नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० नाट्यशास्त्रम्
लघुपूर्वो यकारस्तु नकारैस्तु लघुत्रयम् ।
इन त्रिकों में यदि आदि गुरु हो तो भगण ( ऽ।। ), तीनों गुरु हों तो
मगण ( ऽऽऽ ), गुरु मध्य में हो तो जगण ( ।ऽ। ), अन्त में गुरु हो तो
सगण ( ।।ऽ ), मध्य में लघु हों तो रगण ( ऽ।ऽ ), अन्त में लघु हो तो
तगण ( ऽऽ। ), आदि में लघु हो तो यगण ( ।ऽऽ ) तथा तीनों लघु होने
पर नगण ( ।।। ) कहलाता है ॥ ८२-८४ ॥
एते ह्यष्टौ त्रिकौ नाम्ना विज्ञेयौ ब्रह्मसम्भवाः ॥ ८४ ॥
लाघवार्थं पुनरमी छन्दोमानमवेक्ष्य च ।
५एभ्यो विनिर्गताश्चान्या जातयोऽथ समादयः ॥ ८५ ॥
अस्वराः सस्वराश्चापि प्रोच्यन्ते वृत्तलक्षणैः ।
गुर्वैकं गितिविज्ञेयं तथा लघु लितिस्मृतम् ॥ ८६ ॥
ये आठ 'त्रिक' ( गण ) हैं—जो ब्रह्मा से उत्पन्न हुए। ये गण छन्द-
शास्त्र में लाघव तथा छन्दों के प्रमाण बतलाने के लिए निर्मित किये
गये हैं । ( इन्हीं से समादि वृत्त ) सम, अर्धसम तथा विषम और जाति
( आर्यादि मात्रागणना के लक्षण वाली ) की उत्पत्ति हुई । ये छन्द के
लक्षण-वेत्ताओं द्वारा सस्वर तथा अस्वर रूप में ( भी ) प्रयुक्त किये जाते
हैं । यहाँ एक दीर्घवर्ण को 'ग्' तथा लघु वर्ण को 'ल्' के संकेत द्वारा
समझना भी चाहिये ॥ ८४-८६ ॥
नियतः पदविच्छेदो यतिरित्यभिसंज्ञिता ।
गुरुर्दीर्घं प्लुतश्चैव संयोगपरमेव च ॥ ८७ ॥
सानुस्वारविसर्गश्च तथान्त्यश्च लघु क्वचित् ॥ ८८ ॥
१. नकारश्च—क० ।
२. त्रिका ज्ञेया—क० । ३. प्राज्ञैर्विज्ञेया—क०; ख० ।
४. मपेक्ष्य—क० ।
५. इदं श्लोकार्थं ख०-ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
६. इच्चैव—ख०; ग० ।
७. लक्षणम्—क०; लक्षणे—ख० ।
८. त्यभिधीयते—ख०; ग० ।
९. अस्मात् परं कपुस्तके ।