सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पञ्चदशोऽध्यायः २०७
तत्प्राहुः सप्तविधं षट्कारकसंयुतं प्रथितसाध्यम् ।
निर्देशसम्प्रदानोपोदानप्रभृतिसंज्ञाभिः ॥ २४ ॥
यह नाम सात श्रेणियों से तथा छः कारको से युक्त होता है। कभी
कभी यह सिद्ध वाच्यार्थ (प्रथित) तथा कभी-कभी साध्यभूत वाच्यार्थ
(साध्य) वाला होता है। (और जब यह (विभिन्न) प्रत्ययों से युक्त होता है
तो) निर्देश, सम्प्रदान, अपादान प्रभृति संज्ञा को सूचित करता है ॥ २४ ॥
सम्प्रत्यतीतकालक्रियादिसंयोजितं प्रथितसाध्यम् ।
वचनं नागतयुक्तं सुसंदृशसंयोजनविभक्तम् ॥ २५ ॥
जो क्रियाएँ वर्तमान तथा भूतकाल एवं इसके समान समय में होने
वाले कार्य को बतलाने वाले अर्थ से सम्बद्ध शब्द बनाती हैं। वह 'प्रथित'
तथा जो कभी-कभी व्यवस्थित रस में निमित विभेद सम्पन्न शब्द बनाती
हों साध्य कहलाती है।
आख्यात—(क्रिया)
पँश्चशतधातुयुक्तं पञ्चगुणं पञ्चविधमिदं वापि ।
आख्यातं पाठ्यैकृतं ज्ञेयं नानार्थ्याश्रयविशेषम् ॥ २६ ॥
नाम के दो प्रकार (जाति तथा द्रव्य) माने हैं, कात्यायन के मत में एक प्रकार
और जोड़ा गया जिसे 'लिंग' कहते हैं। व्याघ्रपाद आचार्य के मत से संख्या
तथा भाष्यकार पतंजलि के मत से 'कारक' के संयुक्त करने पर नाम के ये पाँच
प्रकार हो जाते हैं। यथा—जाति, द्रव्य, लिङ्ग, संख्या तथा कारक ।
१. सात श्रेणी का अर्थ सात विभक्तियाँ हैं। प्रथित तथा साध्य शब्दों का
आश्रय यह भी है कि सिद्धवाच्यार्थ वाला शब्द जिसका प्रकृति, प्रत्यय आदि से
विभाग करते हुए निर्वचन न किया जा सके 'प्रथित' कहलाता है (अर्थात्
रूढ़ शब्द) तथा साध्य का आशय है कि प्रकृति प्रत्यय आदि से जिस शब्द का
निर्वचन किया जाए तथा अन्तर्निहित अर्थ की अभिव्यक्ति हो सके। इसे हम
दूसरे शब्दों में 'यौगिक' शब्द कह सकते हैं।
२. 'निर्देश' का सम्बन्ध 'कारक' से (प्रतीत होता) है। जैसा कि विवरण
है और विभक्त्यन्त प्रत्यय से इसकी पुष्टि भी होती है।
१. निर्देशसम्प्रदानोपादान—क० ।
२. सम्प्रत्यतीतकालप्रयोजितः क्रियादिसंयोगः प्रथितः—ख०; ग० ।
३. वचनानागत—क०; साध्ये वचनानां यतियुक्तं—ख०; ग० ।
४. सदृशसंयोजन—ख०; ग० । ४. पद्यार्धमेतत् ख० ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
५. पाठ्यमिदं—क० । ६. नामाश्रय—क०; नामार्थसंश्रय विशेषम्—ख० ।

पाँच सौ¹ धातुओं का पच्चीस वर्गों में विभक्त होने वाला क्रिया का
समूह 'आख्यात' कहलाता है । ये पाठ्य या संवादों में संज्ञाओं के आश्रित
अर्थों से संयुक्त की जाती हैं ॥ २६ ॥
उपसर्ग—
प्रातिपदिकार्थयुक्तान्¹ धात्वर्थानुपसृजन्ति² ये स्वार्थैः³ ।
उपसर्गा ह्युद्दिष्टास्तस्मात् संस्कारतस्तस्मिन्⁴ ॥ २७ ॥
जो अपने अर्थों के द्वारा प्रातिपादिक अर्थ सम्पन्न धातु के मूल अर्थ को
विशिष्टार्थ सम्पन्न बना देते हैं उन्हें संस्कार शास्त्र में ( व्याकरण शास्त्र में )
( इसी कारण ) 'उपसर्ग²' कहते हैं ॥ २७ ॥
निपात—
प्रातिपदिकार्थयोगाद्धातुच्छन्दोनिरुक्तयुक्त्या च ।
यस्मान्निपतन्ति पदे तस्मात् प्रोक्ता निपातास्तु ॥ २८ ॥
क्योंकि प्रादिपदिकार्थ के साथ, धातु, छन्द, निर्वचन तथा युक्ति द्वारा
उनके मूलार्थ को फैलाने के लिए संयुक्त होकर आते हैं । ( अतएव पद के
समीप आने के कारण ) इन्हें निपात³ कहते हैं ॥ २८ ॥
१. धातुओं की निश्चित संख्या नहीं बतलाई जा सकती क्योंकि विभिन्न
व्याकरण ग्रन्थों में इनकी अलग-अलग संख्या बतलाई गई है । पाणिनि ने अपनी
धातुओं को दस गणों में विभक्त किया है । परन्तु धातुओं का पच्चीस भागों में
विभाग किसी भी व्याकरण ग्रन्थ में प्राप्त नहीं होता ।
२. उपसर्ग का भरत प्रोक्त स्वरूप निरुक्त ( १।१-३-४ ) में उद्धृत
शाकटायन के विवरण से मिलता है । ( तुलना कीजिए सम्बद्ध दोनों अंशों की । )
उपसर्गों का त्रिविध अर्थद्योतन निम्न श्लोक से स्पष्ट है—
कचिद् भिनत्ति धात्वर्थं क्वचित्तमनुवर्तते ।
विशिनष्टि तमेवार्थमुपसर्गगतिस्त्रिधा ॥
३. पाणिनि के अनुसार अव्यय जो 'च' आदि वर्ग में पठित है 'निपात'
कहलाते हैं । पतंजलि के मत में विभक्ति तथा स्वरों का समानता रखने
वाले अव्यय कारक के कार्य की पूर्ति भी कर देते हैं । द्रष्ट० पात० महा० ३।४।२
( विभक्तिस्वरप्रतिरूपकाश्च भवन्तीति निपातसंज्ञाः )
१. युक्तं—क० । २. नुत्सृजन्ति—ख०; ग० ।
३. स्वार्थैः—ख० । ४. संस्कारशास्त्रेऽस्मिन्—ख०; ग० ।

पञ्चदशोऽध्यायः २०९
प्रत्यय—
प्रत्ययविभागजनिताः प्रकर्षसंयोगस¹त्ववचनैश्च ।
यस्मात् पूरयतेऽर्थान् प्रत्यय उक्तस्ततस्तस्मात् ॥ २९ ॥
जो प्रकर्ष, संयोग तथा भाव (सत्व) के द्वारा शब्दों के आंशिक अर्थों
की पूर्ति करते हैं उन्हें इन विचारों (विश्वासों-प्रत्यय) को विकसित करने के
कारण 'प्रत्यय' कहा जाता है ॥ २६ ॥
तद्धित—
³लोप-प्रकृति-प्रत्यय-विभागसंयोगसत्व⁴-वचनेषु ।
तांस्तान् पूर्यन्तेऽर्था स्तेषु यतस्तद्धितस्तस्मात् ॥ ३० ॥
क्योंकि यह शब्द के अर्थों को—लोप, प्रकृति तथा प्रत्यय के विभाग या
संयोग द्वारा विकसित या पूर्ण करता है तथा उनके अन्तःस्थित (विचारया)
भावाभिप्राय को बतलाता है अतएव 'तद्धित' कहलाता है ॥ ३० ॥
विभक्ति—
एकस्य बहूनां वा धातोलिङ्गस्य⁷ वा पदानां वा ।
यस्माद्विभजन्त्यर्थान् विभक्तयः कीर्तितास्तस्मात् ॥ ३१ ॥
एक या अनेक शब्दों के अर्थों का उनकी मूलधातु या लिङ्ग के
अनुसार विभाग या विभेद करने के कारण 'विभक्ति' कहलाती है ॥ ३१ ॥
१. प्रत्यय की भरत ने व्यापक परिभाषा की है। अभिनवगुप्त ने इस लक्षण
को ऐन्द्रव्याकरण के अनुसार तथा वहीं से लिया हुआ निरूपित किया है। धातु में
अवस्थित अर्थ के बोध में जो सहायक हो उसे सामान्यतः 'प्रत्यय' कहा जाता
है। (येनार्थः प्रतीयते स प्रत्ययः) ।
२. भरतोक्त तद्धित का स्वरूप अन्य व्याकरण ग्रंथों से मेल नहीं खाता ।
३. विभक्ति शब्द का निर्वचन या व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ लेकर यहाँ भरत ने

१. तत्व—क० । २. तांस्तान् पूरयते—क० । ३. लोक—ख०; ग० ।
४. तत्ववचनैस्तु—क० ।
५. ते ते पूर्यन्तेऽर्थाः—क०; तस्मात् पूरयतेऽर्थान्—ख०; ग० ।
६. अर्थान् हि तो यतः—क०; ततो यतः—ख०; ग० ।
७. लिङ्गस्यापदानां वा—ख०; ग० ।
८. विभजन्त्यर्थं यस्मिन्—क०, विभजन्त्यर्थं यस्मात विभक्तयस्तेन ताः
प्रोक्ताः—ख०; ग० ।
१४ ना० शा० द्वि०

२१० नाट्यशास्त्रम्
सन्धि—
वर्णपदक्रमसिद्धः पदैकयोगाच्च वर्णयोगाच्च ।
संन्धीयते तु यस्मात्तस्मादुपदिश्यते सन्धिः ॥ ३२ ॥
जब पृथक्भूत पद, वर्ण या स्वर व्यञ्जन परस्पर शब्द या शब्दों के
समीप आकर मिल जाते हों तो इस सन्धान या जोड़ के हो जाने को
'सन्धि' कहते हैं ॥ ३२ ॥
विंशिष्टास्तु स्वरा यत्र व्यञ्जनं वापि योगतः ।
सन्धीयते पदे यस्मात्तस्मात् सन्धिः प्रकीर्तितः ॥ ३३ ॥
अथवा दो विशिष्ट स्वरों या पदों का क्रम ( यदि ) परस्पर मिल जाता
हो तो उसे भी 'सन्धि' जानो ॥ ३३ ॥
उसके लक्षण को बतलाया गया है । इसी प्रकार का आशय कलापव्याकरण में
दुर्ग सिंह ने भी व्यक्त किया है । यथाः—'अर्थस्य विभजनाद्विभक्तिः'
१. स्वर या व्यंजनों का केवल संयोग या सम्मिश्रण मात्र न तो सन्धि है
न ही यह उसका प्रयोजन है किन्तु ध्वनिगतप्रभाव तथा सम्भाषणगत
आवश्यकता के कारण भी सन्धियाँ होती हैं । इन सन्धियों का पाँच प्रकारों में
विभाजन है और इसी कारण इनकी संज्ञा भी पाँच हैं—यथा—( १ ) स्वर,
( २ ) व्यंजन, ( ३ ) प्रकृतिभाव, ( ४ ) अनुस्वार तथा ( ५ ) विसर्गसन्धि ।
समीप आकर ( समय के लाघवार्थ ) मिलने का कार्य—जो कि पृथक् दो
ध्वनियों के अलग उच्चारण करने पर व्यर्थ ही अधिक समय ले लेता है—यदि
किया गया हो तो सन्धि कहलाता है । यह प्राचीन वैयाकरणों की 'अर्धमात्रा-
लाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणाः' उक्ति के साथ ही सन्धि के उस नियम को
भी—जिसके अनुसार अर्धमात्रा का उच्चारण में व्यवधान होने से उसके पृथक्
उच्चारण के बजाय सम्मिलित उच्चारण ही 'सन्धि' करते हुए किया जाए—इस
प्रकार के सिद्धान्त तथा उनकी स्वाभाविक वृत्ति तथा योजना को समर्थित करता
है । यह सन्धि इसीलिए भी की जाती है कि दो जिससे श्लोकार्थ एकत्र न हों ।
१. वर्णक्रमसंसिद्धः—क०; वर्णक्रमसम्बद्धः—ख०; ग० ।
२. पदैकयोगोऽन्यवर्णयोगाच्च—ख०; ग० ।
३. सन्धीयते च यस्मात्तस्मात् सन्धिः समुद्दिष्ट—ख०; ग० ।
४. पद्यमेतत् ख० ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।

पञ्चदशोऽध्यायः २११
समास—
लुप्त¹विभक्तिर्नाम्नामेकार्थं संहरत्समासोऽपि ।
तत्पुरुषा²दिस्तज्ज्ञैर्निर्दिष्टः षड्‌विधो विप्राः ॥ ३४ ॥
नामों की विभक्तियों का लोप करते हुए एकार्थक पद को जो संक्षेप
करते हुए प्रस्तुत करता हो वह तत्पुरुष आदि छः प्रकारों से युक्त 'समास'
कहलाता है ॥ ३४ ॥
एभिः शब्दविधानैर्विस्तारव्यञ्जना³र्थसंयुक्तैः ।
पदबन्धाः कर्तव्या निब⁴द्धबन्धास्तु चूर्णा वा ॥ ३५ ॥
इस प्रकार शब्दशास्त्र के नियमों को ध्यान में रखते हुए शब्द रचना
करना चाहिए जो गद्य (चूर्ण) निबद्ध बन्ध या पद्यात्मक हो तथा जो
शब्दों के विस्तार और अभिव्यक्ति से पूर्ण या युक्त हो ॥ ३५ ॥
शब्द-द्वैविध्य—
वि⁵भक्त्यन्तं पदं ज्ञेयं नि⁶बद्धं चूर्णमेव च ।
तत्र चूर्णपदस्येह स⁷न्निबोधत लक्षणम् ॥ ३६ ॥
विभक्ति जिस शब्द के अन्त में संयुक्त की जाये उसे 'पद' जानो । यह
दो प्रकार होता है—निबद्ध तथा चूर्णपद । अब मैं चूर्णपद का लक्षण
बतलाता हूँ जिसका गद्य लेखन में उपयोग किया जाता है ॥ ३६ ॥
चूर्णपद—
अनि⁸बद्धपदं छन्दस्त⁹थो चानियताक्षरम् ।
अ¹⁰र्थापेक्ष्यक्षरस्यूतं ज्ञेयं चूर्णपदं बुधैः ॥ ३७ ॥
१. लुप्तविभक्तिर्नाम्ना एकार्थान् संहरन्ति सङ्क्षेपात्—ख०; ग० ।
२. तत्पुरुषादिकसंज्ञैर्निर्दिष्टः षड्‌विधः सोऽपि—ख०; ग० ।
३. व्यञ्जनात्व—ख०; ग० ।
४. वृत्तनिबन्धास्तु—ख०; ग० ।
५. चतुर्विधं पदं तच्च—क०; विभज्यैकं पदं ज्ञेयं—ख०; ग० ।
६. निबन्धं—ख०; ग० ।
७. बहिर्बोधत—ख०; ग० ।
८. अनिबद्धं पदवृन्दं—ख०; ग० ।
९. छन्दो यथेष्टगुरुलाघवम्—क० ।
१०. अर्थापेक्षाक्षरपदं—क०; अर्थापेक्षाक्षरयुतं—ख०; ग० ।

२१२ नाट्यशास्त्रम्
जिसमें किसी निश्चित प्रकार से पदों की संयोजना न हो, जिसमें
अक्षरों की संख्या नियत न हो तथा जो अपने उद्दिष्टार्थ को प्रकट करने के
लिए अनेक वर्ण या पदों को स्वतन्त्रतापूर्वक (रचना में) समाविष्ट कर
सके, तो उसे 'चूर्णपद' शब्द जानो ॥ ३७ ॥
निबद्धपद—
निबद्धाक्षरसंयुक्तं यतिच्छेदसमन्वितम् ।
निबद्धन्तु पदं ज्ञेयं प्रमाणनियतात्मकम् ॥ ३८ ॥
जिसमें पदों तथा अक्षरों का निश्चित क्रम के अनुसार गठन हो, यति
(विच्छेद) समन्वित हो तथा जिसमें अक्षर संख्या का निश्चित प्रमाण रहे
उसे 'निबद्ध' (पद्योपयोगी) शब्द समझना चाहिये ॥ ३८ ॥
छन्द—
एवं नानार्थसंयुक्तैः पादैर्वर्णविभूषितैः ।
चतुर्भिरस्तु भवेद्युक्तं छन्दोवृत्ताभिधानवत् ॥ ३९ ॥
इस प्रकार शब्दों के गठन द्वारा जो पद्य-रचना की जाती है उसमें
चार पाद होते हैं—उसमें अनेक अर्थों का अभिव्यञ्जन रहता है तथा
वर्णों के (गुरु तथा लघु स्वरूपों के) द्वारा यह निर्मित की जाती है। ऐसी
रचना छन्द या वृत्त नाम से अभिहित की जाती है ॥ ३९ ॥
छन्द (वृत्तों) के विभेद—
षड्विंशतिः स्मृतान्येभिः पादैश्छन्दांसि संख्यया ।
सममर्द्धसमञ्चैव तथा विषममेव च ॥ ४० ॥

१. पदच्छेद—ख०; ग० ।
२. प्रमाणनियताक्षरम्—क० ।
३. पदवर्णं—क०; पदैर्वणं—ख०; ग० ।
४. भवेत्पादै—क०; भवेद् वृत्तं—ख०; ग० ।
५. छन्दोवृत्त्यभिधानवत्, छन्दोवृत्तसमाश्रयम्—क० ।
६. स्मृतानीह—ख०; ग० ।
७. पादे—ख०; ग० ।
८. समञ्चार्धसमञ्चैव—ख०; ग० ।

पञ्चदशोऽध्यायः २१३
१छन्दो ज्ञेयं समासेन २त्रिविधं वृत्तमिष्यते ।
छन्दों के एक से २६ संख्या तक के अक्षरों में होने वाले पादों के कारण
२६ भेद हैं। इनके तीन प्रकार और भी है—सम, अर्धसम तथा विषम
वृत्त ॥ ४०-४१ ॥
३नानावृत्तविनिष्पन्ना शब्दस्यैषा तनुः स्मृता ॥ ४१ ॥
४छन्दोहीनो न शब्दोऽस्ति न च्छन्दः शब्दवर्जितम् ५ ।
६एवं तूभयसंयोगो नाट्यस्योद्योतकः स्मृतः ॥ ४२ ॥
यह छन्द—जो कि विभिन्न अक्षरों द्वारा वर्णिक वृत्त का स्वरूप
धारण करता है—शब्दों का ढांचा है। क्योंकि वृत्तहीन कोई शब्द तथा
शब्दहीन कोई वृत्त नहीं होता। ये दोनों परस्पर मिल कर ही नाट्य-
प्रयोग को अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचाते हैं ॥ ४१-४२ ॥
छन्दों के (वर्ण-संख्या के अनुसार पाद वाले) विभेद—
एकाक्षरं भवेदुक्तमत्युक्तं द्वयक्षरं भवेत् ।
७मध्यं त्र्यक्षरमित्याहुः प्रतिष्ठा चतुरक्षरा ॥ ४३ ॥
सुप्रतिष्ठा भवेत् पञ्च षड् गायत्री भवेदिहं ८ ।
९सप्ताक्षरा भवेदुष्णिगष्टौ चानुष्टुबिष्य१०ते ॥ ४४ ॥
नवाक्षरा तु बृहती पङ्क्तिश्चैव दशाक्षरा ।
११एकादशाक्षरा त्रिष्टुब्जगती द्वादशाक्षरा ॥ ४५ ॥
१. छन्दोयुक्तं—ख०; ग० ।
२. निबद्धं—ख० ग० ।
३. नानावृत्तविनिष्पन्नं शब्दमूलं तु तत्स्मृतम्—क० ।
४. न शब्दश्छन्दसा हीनो—क० ।
५. वर्जितः—ख० ग० ।
६. तस्मात्तूभयसंयुक्ते नाट्यस्योद्योतके स्मृते—ख०; ग० ।
७. मध्यमं त्र्यक्षरं प्रोक्तं—क० ।
८. तथैव च—क० ।
९. उष्णिक् सप्ताक्षरकृता त्वष्टाऽनुष्टुप् प्रकीर्तिता—क० ।
१०. उच्यते—क० ।
११. त्रिष्टुबेकादशा ज्ञेया—क० ।

२१४ नाट्यशास्त्रम्
त्रयोदशातिजगती शक्वरी तु चतुर्दश ।
दशपञ्चातिशक्वर्या अष्टिः स्यात् षोडशाक्षरा ॥ ४६ ॥
तथो सप्तदशात्यष्टिः धृतिरष्टादशाक्षरा ।
एकोनविंशातिधृतिः कृतिर्विंशतिरेव च ॥ ४७ ॥
प्रकृतिश्चैकविंशत्या द्वाविंशत्याकृतिस्तथा ।
विकृतिः स्यात्त्रयोविंशा चतुर्विंशापिँ संकृतिः ॥ ४८ ॥
पञ्चविंशत्यभिकृतिः षड्विंशत्यक्षरोत्कृतिः ।
(अक्षर गणना के अनुसार होने वाले छन्दों के भेदों में) एक अक्षर
के पाद वाला वृत्त 'उक्ता', दो अक्षरों वाला 'अत्युक्ता'. तीन अक्षरों वाला
'मध्या', चार अक्षरों वाला 'प्रतिष्ठा', पाँच अक्षरों वाला 'सुप्रतिष्ठा', छः
अक्षरों का 'गायत्री', सात अक्षरों का 'उष्णिक्', आठ अक्षरों का 'अनुष्टुप्',
नौ अक्षरों का 'बृहती', दस अक्षरों का 'पंक्ति', ग्यारह अक्षरों का 'त्रिष्टुप्'
बारह अक्षरों का 'जगती', तेरह अक्षरों का 'अतिजगती', चौदह अक्षरों
का 'शक्वरी', पन्द्रह अक्षरों का 'अतिशंकरी', सोलह अक्षरों का 'अष्टि',
सत्रह अक्षरों का 'अत्यष्टि', अट्ठारह अक्षरों का 'धृति', उन्नीस अक्षरों का
'अतिधृति', बीस अक्षरों का 'कृति', इक्कीस अक्षरों का 'प्रकृति', बाईस
अक्षरों का 'आकृति', तेईस अक्षरों का 'विकृति', चौबीस अक्षरों का
'संकृति', पच्चीस अक्षरों का 'अतिकृति' तथा छब्बीस अक्षरों का
'उत्कृति' होता है ॥ ४३-४९ ॥
अतोऽधिकाक्षरं छन्दो मालावृत्तमिति स्मृतम् ॥ ४९ ॥
१. अतिशक्करी पञ्चदश षोडशाष्टिः प्रकीर्तिता—क० ।
२. अत्यष्टिः स्यात् सप्तदश—क० ।
३. एकाधिका चातिधृतिः—क० ।
४. स्त्वेकविंशत्या—क० ।
५. विकृतिश्च त्रयो—ग० ।
६. चतुर्विंशा च—ख०; ग० ।
७. षड्विंश चोत्कृतिर्भवेत्—क० ।
८. यत् स्यात्—क०; यत्तु—ख०; ग० ।
९. तदिष्यते—ख०; ग० ।

पञ्चदशोऽध्यायः २१५
छन्दसाम्तु तथो¹ होते भेदाः प्रस्तारयोगतः ।
असंख्येय²प्रमाणानि वृत्तान्याहुरतो बुधाः ॥ ५० ॥
गायत्रीप्रभृतित्वेषां प्रमाणं सम्प्रवक्ष्यते³ ।
प्रयोगजानि सर्वाणि प्रायँशो⁴ न भवन्ति हि ॥ ५१ ॥
इससे अधिक अक्षरों के पाद वाले छन्द 'मालावृत्त' कहलाते हैं । छन्दों
के प्रस्तार के (योग) द्वारा अनेक भेद बनते हैं—जिन्हें बुधजन जाने ।
परन्तु इनकी संख्या गणना से परे है । गायत्री तथा अन्य कुछ छन्दों की
प्रस्तारगत संख्या या प्रमाण को ही यहाँ हम बतला रहे हैं । क्योंकि छन्दों
के ये सभी भेद उपयोग में नहीं आते ॥ ४९-५१ ॥
वृत्ता॑⁵नि च चतुःषष्टि गायत्र्यां कीर्तितानि तु ।
शतं विंशतिरष्टौ च वृत्तान्युष्णिग् ह्यथोच्यते⁶ ॥ ५२ ॥
षट्पञ्चाशच्छते⁷ द्वे च वृत्तानामप्यनुष्टुभि⁸ ।
शतानि पञ्च वृत्तानां बृहत्यां⁹ द्वादशैव तु ॥ ५३ ॥
पङ्क्त्यां¹⁰ सहस्रं वृत्तानां चतुर्विंशतिरेव तु ।
त्रैष्टुभे¹¹ द्वे सहस्रे च चत्वारिंशत्तथाष्ट च ॥ ५४ ॥
१. भास्कराचार्य ने लीलावती में छन्दों के प्रस्तारजन्य भेदों को बनाने की
गणितप्रक्रिया बतलाई है । (दे० ली० व० ख० ८४)
१. भवेदेषां भेदोऽनेकविधः पृथक्—ख०; ग० ।
२. असंख्यपरि—ख०; ग० ।
३. संविधीयते—ख०; ग० ।
४. प्रायस्तानी—क०; ग० ।
५. वृत्तानां हि चतुष्षष्टिगायत्री परिकीर्तिता—ख०; ग० ।
६. न्युष्णिगथोच्यते—ख० ।
७. छतं—ख०; ग० ।
८. प्यनुष्टुभः—ख०; ग० ।
९. बृहत्या—क० ।
१०. पङ्क्तेः—क०; ग० ।
११. त्रिष्टुभो द्वि—क० ।

२१६ नाट्यशास्त्रम्
सहस्राण्यथ चत्वारि नवतिश्च षडुत्तरा ।
जगत्यां समवर्णानां वृत्तानामिह सर्वशः ॥ ५५ ॥
शतमष्टौ सहस्राणि द्वयधिका नवतिः पुनः ।
जगत्यामतिपूर्वायां वृत्तानां संर्वेशो भवेत् ॥ ५६ ॥
शतानि त्रीण्यशीतिश्च सहस्राण्यपि षोडश ।
वृत्तानि चैव चत्वारि शकर्याः परिसंख्यया ॥ ५७ ॥
द्वात्रिंशत्तु सहस्राणि सप्त चैव शतानि च ।
अष्टौ षष्टिश्च वृत्तानि ह्याश्रयन्त्यतिशकरीम् ॥ ५८ ॥
पञ्चषष्टि सहस्राणि सहस्रार्धन्तु संख्यया ।
षड्विंशच्चैव वृत्तानि तथाष्ट्यां गदितानि तु ॥ ५९ ॥
एकत्रिशत्सहस्राणि वृत्तानाञ्च द्विसप्ततिः ।
तथा शतसहस्रञ्च छैन्दस्यत्यष्टिसंज्ञिते ॥ ६० ॥
धृत्यामपि हि पिण्डेन वृत्तान्याकलितानि तु ।
तैर्ज्ञैः शतसहस्रे द्वे शतमेकं तथैव च ॥ ६१ ॥
द्विषष्टिश्च सहस्राणि चत्वारिंशच्च योगतः ।
चत्वारि चैव वृत्तानि ⁸समसंख्याश्रयाणि तु ॥ ६२ ॥
अतिधृत्यां सहस्राणि चतुर्विंशतिरेव च ।
तथा शतसहस्राणि पञ्चवृत्तशतद्वयम् ॥ ६३ ॥
अष्टाशीतिश्च वृत्तानि वृत्तज्ञैः कथितानि तु ।
कृतौ शतसहस्राणि दश प्रोक्तानि सङ्ख्यया ॥ ६४ ॥
१. समपादानां—क०; जगत्यामतिपूर्वायां—ग० ।
२. परिमाणतः—क०; ग० ।
३. वृत्तानां संश्रयन्त्यतिशकरीम्—क० ।
४. तथाष्टौ—क० ।
५. स्यादत्यष्टौ परिसंख्यया—क० ।
६. वृत्तमाकलितं मया—ख०; ग० ।
७. तथा—ख०; ग० ।
८. शतसंख्यानि यानि तु—ख०; ग० ।

चत्वारिंशत्तथाष्टौ च सहस्राणि शतानि च ।
पञ्चषट्सप्ततिश्चैव वृत्तानां १परिमाणतः ॥ ६५ ॥
तथा शतसहस्राणां प्रकृतौ विंशतिर्भवेत् ।
सप्त वै गदितान्यत्र नवतिश्चैव सङ्ख्यया ॥ ६६ ॥
सहस्राणि शतञ्चैकं द्विपञ्चाशत्तथैव च ।
वृत्तानि परिमाणेने वृत्तज्ञैः गदितानि तु ॥ ६७ ॥
चत्वारिंशत्तथैकञ्च सहस्राणां शतानि तु ।
तथा चेह सहस्राणि नवतिश्चतुरोत्तरा ॥ ६८ ॥
शतत्रयं समाख्यातं ह्याकृत्याञ्चतुरोत्तरम् ।
ज्ञेयं शतसहस्राणामशीतिस्त्र्यधिका बुधैः ॥ ६९ ॥
अष्टाशीतिसहस्राणि वृत्तानां षट्शतानि च ।
अष्टौ चैव तु वृत्तानि विकृत्यां गदितानि तु ॥ ७० ॥
तथा शतसहस्राणि सप्तषष्टिश्च सप्ततिः ।
सप्त चैव सहस्राणि षोडश द्वे शते तथा ॥ ७१ ॥
कोटिश्चैवेह वृत्तानि सङ्कृतौ कथितानि वै ।
तथा शतसहस्राणि पञ्चत्रिंशच्च संख्यया ॥ ७२ ॥
तिस्रः कोट्यः सहस्राणि चतुष्पञ्चाशदेव च ।
१. प्रविभागशः—क० ।
२. शतसहस्राणि—क० ।
३. कलितानि तु । विंशतिर्नवतिश्चैव सप्त चैव हि संख्यया—क० ।
४. प्रविभागेन—क० ।
५. बुधैः शतसहस्राणि चत्वारिंशत्ततः परम् । नवतिश्चैव चत्वारि सहस्राणि
शतत्रयम् । चत्वारि चैव वृत्तानि कथितान्याकृतौ बुधैः ॥—क० ।
६. तथा शतसहस्राणामशीतित्रिकसंयुता । अष्टाशीति सहस्राणि षडष्टौ च
शतानि च । वृत्तानि विकृतौ छन्दस्युद्दिष्टानीह संख्यया—क० ।
७. कोटिष्षडधिका नित्यं सप्तसप्ताधिका पुनः । सप्त चैव सहस्राणि वृत्ता-
नाञ्च शतद्वयम् । षोडशोत्तरमाख्यातं सङ्कृत्यां परिमाणतः ॥—क० ।
८. कोटित्रयञ्चाभिकृत्यां पञ्चत्रिंशद्विरन्वितम् । पञ्चाशद्भिः सहस्रैस्तु
चतुर्भिरधिकैस्तथा । चतुष्टयं शतानां च द्वात्रिंशद्भिः समन्वितम् ।—क० ।

२१८ नाट्यशास्त्रम्
शतानि चत्वारि तथा द्वात्रिंशत् प्रविभागतः ॥ ७३ ॥
वृत्तान्यभिकृतौ चैव छन्दोज्ञैः कथितानि वै ।
षट्कोट्यस्तु सहस्राणां शतानि ह्येकसप्ततिः ॥ ७४ ॥
अष्टौ चैव सहस्राणि शतान्यष्टौ तथैव च ।
चतुष्षष्टिस्तु वृत्तानि ह्युत्कृतावपि सङ्ख्यया ॥ ७५ ॥
उक्ताद्युत्कृतिजातानि वृत्तसंख्याविचक्षणैः ।
एतेन च विकल्पेन वृत्तान्येतानि निर्दिशेत् ॥ ७६ ॥
सर्वेषां छन्दसामेवं वृत्तानि कथितानि वै ।
तिस्रः कोट्यो दश तथा सहस्राणां शतानि च ॥ ७७ ॥
चत्वारिंशत्तथा द्वे च सहस्राणि दशैव तु ।
सप्तभिः सहितान्येव सप्तचैव शतानि च ॥ ७८ ॥
( इन भेदों में ) गायत्री छन्द के वृत्तों का प्रमाण ( चौसठ ) ६४,
उष्णिक् छन्द के वृत्तों का प्रमाण ( एक सौ अट्ठाईस ) १२८, अनुष्टुप् वृत्त
की संख्या ( दो सौ छप्पन ) २५६, बृहती की ५१२, पंक्ति की १०२४,
त्रिष्टुप की २०४८, जगती की ४०९६, अतिजगती छन्द की ८१९२, शक्वरी
की १६३८४, अतिशक्वरी की ३२७६८, अष्टि की ६५५३६, अत्यष्टि की
१३१०७२, धृति की २६२१४४, अतिधृति की ५२४२८८, कृति की
१०४८५७६, प्रकृति की २०९७१५२, आकृति की ४१९४३०४, विकृति की
८३८८६०८, संकृति की १६७७७२१६, अतिकृति की ( अभिकृति की )
३३५५४४३२ तथा उत्कृति की प्रमाण संख्या ६७१०८८६४ हो जाती है ।
इस प्रकार क्रम से उत्कृति आदि छन्दों की ( प्रस्तारगत ) संख्या बतलायी
१. षट्कोट्यस्तु तथोत्कृत्यां लक्षाणामेकसप्ततिः । चतुःषष्टि शतान्यष्टौ सहस्रा-
ण्यष्ट एव तु ।—क०; ख० ।
२ सर्वेषां छन्दसां पिण्डं कोट्योऽत्र त्रयोदश । शतानि सप्त सप्तैव सहस्राणि
दशैव च । तथा शतसहस्राणां द्विचत्वारिंशदत्र हि । षड्विंशतिश्च वृत्तानामित्यर्थं
चानन्तमुच्यते ( चान्यत् समुच्यते—ख०, ग० )—क० ।
३. वृत्तांशं कथितं मया—ख०; ग० ।
४. कोट्यस्त्रयोदश तथा चत्वारिंशद्वयं तथा । ज्ञेयं शतसहस्राणां ततो दश
च सप्त च । सहस्राणि ततः सप्तशतानि प्रविभागशः । षड्विंशति च वृत्तानि
वृत्तसंख्याविचक्षणैः ।—क० ।

पञ्चदशोऽध्यायः २१९
गयी, जिनकी इसी के अनुसार योजना करनी चाहिये। इन सभी छन्दों
की सम्पूर्ण प्रमाण-संख्या का योग १३४२१७७२६ होता है ॥ ५२-७८ ॥
छन्दों की विभेदक अन्य पद्धति—
षड्विंशतिरिहान्यानि व्याख्यातानि समासतः ।
समानि गणनायुक्तिमाश्रित्य कथितानि वै ॥ ७९ ॥
सर्वेषां छन्दसामेवं त्रिकैर्वृत्तं प्रयोजयेत् ।
एकं वा विंशतिं वापि सहस्रं कोटिरेव वा ॥ ८० ॥
ज्ञेया ह्यष्टौ त्रिकास्तत्र संज्ञाभिः स्थानमक्षरम् ।
त्रीण्यक्षराणि विज्ञेयस्त्रिकोऽशः परिकल्पितः ॥ ८१ ॥
गुरुलध्वक्षरकृतः सर्ववृत्तेषु नित्यशः ।
अभी मैंने गणना प्रमाण के द्वारा २६ अक्षरों तक के छन्दों के भेदों
को बतलाया। इन छन्दों या वृत्तों का त्रिकों (गणों) के द्वारा गठन किया
जाता है। चाहे ये वर्णवृत्त एक, बीस, सहस्र या करोड़ विभेदों को धारण
किये हों किन्तु सामान्यतः इन वृत्त या वृत्तों के स्वरूपगठन में यहाँ गणों
का नियमविधान रहता है तथा इसी से सारा काम चलता है।
ये गण आठ हैं जो तीन अक्षरों से निर्मित होते हैं। इनका अपने
स्वरूपानुसार पृथक्-पृथक् नाम रहता है। गुरु तथा लघु वर्णों के तीन
अक्षरों से निर्मित 'गण' कहलाते हैं तथा इन्हीं से प्रत्येक छन्द का आकार
बनता है। इन्हें 'त्रिक' भी कहते हैं ॥ ७९-८२ ॥
गुरुपूर्वो भकारः स्यान्मकारस्तु गुरुत्रयम् ॥ ८२ ॥
जकारो गुरुमध्य॑स्तु सकारोऽन्तगुरुस्तथा ।
लघुमध्यस्तु रेफः स्यात्तकारोऽन्तलघुस्तथा ॥ ८३ ॥
१. एतेषां तु पुनर्ज्ञेयं त्रिकैर्वृत्तप्रवर्तनम् । एकं वा विंशतिर्वापि सहस्रं कोटिरेव
च । सर्वेषां छन्दसामेवं वृत्तानां वा द्विजोत्तमाः । ज्ञेयास्त्वष्टौ त्रिकास्तत्र स्वसं-
ज्ञाभिः पृथक्-पृथक् ॥—ख०; ग० ।
२. मकारो गुरुकत्रयम्—क०; मकारस्तु गुरुत्रिकम्—ख०; ग० ।
३. गुरुमध्यस्थः—ख०; ग० ।
४. लघुमध्यस्थितो रेफः—ख० ग० ।
५. सकारोऽन्तलघुस्तथा—ख०; ग० ।

२२० नाट्यशास्त्रम्
लघुपूर्वो यकारस्तु नकारैस्तु लघुत्रयम् ।
इन त्रिकों में यदि आदि गुरु हो तो भगण ( ऽ।। ), तीनों गुरु हों तो
मगण ( ऽऽऽ ), गुरु मध्य में हो तो जगण ( ।ऽ। ), अन्त में गुरु हो तो
सगण ( ।।ऽ ), मध्य में लघु हों तो रगण ( ऽ।ऽ ), अन्त में लघु हो तो
तगण ( ऽऽ। ), आदि में लघु हो तो यगण ( ।ऽऽ ) तथा तीनों लघु होने
पर नगण ( ।।। ) कहलाता है ॥ ८२-८४ ॥
एते ह्यष्टौ त्रिकौ नाम्ना विज्ञेयौ ब्रह्मसम्भवाः ॥ ८४ ॥
लाघवार्थं पुनरमी छन्दोमानमवेक्ष्य च ।
५एभ्यो विनिर्गताश्चान्या जातयोऽथ समादयः ॥ ८५ ॥
अस्वराः सस्वराश्चापि प्रोच्यन्ते वृत्तलक्षणैः ।
गुर्वैकं गितिविज्ञेयं तथा लघु लितिस्मृतम् ॥ ८६ ॥
ये आठ 'त्रिक' ( गण ) हैं—जो ब्रह्मा से उत्पन्न हुए। ये गण छन्द-
शास्त्र में लाघव तथा छन्दों के प्रमाण बतलाने के लिए निर्मित किये
गये हैं । ( इन्हीं से समादि वृत्त ) सम, अर्धसम तथा विषम और जाति
( आर्यादि मात्रागणना के लक्षण वाली ) की उत्पत्ति हुई । ये छन्द के
लक्षण-वेत्ताओं द्वारा सस्वर तथा अस्वर रूप में ( भी ) प्रयुक्त किये जाते
हैं । यहाँ एक दीर्घवर्ण को 'ग्' तथा लघु वर्ण को 'ल्' के संकेत द्वारा
समझना भी चाहिये ॥ ८४-८६ ॥
नियतः पदविच्छेदो यतिरित्यभिसंज्ञिता ।
गुरुर्दीर्घं प्लुतश्चैव संयोगपरमेव च ॥ ८७ ॥
सानुस्वारविसर्गश्च तथान्त्यश्च लघु क्वचित् ॥ ८८ ॥
१. नकारश्च—क० ।
२. त्रिका ज्ञेया—क० । ३. प्राज्ञैर्विज्ञेया—क०; ख० ।
४. मपेक्ष्य—क० ।
५. इदं श्लोकार्थं ख०-ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
६. इच्चैव—ख०; ग० ।
७. लक्षणम्—क०; लक्षणे—ख० ।
८. त्यभिधीयते—ख०; ग० ।
९. अस्मात् परं कपुस्तके ।

पञ्चदशोऽध्यायः २२१
सम्पद्वीरामपादश्च देवै¹तास्थानमक्षरम् ।
²वर्णः स्वरा विधिर्वृत्तमिति छन्दोगतो विधिः ॥ ८९ ॥
(छन्दों में) दो शब्दों (पदों) का निश्चित स्थान पर पृथक् या
विच्छिन्न रहना 'यति' या विराम कहलाता है। दीर्घ, प्लुत, अनुस्वार
तथा विसर्ग से युक्त होने पर तथा संयुक्ताक्षर के पूर्व का वर्ण गुरु होता है
तथा कभी-कभी पादान्त में वर्ण गुरु तथा कभी लघु हो जाता है।
छन्दोविधान में सम्पद्, विराम, पाद, देवता, स्थान, अक्षर, वर्ण,
स्वर, विधि तथा वृत्त होते हैं ॥ ८७-८९ ॥
सम्पद—
नैवा³तिरिक्तं हीनं वा यत्र सम्पद्यतेऽक्षरम् ।
विधाने छन्दसामेषा सम्पदित्य⁶भिसंज्ञिता ॥ ९० ॥
जिस छन्द में वर्णों की संख्या न अधिक और न कम हो उस
नियमानुसार पूर्ण छन्द को 'सम्पद' जानो ॥ ९० ॥
विराम—
यत्रार्थस्य समाप्तिः स्यात् स विराम इति स्मृतः ।
छन्द में उद्दिष्ट अर्थ की समाप्ति हो जाना 'विराम' कहलाता है।
पाद—
पादश्च⁷ पद्यतेर्धातोश्चतुर्भागः प्रकीर्तितः ॥ ९१ ॥
'पाद' शब्द पद् धातु से निष्पन्न होता है। छन्द का एक चौथाई भाग
'पाद' कहलाता है ॥ ९१ ॥
१. दैवतस्थानमक्षरम्—ग० ।
२. वर्णस्वराधिकैः--क०; वर्णस्वरोऽधिकं—ग० ।
३. हीनं नैवातिरिक्तञ्च यत्तु स्यात् पादयोगतः ।
विधाने छन्दसामस्मिन् सा हि सम्पदुदाहृता ॥—क० ।
४. क्रमः—ग० ।
५. विविधा—क० ।
६. त्यभिधीयते—क० ।
७. पादस्य—क० ।
८. गत्यर्थात् सम्प्रकीर्तितः—क०, चतुर्भाग इति स्मृतः—ग० ।

२२२ नाट्यशास्त्रम्
छन्दों के अधिदेवता—
अग्न्यादि दैवतं प्रोक्तम्—
अग्नि आदि इन छन्दों (तथा गणों) के अधिकारी देव होते हैं।
स्थान—
स्थानं द्विविधमुच्यते ।
शरीराश्रयसम्भूतं दिगोश्रयमथापि वाँ ॥ ९२ ॥
शरीर तथा दिशाओं के आश्रित रहने से 'स्थान' दो प्रकार का
होता है ॥ ९२ ॥
ह्रस्वं दीर्घं प्लुतञ्चैव त्रिविधं चाक्षरं स्मृतम् ।
श्वेतादयस्तथा वर्णाः विज्ञेयाः छन्दसामिह ॥ ९३ ॥
अक्षर—ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत (नामक) तीन प्रकार के अक्षर होते हैं।
वर्ण—छन्दों के श्वेत आदि वर्ण होते हैं ॥ ९३ ॥
स्वर—
तारश्चैव हि मन्द्रश्च मध्यैमश्च त्रिधा स्वरैः ।
ध्रुवाविधाने चैर्वास्य सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ ९४ ॥
तार, मन्द तथा मध्यनामक तीन भेद स्वरों के (गेय-पदों के उपयोगार्थ)
जानो। स्वरों का विशेष वर्णन ध्रुवा-विधान (ना० शा० अ० ३२) में किया
जायगा ॥ ९४ ॥
१. देवा ह्यग्न्यादयः प्रोक्ताः—क० ।
२. ऋक्सामाश्रयमेव च—क०; दिशाश्रय—ख०; जिह्वाश्रय—ग० ।
३. अस्मात्परं क० पुस्तके ।
शारीरं मन्त्रसम्भूतं छन्दो गायत्रसंज्ञितम् ।
क्रुष्टे मध्यन्दिनं प्रोक्तं त्रैष्टुभं परिकीर्त्यते ।
तृतीयसवनञ्चापि शीर्षव्यं जागतं हि तत् ॥
इति सार्धः श्लोको लभ्यते ।
४. प्लुतं दीर्घञ्च ह्रस्वञ्च—क० ।
५. ह्यक्षरं—क० ।
६. मध्यश्च त्रिविधः स्वरः—क० ।
७. स्मृतः—क० ।
८. चैतेषां—क० ।

पञ्चदशोऽध्यायः २२३
विधि—
विधिर्गण१कृतश्चैव तथा चार्थकृतोऽपि च ।
गण तथा अर्थ के अनुसार किया गया कार्य 'विधि' या नियम
कहलाता है ।
वृत्त के तीन प्रकार—
वृत्तमर्धसमश्चैव समं विषममेव च ॥ ९५ ॥
वर्णिक छन्द के तीन प्रकार हैं—सम, अर्धसम तथा विषम-वृत्त ॥ ९५ ॥
छन्दसो यस्य ३पादे स्याद्धीनं वाधिकमेव वा ।
अक्षरं तन्निवृत् प्रोक्तं भुरुक् चेति द्विजातिभिः५ ॥ ९६ ॥
अक्षराभ्यां यदा६ द्वाभ्यामधिकं हीनमेव वा ।
तच्छन्दो ७नामतो ज्ञेयं स्वराडथ विराडपि ॥ ९७ ॥
जिस छन्द के पाद में अक्षर की कमी या वृद्धि हो जाय उसे (क्रमशः)
'निवृत्' व 'भुरुक्' कहते हैं । इसी प्रकार छन्द के पाद में दो अक्षरों की
कमी या वृद्धि हो जाने पर उसे स्वराट् या विराट् कहते हैं ॥ ९६–९७ ॥
सर्वेषामेव वृत्तानां तज्ज्ञैर्ज्ञेया गणास्त्रिकाः ।
दिव्यौ दिव्येतरैश्चैव दिव्यमानुष एव च ॥ ९८ ॥
सभी वर्णवृत्तों की तीन श्रेणियाँ होती हैं । दिव्य, दिव्येतर, ( मानुष )
तथा दिव्यमानुष ॥ ९८ ॥
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च ।
त्रिष्टुप् च जगती चैव दिव्यो१० ऽयं प्रथमो गणः ॥ ९९ ॥
१. कालकृतश्चापि तथा चैवार्थतो भवेत्—क० । विधिः कालकृतश्चैव तथै-
वार्थकृतो—ग० ।
२. विषमं सममेव वा—क० ।
३. पादः—क० ।
४. वृत्तं निवृदिति प्रोक्तं—क० ।
५. द्विजोत्तमाः—क० ।
६. सदा—क० ।
७. नाम तत्—क० ।
८. गणास्त्रयः—ख० ।
९. दिव्यतरश्चैव—ख० ।
१०. दिव्यस्तु—क० ।

२२४ नाट्यशास्त्रम्
गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, त्रिष्टुप् तथा जगती दिव्यश्रेणी
के अन्तर्गत आते हैं ॥ ९९ ॥
तथातिजगती चैव शक्करी ह्यतिशक्करी।
अष्टिरत्यष्टिरपि च धृतिश्चातिधृतिर्गणः ॥ १०० ॥
अतिजगती, शक्करी, अतिशक्करी, अत्यष्टि, धृति तथा अतिधृति
द्वितीय (दिव्येतर) श्रेणी में समाविष्ट किये जाते हैं ॥ १०० ॥
कृतिश्च प्रकृतिश्चैव ह्याकृतिर्विकृतिस्तथा।
सङ्कृत्यभिकृतीश्चैव ह्युत्कृतिर्दिव्यमानुषः ॥ १०१ ॥
कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, संकृति, अभिकृति तथा उत्कृति—
दिव्यमानुष श्रेणी के होते हैं ॥ १०१ ॥
इति छन्दांसि यानीह मयोक्तानि द्विजोत्तमाः।
वृत्तान्येतेषु नाट्येडस्मिन् प्रयोज्यानि निबोधत ॥ १०२ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे वाचिकाभिनये
छन्दोविधानं नाम पञ्चदशोऽध्यायः।
❧❦❧
हे ब्राह्मणो, यहाँ मैंने छन्दोविधान बतलाया। अब उनका नाटकों में
व्यवहारार्थ लक्षण अगले अध्याय में बतलाया जायगा। आप इसे ध्यान
से सुनिये ॥ १०२ ॥
नाट्यशास्त्र का 'छन्दोविधान' नामक १५ वाँ अध्याय समाप्त
—>०<—
१. (१०१) यहाँ सत्रह श्लोक अधिक प्राप्त होते हैं। ये प्रक्षिप्त (प्रतीत)
होने के कारण मूल पाठ में नहीं दिये गये। मूल सहित इन श्लोकों का अर्थ आगे
परिशिष्ट में दिया जा रहा है।

१. चातिशक्करी—ग०।
२. व्याकृति—ख०; ग०।
३. मानुषा—ख०; ग०।
४. छन्दांस्येतान्यथोक्तानि मयैवं तु द्विजोत्तमाः—क०।
५. चतुर्दशोऽध्यायः—क०; ख०।

षोडशोऽध्यायः
वृत्तविधानाध्यायः
छंन्दांस्येवं हि यानीह मयोक्तानि द्विजोत्तमाः ।
वृत्तानि तेषु नाट्येऽस्मिन् प्रयोज्यानि निबोधत ॥ १ ॥
हे मुनियों, इस प्रकार मैंने जिन छन्दों को पहिले बतलाया था अब
उनका नाट्य-प्रयोग के व्यवहारार्थ लक्षण सुनिये ॥ १ ॥
आद्ये पुनरन्त्ये ³द्वे द्वे गुरूणी चेत् ।
सा⁴ स्यात्तनुमध्या गायत्रसमुत्था ॥ २ ॥
तनुमध्या—यह गायत्री छन्द के वर्ग में आता है। इसके प्रत्येक पाद
में प्रथम दो तथा अन्तिम वर्ण गुरु होता¹ है ॥ २ ॥
यथा—संत्यक्तविभूषा भ्रष्टाञ्जननेत्रा ।
हस्तार्पितगण्डा किं⁶ त्वं तनुमध्या ॥ ३ ॥
हे कृशोदरि, तुमने अपने गहनों को क्यों निकाल दिया। तुम्हारी
आंखें काजल से क्यों हीन हैं और तुम अपने कपोलों को हाथों के सहारे
क्यों थामें हुए हो ॥ ३ ॥
लघुगण आदौ⁷ भवति चतुष्कः ।
गुरुयुगमन्त्ये मकरेकशीर्षा ॥ ४ ॥
मकरशीर्षा—यदि प्रारम्भ के चार वर्ण लघु तथा अन्तिम दो वर्ण गुरु
हों तो ( गायत्री छन्द के वर्ग में ) मकरशीर्षा९ नामक वृत होता है ॥ ४ ॥
१. इस वृत्त की तरह अन्य वृत्तों के लक्षण भी वर्णित वृत्त के उदाहरण हो
सकते हैं। यह क्रम आगे भी देखा जा सकता है।
२. वृत्तरत्नाकर तथा प्राकृत-पैंगल आदि छन्दोग्रन्थों में इस छन्द का नाम
'शशिवदना' तथा लक्षण उपर्युक्त ही दिया गया मिलता है।
१. इति च्छन्दांसि यानीह—ख०; ग० ।
२ वृत्तान्येतानि—क०; वृत्तान्येतेषु—ख०; ग० । ३. पादे—क० ।
४. मध्ये लघूनी चेद्वृत्तं तनुमध्या—क०; वृत्तं तनुमध्या—ग० ।
५. वक्त्रा—ग० । ६. किं त्वं तनुमध्ये—क; किञ्चित्तनुमध्या ग० ।
७. आद्यो—ख०; ग० । ८. मन्ते—ग० । ९. मधुकरशीर्षा—क० ।
१५ ना० शा० द्वि०

'.
Wait, why did I think 'दो'?
Look at the mark above: that mark is the prosodic mark '–' from above!
Wait! The prosodic marks are:
Above शो: –
Above भ: ˘
Above ते: –
Above हृ: –
Above द्य: ˘
Above या: –
Wait, are there prosodic marks above षट्पदाविद्धया too?
No, the marks – ˘ – – ˘ – are ONLY above "शोभते हृद्यया"!
Wait, then what is that stroke above 'द'?
Look at line 17: "षट्पदोविद्धया" or "षट्पदाविद्धया"?
Ah, look at the character:
द + ो = दो!
Wait, if it's 'दो', then षट्-प-दो-विद्-ध-या:
षट् (–) प (˘) दो (–) विद् (–) ध (˘) या (–)!
'दो' is ALSO guru (–)!
Both 'दा' and 'दो' are guru!
Wait, but is it 'दो' or 'दा'?
Look at "षट्पदोविद्धया" vs "षट्पदाविद्धया":
Look at the top: there is an o-matra stroke pointing to the left!
Wait, look at footnote 2: "२. षटपदाबद्वया—क० ।"
Notice the footnote says