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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 668 में से

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पृष्ठ 319

पाँच सौ¹ धातुओं का पच्चीस वर्गों में विभक्त होने वाला क्रिया का
समूह 'आख्यात' कहलाता है । ये पाठ्य या संवादों में संज्ञाओं के आश्रित
अर्थों से संयुक्त की जाती हैं ॥ २६ ॥
उपसर्ग—
प्रातिपदिकार्थयुक्तान्¹ धात्वर्थानुपसृजन्ति² ये स्वार्थैः³ ।
उपसर्गा ह्युद्दिष्टास्तस्मात् संस्कारतस्तस्मिन्⁴ ॥ २७ ॥
जो अपने अर्थों के द्वारा प्रातिपादिक अर्थ सम्पन्न धातु के मूल अर्थ को
विशिष्टार्थ सम्पन्न बना देते हैं उन्हें संस्कार शास्त्र में ( व्याकरण शास्त्र में )
( इसी कारण ) 'उपसर्ग²' कहते हैं ॥ २७ ॥
निपात—
प्रातिपदिकार्थयोगाद्धातुच्छन्दोनिरुक्तयुक्त्या च ।
यस्मान्निपतन्ति पदे तस्मात् प्रोक्ता निपातास्तु ॥ २८ ॥
क्योंकि प्रादिपदिकार्थ के साथ, धातु, छन्द, निर्वचन तथा युक्ति द्वारा
उनके मूलार्थ को फैलाने के लिए संयुक्त होकर आते हैं । ( अतएव पद के
समीप आने के कारण ) इन्हें निपात³ कहते हैं ॥ २८ ॥
१. धातुओं की निश्चित संख्या नहीं बतलाई जा सकती क्योंकि विभिन्न
व्याकरण ग्रन्थों में इनकी अलग-अलग संख्या बतलाई गई है । पाणिनि ने अपनी
धातुओं को दस गणों में विभक्त किया है । परन्तु धातुओं का पच्चीस भागों में
विभाग किसी भी व्याकरण ग्रन्थ में प्राप्त नहीं होता ।
२. उपसर्ग का भरत प्रोक्त स्वरूप निरुक्त ( १।१-३-४ ) में उद्धृत
शाकटायन के विवरण से मिलता है । ( तुलना कीजिए सम्बद्ध दोनों अंशों की । )
उपसर्गों का त्रिविध अर्थद्योतन निम्न श्लोक से स्पष्ट है—
कचिद् भिनत्ति धात्वर्थं क्वचित्तमनुवर्तते ।
विशिनष्टि तमेवार्थमुपसर्गगतिस्त्रिधा ॥
३. पाणिनि के अनुसार अव्यय जो 'च' आदि वर्ग में पठित है 'निपात'
कहलाते हैं । पतंजलि के मत में विभक्ति तथा स्वरों का समानता रखने
वाले अव्यय कारक के कार्य की पूर्ति भी कर देते हैं । द्रष्ट० पात० महा० ३।४।२
( विभक्तिस्वरप्रतिरूपकाश्च भवन्तीति निपातसंज्ञाः )
१. युक्तं—क० । २. नुत्सृजन्ति—ख०; ग० ।
३. स्वार्थैः—ख० । ४. संस्कारशास्त्रेऽस्मिन्—ख०; ग० ।