नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished668 पृष्ठ
पृष्ठ 320, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 320पञ्चदशोऽध्यायः २०९
पञ्चदशोऽध्यायः २०९
प्रत्यय—
प्रत्ययविभागजनिताः प्रकर्षसंयोगस¹त्ववचनैश्च ।
यस्मात् पूरयतेऽर्थान् प्रत्यय उक्तस्ततस्तस्मात् ॥ २९ ॥
जो प्रकर्ष, संयोग तथा भाव (सत्व) के द्वारा शब्दों के आंशिक अर्थों
की पूर्ति करते हैं उन्हें इन विचारों (विश्वासों-प्रत्यय) को विकसित करने के
कारण 'प्रत्यय' कहा जाता है ॥ २६ ॥
तद्धित—
³लोप-प्रकृति-प्रत्यय-विभागसंयोगसत्व⁴-वचनेषु ।
तांस्तान् पूर्यन्तेऽर्था स्तेषु यतस्तद्धितस्तस्मात् ॥ ३० ॥
क्योंकि यह शब्द के अर्थों को—लोप, प्रकृति तथा प्रत्यय के विभाग या
संयोग द्वारा विकसित या पूर्ण करता है तथा उनके अन्तःस्थित (विचारया)
भावाभिप्राय को बतलाता है अतएव 'तद्धित' कहलाता है ॥ ३० ॥
विभक्ति—
एकस्य बहूनां वा धातोलिङ्गस्य⁷ वा पदानां वा ।
यस्माद्विभजन्त्यर्थान् विभक्तयः कीर्तितास्तस्मात् ॥ ३१ ॥
एक या अनेक शब्दों के अर्थों का उनकी मूलधातु या लिङ्ग के
अनुसार विभाग या विभेद करने के कारण 'विभक्ति' कहलाती है ॥ ३१ ॥
१. प्रत्यय की भरत ने व्यापक परिभाषा की है। अभिनवगुप्त ने इस लक्षण
को ऐन्द्रव्याकरण के अनुसार तथा वहीं से लिया हुआ निरूपित किया है। धातु में
अवस्थित अर्थ के बोध में जो सहायक हो उसे सामान्यतः 'प्रत्यय' कहा जाता
है। (येनार्थः प्रतीयते स प्रत्ययः) ।
२. भरतोक्त तद्धित का स्वरूप अन्य व्याकरण ग्रंथों से मेल नहीं खाता ।
३. विभक्ति शब्द का निर्वचन या व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ लेकर यहाँ भरत ने
१. तत्व—क० । २. तांस्तान् पूरयते—क० । ३. लोक—ख०; ग० ।
४. तत्ववचनैस्तु—क० ।
५. ते ते पूर्यन्तेऽर्थाः—क०; तस्मात् पूरयतेऽर्थान्—ख०; ग० ।
६. अर्थान् हि तो यतः—क०; ततो यतः—ख०; ग० ।
७. लिङ्गस्यापदानां वा—ख०; ग० ।
८. विभजन्त्यर्थं यस्मिन्—क०, विभजन्त्यर्थं यस्मात विभक्तयस्तेन ताः
प्रोक्ताः—ख०; ग० ।
१४ ना० शा० द्वि०