नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः २०७
तत्प्राहुः सप्तविधं षट्कारकसंयुतं प्रथितसाध्यम् ।
निर्देशसम्प्रदानोपोदानप्रभृतिसंज्ञाभिः ॥ २४ ॥
यह नाम सात श्रेणियों से तथा छः कारको से युक्त होता है। कभी
कभी यह सिद्ध वाच्यार्थ (प्रथित) तथा कभी-कभी साध्यभूत वाच्यार्थ
(साध्य) वाला होता है। (और जब यह (विभिन्न) प्रत्ययों से युक्त होता है
तो) निर्देश, सम्प्रदान, अपादान प्रभृति संज्ञा को सूचित करता है ॥ २४ ॥
सम्प्रत्यतीतकालक्रियादिसंयोजितं प्रथितसाध्यम् ।
वचनं नागतयुक्तं सुसंदृशसंयोजनविभक्तम् ॥ २५ ॥
जो क्रियाएँ वर्तमान तथा भूतकाल एवं इसके समान समय में होने
वाले कार्य को बतलाने वाले अर्थ से सम्बद्ध शब्द बनाती हैं। वह 'प्रथित'
तथा जो कभी-कभी व्यवस्थित रस में निमित विभेद सम्पन्न शब्द बनाती
हों साध्य कहलाती है।
आख्यात—(क्रिया)
पँश्चशतधातुयुक्तं पञ्चगुणं पञ्चविधमिदं वापि ।
आख्यातं पाठ्यैकृतं ज्ञेयं नानार्थ्याश्रयविशेषम् ॥ २६ ॥
नाम के दो प्रकार (जाति तथा द्रव्य) माने हैं, कात्यायन के मत में एक प्रकार
और जोड़ा गया जिसे 'लिंग' कहते हैं। व्याघ्रपाद आचार्य के मत से संख्या
तथा भाष्यकार पतंजलि के मत से 'कारक' के संयुक्त करने पर नाम के ये पाँच
प्रकार हो जाते हैं। यथा—जाति, द्रव्य, लिङ्ग, संख्या तथा कारक ।
१. सात श्रेणी का अर्थ सात विभक्तियाँ हैं। प्रथित तथा साध्य शब्दों का
आश्रय यह भी है कि सिद्धवाच्यार्थ वाला शब्द जिसका प्रकृति, प्रत्यय आदि से
विभाग करते हुए निर्वचन न किया जा सके 'प्रथित' कहलाता है (अर्थात्
रूढ़ शब्द) तथा साध्य का आशय है कि प्रकृति प्रत्यय आदि से जिस शब्द का
निर्वचन किया जाए तथा अन्तर्निहित अर्थ की अभिव्यक्ति हो सके। इसे हम
दूसरे शब्दों में 'यौगिक' शब्द कह सकते हैं।
२. 'निर्देश' का सम्बन्ध 'कारक' से (प्रतीत होता) है। जैसा कि विवरण
है और विभक्त्यन्त प्रत्यय से इसकी पुष्टि भी होती है।
१. निर्देशसम्प्रदानोपादान—क० ।
२. सम्प्रत्यतीतकालप्रयोजितः क्रियादिसंयोगः प्रथितः—ख०; ग० ।
३. वचनानागत—क०; साध्ये वचनानां यतियुक्तं—ख०; ग० ।
४. सदृशसंयोजन—ख०; ग० । ४. पद्यार्धमेतत् ख० ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
५. पाठ्यमिदं—क० । ६. नामाश्रय—क०; नामार्थसंश्रय विशेषम्—ख० ।