नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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जिसमें किसी निश्चित प्रकार से पदों की संयोजना न हो, जिसमें
अक्षरों की संख्या नियत न हो तथा जो अपने उद्दिष्टार्थ को प्रकट करने के
लिए अनेक वर्ण या पदों को स्वतन्त्रतापूर्वक (रचना में) समाविष्ट कर
सके, तो उसे 'चूर्णपद' शब्द जानो ॥ ३७ ॥
निबद्धपद—
निबद्धाक्षरसंयुक्तं यतिच्छेदसमन्वितम् ।
निबद्धन्तु पदं ज्ञेयं प्रमाणनियतात्मकम् ॥ ३८ ॥
जिसमें पदों तथा अक्षरों का निश्चित क्रम के अनुसार गठन हो, यति
(विच्छेद) समन्वित हो तथा जिसमें अक्षर संख्या का निश्चित प्रमाण रहे
उसे 'निबद्ध' (पद्योपयोगी) शब्द समझना चाहिये ॥ ३८ ॥
छन्द—
एवं नानार्थसंयुक्तैः पादैर्वर्णविभूषितैः ।
चतुर्भिरस्तु भवेद्युक्तं छन्दोवृत्ताभिधानवत् ॥ ३९ ॥
इस प्रकार शब्दों के गठन द्वारा जो पद्य-रचना की जाती है उसमें
चार पाद होते हैं—उसमें अनेक अर्थों का अभिव्यञ्जन रहता है तथा
वर्णों के (गुरु तथा लघु स्वरूपों के) द्वारा यह निर्मित की जाती है। ऐसी
रचना छन्द या वृत्त नाम से अभिहित की जाती है ॥ ३९ ॥
छन्द (वृत्तों) के विभेद—
षड्विंशतिः स्मृतान्येभिः पादैश्छन्दांसि संख्यया ।
सममर्द्धसमञ्चैव तथा विषममेव च ॥ ४० ॥
१. पदच्छेद—ख०; ग० ।
२. प्रमाणनियताक्षरम्—क० ।
३. पदवर्णं—क०; पदैर्वणं—ख०; ग० ।
४. भवेत्पादै—क०; भवेद् वृत्तं—ख०; ग० ।
५. छन्दोवृत्त्यभिधानवत्, छन्दोवृत्तसमाश्रयम्—क० ।
६. स्मृतानीह—ख०; ग० ।
७. पादे—ख०; ग० ।
८. समञ्चार्धसमञ्चैव—ख०; ग० ।