नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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गयी, जिनकी इसी के अनुसार योजना करनी चाहिये। इन सभी छन्दों
की सम्पूर्ण प्रमाण-संख्या का योग १३४२१७७२६ होता है ॥ ५२-७८ ॥
छन्दों की विभेदक अन्य पद्धति—
षड्विंशतिरिहान्यानि व्याख्यातानि समासतः ।
समानि गणनायुक्तिमाश्रित्य कथितानि वै ॥ ७९ ॥
सर्वेषां छन्दसामेवं त्रिकैर्वृत्तं प्रयोजयेत् ।
एकं वा विंशतिं वापि सहस्रं कोटिरेव वा ॥ ८० ॥
ज्ञेया ह्यष्टौ त्रिकास्तत्र संज्ञाभिः स्थानमक्षरम् ।
त्रीण्यक्षराणि विज्ञेयस्त्रिकोऽशः परिकल्पितः ॥ ८१ ॥
गुरुलध्वक्षरकृतः सर्ववृत्तेषु नित्यशः ।
अभी मैंने गणना प्रमाण के द्वारा २६ अक्षरों तक के छन्दों के भेदों
को बतलाया। इन छन्दों या वृत्तों का त्रिकों (गणों) के द्वारा गठन किया
जाता है। चाहे ये वर्णवृत्त एक, बीस, सहस्र या करोड़ विभेदों को धारण
किये हों किन्तु सामान्यतः इन वृत्त या वृत्तों के स्वरूपगठन में यहाँ गणों
का नियमविधान रहता है तथा इसी से सारा काम चलता है।
ये गण आठ हैं जो तीन अक्षरों से निर्मित होते हैं। इनका अपने
स्वरूपानुसार पृथक्-पृथक् नाम रहता है। गुरु तथा लघु वर्णों के तीन
अक्षरों से निर्मित 'गण' कहलाते हैं तथा इन्हीं से प्रत्येक छन्द का आकार
बनता है। इन्हें 'त्रिक' भी कहते हैं ॥ ७९-८२ ॥
गुरुपूर्वो भकारः स्यान्मकारस्तु गुरुत्रयम् ॥ ८२ ॥
जकारो गुरुमध्य॑स्तु सकारोऽन्तगुरुस्तथा ।
लघुमध्यस्तु रेफः स्यात्तकारोऽन्तलघुस्तथा ॥ ८३ ॥
१. एतेषां तु पुनर्ज्ञेयं त्रिकैर्वृत्तप्रवर्तनम् । एकं वा विंशतिर्वापि सहस्रं कोटिरेव
च । सर्वेषां छन्दसामेवं वृत्तानां वा द्विजोत्तमाः । ज्ञेयास्त्वष्टौ त्रिकास्तत्र स्वसं-
ज्ञाभिः पृथक्-पृथक् ॥—ख०; ग० ।
२. मकारो गुरुकत्रयम्—क०; मकारस्तु गुरुत्रिकम्—ख०; ग० ।
३. गुरुमध्यस्थः—ख०; ग० ।
४. लघुमध्यस्थितो रेफः—ख० ग० ।
५. सकारोऽन्तलघुस्तथा—ख०; ग० ।