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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 668 में से

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पृष्ठ 322

पञ्चदशोऽध्यायः २११
समास—
लुप्त¹विभक्तिर्नाम्नामेकार्थं संहरत्समासोऽपि ।
तत्पुरुषा²दिस्तज्ज्ञैर्निर्दिष्टः षड्‌विधो विप्राः ॥ ३४ ॥
नामों की विभक्तियों का लोप करते हुए एकार्थक पद को जो संक्षेप
करते हुए प्रस्तुत करता हो वह तत्पुरुष आदि छः प्रकारों से युक्त 'समास'
कहलाता है ॥ ३४ ॥
एभिः शब्दविधानैर्विस्तारव्यञ्जना³र्थसंयुक्तैः ।
पदबन्धाः कर्तव्या निब⁴द्धबन्धास्तु चूर्णा वा ॥ ३५ ॥
इस प्रकार शब्दशास्त्र के नियमों को ध्यान में रखते हुए शब्द रचना
करना चाहिए जो गद्य (चूर्ण) निबद्ध बन्ध या पद्यात्मक हो तथा जो
शब्दों के विस्तार और अभिव्यक्ति से पूर्ण या युक्त हो ॥ ३५ ॥
शब्द-द्वैविध्य—
वि⁵भक्त्यन्तं पदं ज्ञेयं नि⁶बद्धं चूर्णमेव च ।
तत्र चूर्णपदस्येह स⁷न्निबोधत लक्षणम् ॥ ३६ ॥
विभक्ति जिस शब्द के अन्त में संयुक्त की जाये उसे 'पद' जानो । यह
दो प्रकार होता है—निबद्ध तथा चूर्णपद । अब मैं चूर्णपद का लक्षण
बतलाता हूँ जिसका गद्य लेखन में उपयोग किया जाता है ॥ ३६ ॥
चूर्णपद—
अनि⁸बद्धपदं छन्दस्त⁹थो चानियताक्षरम् ।
अ¹⁰र्थापेक्ष्यक्षरस्यूतं ज्ञेयं चूर्णपदं बुधैः ॥ ३७ ॥
१. लुप्तविभक्तिर्नाम्ना एकार्थान् संहरन्ति सङ्क्षेपात्—ख०; ग० ।
२. तत्पुरुषादिकसंज्ञैर्निर्दिष्टः षड्‌विधः सोऽपि—ख०; ग० ।
३. व्यञ्जनात्व—ख०; ग० ।
४. वृत्तनिबन्धास्तु—ख०; ग० ।
५. चतुर्विधं पदं तच्च—क०; विभज्यैकं पदं ज्ञेयं—ख०; ग० ।
६. निबन्धं—ख०; ग० ।
७. बहिर्बोधत—ख०; ग० ।
८. अनिबद्धं पदवृन्दं—ख०; ग० ।
९. छन्दो यथेष्टगुरुलाघवम्—क० ।
१०. अर्थापेक्षाक्षरपदं—क०; अर्थापेक्षाक्षरयुतं—ख०; ग० ।