नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 321, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें२१० नाट्यशास्त्रम्
सन्धि—
वर्णपदक्रमसिद्धः पदैकयोगाच्च वर्णयोगाच्च ।
संन्धीयते तु यस्मात्तस्मादुपदिश्यते सन्धिः ॥ ३२ ॥
जब पृथक्भूत पद, वर्ण या स्वर व्यञ्जन परस्पर शब्द या शब्दों के
समीप आकर मिल जाते हों तो इस सन्धान या जोड़ के हो जाने को
'सन्धि' कहते हैं ॥ ३२ ॥
विंशिष्टास्तु स्वरा यत्र व्यञ्जनं वापि योगतः ।
सन्धीयते पदे यस्मात्तस्मात् सन्धिः प्रकीर्तितः ॥ ३३ ॥
अथवा दो विशिष्ट स्वरों या पदों का क्रम ( यदि ) परस्पर मिल जाता
हो तो उसे भी 'सन्धि' जानो ॥ ३३ ॥
उसके लक्षण को बतलाया गया है । इसी प्रकार का आशय कलापव्याकरण में
दुर्ग सिंह ने भी व्यक्त किया है । यथाः—'अर्थस्य विभजनाद्विभक्तिः'
१. स्वर या व्यंजनों का केवल संयोग या सम्मिश्रण मात्र न तो सन्धि है
न ही यह उसका प्रयोजन है किन्तु ध्वनिगतप्रभाव तथा सम्भाषणगत
आवश्यकता के कारण भी सन्धियाँ होती हैं । इन सन्धियों का पाँच प्रकारों में
विभाजन है और इसी कारण इनकी संज्ञा भी पाँच हैं—यथा—( १ ) स्वर,
( २ ) व्यंजन, ( ३ ) प्रकृतिभाव, ( ४ ) अनुस्वार तथा ( ५ ) विसर्गसन्धि ।
समीप आकर ( समय के लाघवार्थ ) मिलने का कार्य—जो कि पृथक् दो
ध्वनियों के अलग उच्चारण करने पर व्यर्थ ही अधिक समय ले लेता है—यदि
किया गया हो तो सन्धि कहलाता है । यह प्राचीन वैयाकरणों की 'अर्धमात्रा-
लाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणाः' उक्ति के साथ ही सन्धि के उस नियम को
भी—जिसके अनुसार अर्धमात्रा का उच्चारण में व्यवधान होने से उसके पृथक्
उच्चारण के बजाय सम्मिलित उच्चारण ही 'सन्धि' करते हुए किया जाए—इस
प्रकार के सिद्धान्त तथा उनकी स्वाभाविक वृत्ति तथा योजना को समर्थित करता
है । यह सन्धि इसीलिए भी की जाती है कि दो जिससे श्लोकार्थ एकत्र न हों ।
१. वर्णक्रमसंसिद्धः—क०; वर्णक्रमसम्बद्धः—ख०; ग० ।
२. पदैकयोगोऽन्यवर्णयोगाच्च—ख०; ग० ।
३. सन्धीयते च यस्मात्तस्मात् सन्धिः समुद्दिष्ट—ख०; ग० ।
४. पद्यमेतत् ख० ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।