नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१४ नाट्यशास्त्रम्
त्रयोदशातिजगती शक्वरी तु चतुर्दश ।
दशपञ्चातिशक्वर्या अष्टिः स्यात् षोडशाक्षरा ॥ ४६ ॥
तथो सप्तदशात्यष्टिः धृतिरष्टादशाक्षरा ।
एकोनविंशातिधृतिः कृतिर्विंशतिरेव च ॥ ४७ ॥
प्रकृतिश्चैकविंशत्या द्वाविंशत्याकृतिस्तथा ।
विकृतिः स्यात्त्रयोविंशा चतुर्विंशापिँ संकृतिः ॥ ४८ ॥
पञ्चविंशत्यभिकृतिः षड्विंशत्यक्षरोत्कृतिः ।
(अक्षर गणना के अनुसार होने वाले छन्दों के भेदों में) एक अक्षर
के पाद वाला वृत्त 'उक्ता', दो अक्षरों वाला 'अत्युक्ता'. तीन अक्षरों वाला
'मध्या', चार अक्षरों वाला 'प्रतिष्ठा', पाँच अक्षरों वाला 'सुप्रतिष्ठा', छः
अक्षरों का 'गायत्री', सात अक्षरों का 'उष्णिक्', आठ अक्षरों का 'अनुष्टुप्',
नौ अक्षरों का 'बृहती', दस अक्षरों का 'पंक्ति', ग्यारह अक्षरों का 'त्रिष्टुप्'
बारह अक्षरों का 'जगती', तेरह अक्षरों का 'अतिजगती', चौदह अक्षरों
का 'शक्वरी', पन्द्रह अक्षरों का 'अतिशंकरी', सोलह अक्षरों का 'अष्टि',
सत्रह अक्षरों का 'अत्यष्टि', अट्ठारह अक्षरों का 'धृति', उन्नीस अक्षरों का
'अतिधृति', बीस अक्षरों का 'कृति', इक्कीस अक्षरों का 'प्रकृति', बाईस
अक्षरों का 'आकृति', तेईस अक्षरों का 'विकृति', चौबीस अक्षरों का
'संकृति', पच्चीस अक्षरों का 'अतिकृति' तथा छब्बीस अक्षरों का
'उत्कृति' होता है ॥ ४३-४९ ॥
अतोऽधिकाक्षरं छन्दो मालावृत्तमिति स्मृतम् ॥ ४९ ॥
१. अतिशक्करी पञ्चदश षोडशाष्टिः प्रकीर्तिता—क० ।
२. अत्यष्टिः स्यात् सप्तदश—क० ।
३. एकाधिका चातिधृतिः—क० ।
४. स्त्वेकविंशत्या—क० ।
५. विकृतिश्च त्रयो—ग० ।
६. चतुर्विंशा च—ख०; ग० ।
७. षड्विंश चोत्कृतिर्भवेत्—क० ।
८. यत् स्यात्—क०; यत्तु—ख०; ग० ।
९. तदिष्यते—ख०; ग० ।