम्⁴।
आगतासि ⁵भवनं मम यस्मात्
स्वागतं तव वरोरु निषीद ॥ ३९ ॥
आज मेरे विशाल नयनों ने उनका विषय प्राप्त किया और इसी प्रकार
मेरे जीवन तथा प्रेम ने भी, क्योंकि आप मेरे घर पधारी, हे सुन्दरी,
(वरोरू) आपका स्वागत है, अब आप विराजिये ॥ ३९ ॥
षष्ठञ्च नवमञ्चैव ⁶लघूनी त्रैष्टुभे यदि ।
⁷गुरुण्यन्यानि पादे तु सा ज्ञेया शालिनी यथा ॥ ४० ॥
शालिनी—यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में छठा तथा नवां अक्षर लघु
(तथा शेष गुरू) हो तो 'शालिनी' वृत्त होता है ॥ ४० ॥
१. क. पुस्तके उदाहरणान्तरमपि । तद्यथा—
किं त्वया कुमतिसङ्गया सदा नाज्ञयेव सुहृदां प्रियं कृतम् ।
यद् गृहाद्वचनरोषकम्पिता याति तूर्णमबला रथोद्धता ॥
२. तथा—क० ।
३. गुरूणि त्रैष्टुभे पादे यत्र सा स्वागता यथा—क०, ग० ।
४. संश्रितभावम्—क; ग०; संस्कृतभावम्—ख० ।
५ सदनं—क०; ग० । ६. लघु स्यात्—ग० ।
७. चतुर्भिराद्यैर्विच्छेदः—ग० ।