सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

२०२ नाट्यशास्त्रम्
पाठ्य के विभिन्न आधार—
व्यञ्जनानि स्वरा¹श्चैव सन्धयोऽथ विभक्तयः।
नामाख्यातोपसर्गाश्च निपातास्तद्धितास्तथा॥ ६॥
एतै²रङ्गैः समासैश्च नानाधातुसं³माश्रयम्।
विज्ञेयं संस्कृतं पाठ्यं प्र⁴योगश्च निबोधत॥ ७॥
संस्कृत-पाठ्य व्यञ्जन, स्वर, सन्धि, विभक्ति, नाम (संज्ञा) आख्यात
(क्रिया) उपसर्ग, निपात, तद्धित समास तथा नाम धातु के द्वारा निर्मित
(या आश्रय से युक्त) होता है। अब मैं इनका सलक्षण प्रयोग बतलाता
हूँ॥ ६-७॥
पाठ्यवर्ण-निरूपण—
अकारा⁵द्याः स्वरा ज्ञेया औकारान्ताश्चतुर्दश।
हका⁶रान्तानि कादीनि व्यञ्जनानि विदुर्बुधाः॥ ८॥
'अ' कार से प्रारम्भ होकर 'औ' कार तक पूर्ण हो जाने वाले चौदह
स्वर तथा 'क' से प्रारम्भ होकर 'ह' पर समाप्त हो जाने वाले वर्ण व्यञ्जन
कहलाते हैं॥ ८॥
अत्र स्वराश्चतुर्दश कादीनि व्यञ्जनानि यथा—अ आ इ ई उ ऊ
ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ स्वरा ज्ञेयाः। व्यञ्जनानि यथा—क ख ग
घ ङ, च छ ज झ ञ, ट ठ ड ढ ण, त थ द ध न, प फ ब भ म, य
र ल व, श ष स हः इति व्यञ्जनवर्गाः।⁷
१. शिक्षा तथा प्रातिशाख्य ग्रन्थों में वर्णों (स्वरों) की विभिन्न संख्याएँ
बतलाई गई हैं जिनमें पाणिनि-शिक्षा में इनकी संख्या २२ है। अन्य प्रातिशाख्यों
और ऋक्तन्त्रव्याकरण में इनकी संख्या क्रमशः १३, १६ तथा २३ प्राप्त होती
है। पाणिनिशिक्षा में अनुस्वार, विसर्ग जिह्वामूलीय और उपध्मानीय को भी
व्यञ्जनान्तर्गत माना गया है।
१. स्वरश्चैव—क०। २ तथा समासा इत्येवं; एतैरङ्गविधानैश्च—क०।
३. गवेक्षितम्—क०। ४. तद्वक्ष्यामि समासतः—ख०; ग०।
५. अकारादि—क०। ६. ककारादीनि हान्तानि—क०।
७. अस्मादनन्तरं क० पुस्तके तु—
अष्टौ स्थानानि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस्तथा।
जिह्वामूलञ्च दन्ताश्च नासिकोष्ठौ च तालु च॥
अकुहविसर्जनीयाः कण्ठ्याः, इचुयशास्तालव्याः, ऋटुरषा मूर्धन्याः, लुतुलसा

( गद्यभाग ) ( 'अ' से प्रारम्भ होने वाले ) स्वर चौदह हैं—अ, आ,
इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऌ, ए ऐ ओ औ तथा क से प्रारम्भ होने वाला
व्यञ्जन समूह है—क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, न, प, फ, ब, भ, म, य, र,
ल, व, श, ष, स, ह ।
व्यञ्जन—तथा उनके उच्चारण स्थान—
वर्गे वर्गे समाख्यातौ द्वौ वर्णौ प्रागवस्थितौ ।
अघोषा इति ये त्वन्ये सघोषाः परिकीर्तिताः ॥ ९ ॥
प्रत्येक वर्ग के प्रारम्भ के दो ( व्यञ्जन ) वर्ण ( जैसे—क, ख तथा श,
ष, स ) अघोष तथा शेष सभी वर्ण सघोष ( घोष ) कहलाते हैं ॥ ९ ॥
एते घोषाघोषाः कण्ठ्यौष्ठ्या दन्त्यजिह्वनासिक्याः ।
ऊष्माणस्तालव्यो विसर्जनीयाश्च बोद्धव्याः ॥ १० ॥
ये घोष तथा अघोष वर्ण कण्ठ्य, ओष्ठ्य, दन्त्य, जिह्व्य, नासिक्य,
ऊष्माण, तालव्य तथा विसर्जनीय भेद से आठ स्थानों से उच्चारित
होते हैं ।
ग घ ङ ज झ ञ ड ढ ण द ध न ब भ म य³ र ल वा मता घोषाः ।
क ख च छ ट ठ त थ प फ⁴ श ष सा इति वर्गेष्वघोषाः स्युः ॥ ११ ॥
इस व्यञ्जन समूह में ग घ ङ, ज झ ञ, ड ढ ण, द ध न, ब भ म,
१. जिह्व्य वर्णों का किसी व्याकरण में विवरण नहीं मिलता, सम्भवतः
यह मूर्धन्य के स्थान का निर्देश करता है क्योंकि मूर्धन्य वर्णों की ध्वनि में
जिह्वा का महत्वपूर्ण योगदान रहता है ।
दन्त्या; उपूध्मानीया ओष्ठ्या; इत्युपध्मानीयः, इति जिह्वामूलीयः, ए ऐ कण्ठ-
तालव्यौ, ओ औ कण्ठौष्ठ्यौ, वकारो दन्तोष्ठ्यः, ङ-ञ-ण न-मा अनुनासिकाः,
विसर्जनीयस्योरस्य इत्येके सर्वमुखस्थानमवर्णमित्यपरे ।
द्वौ द्वौ वर्णौ तु वर्गाद्यौ शषसाश्च त्रयोऽपरे ।
अघोषा घोषवन्तश्च ततोऽन्ये परिकीर्तिताः ॥ इति-क० पुस्तकेऽधिकम् ।
१. कण्ठ्योष्ठ(ष्ठ्य)दन्त (न्त्य)जिह्नानुनासिक्यः— ख०; ग० ।
२. स्तालव्य विसर्जनीयाश्च—ख०; ग० ।
३. तथैव य र ल व हा घोषाः—ख०; ग० ।
४. प फ इति वर्गेष्वघोषाः स्युः—ख० ग० ।

२०४ नाट्यशास्त्रम्
तथा य र ल व ‘घोष’ तथा क ख, च छ, ट ठ, त थ, और प फ ‘अघोष’
वर्ण कहलाते हैं ॥ ११ ॥
क ख ग घ ङाः कण्ठस्थास्तालुस्थानास्तु१ च छ ज झ ञाः ।
ट ठ ड ढ णा मूर्द्धन्याः त थ द ध नाश्चैव दन्तस्थाः ॥ १२ ॥
क, ख, ग, घ, ङ को कण्ठ्य, च, छ, ज, झ को तालव्य, ट, ठ, ड, ढ,
ण को मूर्धन्य तथा त, थ, द, ध, न को दन्त्य व्यञ्जन समझना चाहिये ।
अर्थात् इनका उच्चारण स्थान यही है ॥ १२ ॥
पफबभमास्त्वोष्ठ्याः स्युर्दन्त्या ललसा अहौ२ च कण्ठस्थौ ।
तालव्या इचुयेशाः३ स्युः ऋटुरषा४ मूर्ध्नि५ स्थिता ज्ञेयाः ॥ १३ ॥
लूलूदन्त्यौ ओऔकण्ठोष्ठ्यौ६ ए ऐकारौ च कण्ठतालव्यौ ।
प, फ, ब, भ, म को ओष्ठ्य, ऌ, ल तथा स को दन्त्य, अ, ह को
कण्ठ्य, इ, चु (चवर्ग) तथा य, श को तालव्य तथा ऋ, र और ष को
मूर्धन्य, ऌ ॡ को दन्त्य, ओ, औ को कण्ठ्योष्ठ्य तथा ए, ऐ को तालव्य
जानो ॥ १३-१४ ॥
कण्ठ्यौ७ विसर्जनीयो जिह्वामूलोद्भवौ८ क ख योः ॥ १४ ॥
पफयोरोष्ठस्थानो भवेदुकारस्तथा स्वरो विवृतः ।
स्पृष्टाः काद्या मान्ताः श ष स हकारास्तथा विवृताः ॥ १५ ॥
अन्तःस्था संवृतं१०जा ङ ञ ण नमा नासिकोद्भवा ज्ञेयाः ।
ऊष्माणश्च श ष स हा य व र ल वर्णास्तथैव चान्तस्थाः ॥ १६ ॥
जिह्वामूलीयः कः प उपध्मानीयसंज्ञया ज्ञेयः११ ।
कचटतपाः स्वरिताः स्युः खछठथफाः स्युस्तथा कण्ठ्याः१२ ॥ १७॥
कण्ठोरे१३स्थान् विद्याद् गजँडँदबान् पाठ्यसम्प्रयोगे तु ।
वेद्यो विसर्जनीयो जिह्वास्थोनै१५स्थितो वर्णः ॥ १८ ॥
१. तालुस्थाना मतास्तु—ख०; ग० । २. गहौ—क० ।
३. इयशाः—ख०; ग० । ४. ऋ र पा—ख० ।
५. मूर्धंस्थिताः—ख०; ग० । ६. ओ औ कण्ठोष्ठस्थानौ—ख०; ग० ।
७. कण्ठ्यौ विसर्जनीयौ जिह्वामूल्योद्भवौ कखयोः—क० ।
८. जिह्वामूलोद्भवः कपयोः—ख०; ग० ।
९. स्थानं भवेदकारः स्वराविद्धः—क०; ग० ।
१०. संवृताः—ख०; ग० । ११. ज्ञेयौ—क० ।
१२. तथाक्रम्याः—क० । १३. कण्ठोरस्थान्—क० ।
१४. घझढधभान्—क० । १५. जिह्वामूलस्थितो—क० ।

पञ्चदशोऽध्यायः २०५
विसर्ग का कण्ठ तथा क, ख का जिह्वामूलीय, प, फ तथा उ का ओष्ठ
तथा स्वरों का विवृत उच्चारण स्थान है। क से म तक स्पृष्ट तथा श, ष, स,
ह विवृत कहलाते हैं। अन्तस्थ का संवृत ङ, ञ, ण, न, म का नासिका
उच्चारण स्थान है। श, ष, स, ह उष्मा, य, र, ल, व अन्तस्थ, क
जिह्वामूलीय तथा प उपध्मानीय होता है।
क, च, ट, त, प स्वरित, ख, छ, ठ, थ, फ कण्ठ्य, (कम्य ?) ग,
ज, ड, द, ब (घ, झ, ढ, ध, भ) कण्ठ तथा उरस्थल से उच्चारित किये
जाते हैं।
विसर्जनीय जिह्वा के मूल भाग से उच्चरित होने वाला समझना
चाहिये ॥ १४-१८ ॥
एते व्यञ्जनवर्गाः समासतः संज्ञया कथिताः ।
शब्दप्रयोगविषये स्वरांस्तु भूयः प्रवक्ष्यामि ॥ १९ ॥
इस प्रकार संक्षेप से व्यञ्जनवर्ग का मैंने वर्णन किया। अब मैं शब्द
प्रयोग के विषय में (की दशा में) स्वरों का कार्य बतलाता हूँ ॥ १९ ॥
स्वरः तथा उनका परिमाण—
य इमे स्वराश्चतुर्दश निर्द्दिष्टास्तत्र वै दश समानाः ।
पूर्वो ह्रस्वस्तेषां परश्च³ दीर्घो विधातव्यः ॥ २० ॥
मैंने पहिले जो चौदह स्वर बतलाये उनमें १ से १० तक के (स्वर)
समान कहलाते हैं। इन समान स्वरों में क्रमशः पहिला ह्रस्व और दूसरा
दीर्घ होता है ॥ २० ॥
शब्दों के विभेद—
४एभिर्व्यञ्जनवर्गैर्नामाख्यातोपसर्गवनिपातैः ।
तद्धितसन्धिविभक्तिभिरधिष्ठितः शब्द इत्युक्तः ॥ २१ ॥
१. व्यंजनों के उच्चारण स्थान तथा उनकी परम्परा आदि के विशेष
विवरण पाणिनि-शिक्षा तथा पातंजल-महाभाष्य आदि में भी देखे जा सकते हैं।
१. शब्दविषयप्रयोगे—क० ।
२. अस्मात्परं—यस्मिन् स्थानेषु समो विज्ञेयो यः सवर्णसंज्ञोऽसौ ।
इति क० पुस्तकेऽधिकम् ।
३. परस्तु दीर्घो विनिर्द्देश्यः—क०; परश्च दीर्घोऽवगन्तव्यः—क० ।
४. इत्थं व्यञ्जनयोगैः परैश्च साख्यातनामपदविहितैः ।
काव्यनिबन्धाश्च स्युर्धातुनिपातोपसर्गैस्तु ।—क० ।

२०६ : नाट्यशास्त्रम्
इस प्रकार इन स्वर तथा व्यंजनों के योग से तथा आख्यात (क्रिया,
धातु) नाम (संज्ञा), उपसर्ग, निपात, तद्धित, सन्धि तथा विभक्ति से
अधिष्ठित शब्द होता है ॥ २१ ॥
पूर्वाचार्यैरुक्तं शब्दानां लक्षणन्तु विस्तरतः ।
पुनरेव संहृतार्थं लक्षणतः सम्प्रवक्ष्यामिं ॥ २२ ॥
प्राचीन आचार्यों ने शब्द का विस्तारपूर्वक लक्षण (निर्दिष्ट) किया
है। मैं उनका संक्षेप में (सार भूत) लक्षण प्रसंगवश बतलाऊँगा ॥ २२ ॥
नाम (संज्ञा)—
स्वौ⁴चाद्यधिकारगुणैरर्थविशेषैर्विभूषितन्यासम्⁵ ।
प्रातिपदिकार्थलिङ्गैर्युक्तं⁶ पञ्चविधमिदं ज्ञेयम् ॥ २३ ॥
संज्ञा (नाम)—अपने 'सु' आदि विभक्ति प्रत्ययों तथा उनके द्वारा
प्रकट होने वाले विशेष अर्थों से युक्त होती है। इसके पाँच प्रकार होते हैं
तथा यह प्रातिपदिकार्थ तथा लिंग से युक्त होती है ॥ २३ ॥
१. नाम या संज्ञा के पाँच प्रकार संक्षिप्तसार के अनुसार इस प्रकार हैं—
(१) उणाद्यन्त, (२) कृदन्त, (३) तद्धितान्त, (४) समासान्त तथा (५)
शब्दानुकरण ।
उणाद्यन्तं कृदन्तञ्च तद्धितान्तं तथैव च ।
शब्दानुकरणं चैव नाम पञ्चविधं स्मृतम् ॥ (संक्षिप्त सार-विवरणे—गोपीचन्द्रः)
२. प्रादिपदिकार्थ के विषय में विविध मत हैं—पाणिनि ने प्रातिपदिक या
१. विस्तरतो लक्षणन्तु शब्दानाम् । सङ्क्षेपादहमेषां लक्षणमर्थञ्च
वक्ष्यामि—क०।
२. अस्मादनन्तरम्—
अर्थप्रधानं नाम स्यादाख्यातन्तु क्रियाकृतम् ।
द्योतयन्त्युपसर्गास्तु विशेषं भावसंश्रयम् ॥ २३ ॥
नामाख्याताथंविषयं विशेषं द्योतयन्ति ते ।
पृथक् तत्रोपसर्गेभ्यो निपाता नियमे च्युते ॥ २४ ॥ इति क० पुस्तक
टिप्पण्यामधिकं पद्यद्वयमुपलभ्यते ।
३. एतस्य स्थाने च—
उद्दिष्टं शब्दानां लक्षणमेतत् समासयोगेन ।
प्रकरणवशाद्धि तदहं विस्तरतः सम्प्रवक्ष्यामि ॥ इति क० पुस्तके लभ्यते ।
४. स्वाद्यत्यधिकार—ख०, ग० । ५. विभूषितन्यासा—ख०; ग० ।
६. लिङ्गयुक्तम्—ख०, ग० ।

पञ्चदशोऽध्यायः २०७
तत्प्राहुः सप्तविधं षट्कारकसंयुतं प्रथितसाध्यम् ।
निर्देशसम्प्रदानोपोदानप्रभृतिसंज्ञाभिः ॥ २४ ॥
यह नाम सात श्रेणियों से तथा छः कारको से युक्त होता है। कभी
कभी यह सिद्ध वाच्यार्थ (प्रथित) तथा कभी-कभी साध्यभूत वाच्यार्थ
(साध्य) वाला होता है। (और जब यह (विभिन्न) प्रत्ययों से युक्त होता है
तो) निर्देश, सम्प्रदान, अपादान प्रभृति संज्ञा को सूचित करता है ॥ २४ ॥
सम्प्रत्यतीतकालक्रियादिसंयोजितं प्रथितसाध्यम् ।
वचनं नागतयुक्तं सुसंदृशसंयोजनविभक्तम् ॥ २५ ॥
जो क्रियाएँ वर्तमान तथा भूतकाल एवं इसके समान समय में होने
वाले कार्य को बतलाने वाले अर्थ से सम्बद्ध शब्द बनाती हैं। वह 'प्रथित'
तथा जो कभी-कभी व्यवस्थित रस में निमित विभेद सम्पन्न शब्द बनाती
हों साध्य कहलाती है।
आख्यात—(क्रिया)
पँश्चशतधातुयुक्तं पञ्चगुणं पञ्चविधमिदं वापि ।
आख्यातं पाठ्यैकृतं ज्ञेयं नानार्थ्याश्रयविशेषम् ॥ २६ ॥
नाम के दो प्रकार (जाति तथा द्रव्य) माने हैं, कात्यायन के मत में एक प्रकार
और जोड़ा गया जिसे 'लिंग' कहते हैं। व्याघ्रपाद आचार्य के मत से संख्या
तथा भाष्यकार पतंजलि के मत से 'कारक' के संयुक्त करने पर नाम के ये पाँच
प्रकार हो जाते हैं। यथा—जाति, द्रव्य, लिङ्ग, संख्या तथा कारक ।
१. सात श्रेणी का अर्थ सात विभक्तियाँ हैं। प्रथित तथा साध्य शब्दों का
आश्रय यह भी है कि सिद्धवाच्यार्थ वाला शब्द जिसका प्रकृति, प्रत्यय आदि से
विभाग करते हुए निर्वचन न किया जा सके 'प्रथित' कहलाता है (अर्थात्
रूढ़ शब्द) तथा साध्य का आशय है कि प्रकृति प्रत्यय आदि से जिस शब्द का
निर्वचन किया जाए तथा अन्तर्निहित अर्थ की अभिव्यक्ति हो सके। इसे हम
दूसरे शब्दों में 'यौगिक' शब्द कह सकते हैं।
२. 'निर्देश' का सम्बन्ध 'कारक' से (प्रतीत होता) है। जैसा कि विवरण
है और विभक्त्यन्त प्रत्यय से इसकी पुष्टि भी होती है।
१. निर्देशसम्प्रदानोपादान—क० ।
२. सम्प्रत्यतीतकालप्रयोजितः क्रियादिसंयोगः प्रथितः—ख०; ग० ।
३. वचनानागत—क०; साध्ये वचनानां यतियुक्तं—ख०; ग० ।
४. सदृशसंयोजन—ख०; ग० । ४. पद्यार्धमेतत् ख० ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
५. पाठ्यमिदं—क० । ६. नामाश्रय—क०; नामार्थसंश्रय विशेषम्—ख० ।

पाँच सौ¹ धातुओं का पच्चीस वर्गों में विभक्त होने वाला क्रिया का
समूह 'आख्यात' कहलाता है । ये पाठ्य या संवादों में संज्ञाओं के आश्रित
अर्थों से संयुक्त की जाती हैं ॥ २६ ॥
उपसर्ग—
प्रातिपदिकार्थयुक्तान्¹ धात्वर्थानुपसृजन्ति² ये स्वार्थैः³ ।
उपसर्गा ह्युद्दिष्टास्तस्मात् संस्कारतस्तस्मिन्⁴ ॥ २७ ॥
जो अपने अर्थों के द्वारा प्रातिपादिक अर्थ सम्पन्न धातु के मूल अर्थ को
विशिष्टार्थ सम्पन्न बना देते हैं उन्हें संस्कार शास्त्र में ( व्याकरण शास्त्र में )
( इसी कारण ) 'उपसर्ग²' कहते हैं ॥ २७ ॥
निपात—
प्रातिपदिकार्थयोगाद्धातुच्छन्दोनिरुक्तयुक्त्या च ।
यस्मान्निपतन्ति पदे तस्मात् प्रोक्ता निपातास्तु ॥ २८ ॥
क्योंकि प्रादिपदिकार्थ के साथ, धातु, छन्द, निर्वचन तथा युक्ति द्वारा
उनके मूलार्थ को फैलाने के लिए संयुक्त होकर आते हैं । ( अतएव पद के
समीप आने के कारण ) इन्हें निपात³ कहते हैं ॥ २८ ॥
१. धातुओं की निश्चित संख्या नहीं बतलाई जा सकती क्योंकि विभिन्न
व्याकरण ग्रन्थों में इनकी अलग-अलग संख्या बतलाई गई है । पाणिनि ने अपनी
धातुओं को दस गणों में विभक्त किया है । परन्तु धातुओं का पच्चीस भागों में
विभाग किसी भी व्याकरण ग्रन्थ में प्राप्त नहीं होता ।
२. उपसर्ग का भरत प्रोक्त स्वरूप निरुक्त ( १।१-३-४ ) में उद्धृत
शाकटायन के विवरण से मिलता है । ( तुलना कीजिए सम्बद्ध दोनों अंशों की । )
उपसर्गों का त्रिविध अर्थद्योतन निम्न श्लोक से स्पष्ट है—
कचिद् भिनत्ति धात्वर्थं क्वचित्तमनुवर्तते ।
विशिनष्टि तमेवार्थमुपसर्गगतिस्त्रिधा ॥
३. पाणिनि के अनुसार अव्यय जो 'च' आदि वर्ग में पठित है 'निपात'
कहलाते हैं । पतंजलि के मत में विभक्ति तथा स्वरों का समानता रखने
वाले अव्यय कारक के कार्य की पूर्ति भी कर देते हैं । द्रष्ट० पात० महा० ३।४।२
( विभक्तिस्वरप्रतिरूपकाश्च भवन्तीति निपातसंज्ञाः )
१. युक्तं—क० । २. नुत्सृजन्ति—ख०; ग० ।
३. स्वार्थैः—ख० । ४. संस्कारशास्त्रेऽस्मिन्—ख०; ग० ।

पञ्चदशोऽध्यायः २०९
प्रत्यय—
प्रत्ययविभागजनिताः प्रकर्षसंयोगस¹त्ववचनैश्च ।
यस्मात् पूरयतेऽर्थान् प्रत्यय उक्तस्ततस्तस्मात् ॥ २९ ॥
जो प्रकर्ष, संयोग तथा भाव (सत्व) के द्वारा शब्दों के आंशिक अर्थों
की पूर्ति करते हैं उन्हें इन विचारों (विश्वासों-प्रत्यय) को विकसित करने के
कारण 'प्रत्यय' कहा जाता है ॥ २६ ॥
तद्धित—
³लोप-प्रकृति-प्रत्यय-विभागसंयोगसत्व⁴-वचनेषु ।
तांस्तान् पूर्यन्तेऽर्था स्तेषु यतस्तद्धितस्तस्मात् ॥ ३० ॥
क्योंकि यह शब्द के अर्थों को—लोप, प्रकृति तथा प्रत्यय के विभाग या
संयोग द्वारा विकसित या पूर्ण करता है तथा उनके अन्तःस्थित (विचारया)
भावाभिप्राय को बतलाता है अतएव 'तद्धित' कहलाता है ॥ ३० ॥
विभक्ति—
एकस्य बहूनां वा धातोलिङ्गस्य⁷ वा पदानां वा ।
यस्माद्विभजन्त्यर्थान् विभक्तयः कीर्तितास्तस्मात् ॥ ३१ ॥
एक या अनेक शब्दों के अर्थों का उनकी मूलधातु या लिङ्ग के
अनुसार विभाग या विभेद करने के कारण 'विभक्ति' कहलाती है ॥ ३१ ॥
१. प्रत्यय की भरत ने व्यापक परिभाषा की है। अभिनवगुप्त ने इस लक्षण
को ऐन्द्रव्याकरण के अनुसार तथा वहीं से लिया हुआ निरूपित किया है। धातु में
अवस्थित अर्थ के बोध में जो सहायक हो उसे सामान्यतः 'प्रत्यय' कहा जाता
है। (येनार्थः प्रतीयते स प्रत्ययः) ।
२. भरतोक्त तद्धित का स्वरूप अन्य व्याकरण ग्रंथों से मेल नहीं खाता ।
३. विभक्ति शब्द का निर्वचन या व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ लेकर यहाँ भरत ने

१. तत्व—क० । २. तांस्तान् पूरयते—क० । ३. लोक—ख०; ग० ।
४. तत्ववचनैस्तु—क० ।
५. ते ते पूर्यन्तेऽर्थाः—क०; तस्मात् पूरयतेऽर्थान्—ख०; ग० ।
६. अर्थान् हि तो यतः—क०; ततो यतः—ख०; ग० ।
७. लिङ्गस्यापदानां वा—ख०; ग० ।
८. विभजन्त्यर्थं यस्मिन्—क०, विभजन्त्यर्थं यस्मात विभक्तयस्तेन ताः
प्रोक्ताः—ख०; ग० ।
१४ ना० शा० द्वि०

२१० नाट्यशास्त्रम्
सन्धि—
वर्णपदक्रमसिद्धः पदैकयोगाच्च वर्णयोगाच्च ।
संन्धीयते तु यस्मात्तस्मादुपदिश्यते सन्धिः ॥ ३२ ॥
जब पृथक्भूत पद, वर्ण या स्वर व्यञ्जन परस्पर शब्द या शब्दों के
समीप आकर मिल जाते हों तो इस सन्धान या जोड़ के हो जाने को
'सन्धि' कहते हैं ॥ ३२ ॥
विंशिष्टास्तु स्वरा यत्र व्यञ्जनं वापि योगतः ।
सन्धीयते पदे यस्मात्तस्मात् सन्धिः प्रकीर्तितः ॥ ३३ ॥
अथवा दो विशिष्ट स्वरों या पदों का क्रम ( यदि ) परस्पर मिल जाता
हो तो उसे भी 'सन्धि' जानो ॥ ३३ ॥
उसके लक्षण को बतलाया गया है । इसी प्रकार का आशय कलापव्याकरण में
दुर्ग सिंह ने भी व्यक्त किया है । यथाः—'अर्थस्य विभजनाद्विभक्तिः'
१. स्वर या व्यंजनों का केवल संयोग या सम्मिश्रण मात्र न तो सन्धि है
न ही यह उसका प्रयोजन है किन्तु ध्वनिगतप्रभाव तथा सम्भाषणगत
आवश्यकता के कारण भी सन्धियाँ होती हैं । इन सन्धियों का पाँच प्रकारों में
विभाजन है और इसी कारण इनकी संज्ञा भी पाँच हैं—यथा—( १ ) स्वर,
( २ ) व्यंजन, ( ३ ) प्रकृतिभाव, ( ४ ) अनुस्वार तथा ( ५ ) विसर्गसन्धि ।
समीप आकर ( समय के लाघवार्थ ) मिलने का कार्य—जो कि पृथक् दो
ध्वनियों के अलग उच्चारण करने पर व्यर्थ ही अधिक समय ले लेता है—यदि
किया गया हो तो सन्धि कहलाता है । यह प्राचीन वैयाकरणों की 'अर्धमात्रा-
लाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणाः' उक्ति के साथ ही सन्धि के उस नियम को
भी—जिसके अनुसार अर्धमात्रा का उच्चारण में व्यवधान होने से उसके पृथक्
उच्चारण के बजाय सम्मिलित उच्चारण ही 'सन्धि' करते हुए किया जाए—इस
प्रकार के सिद्धान्त तथा उनकी स्वाभाविक वृत्ति तथा योजना को समर्थित करता
है । यह सन्धि इसीलिए भी की जाती है कि दो जिससे श्लोकार्थ एकत्र न हों ।
१. वर्णक्रमसंसिद्धः—क०; वर्णक्रमसम्बद्धः—ख०; ग० ।
२. पदैकयोगोऽन्यवर्णयोगाच्च—ख०; ग० ।
३. सन्धीयते च यस्मात्तस्मात् सन्धिः समुद्दिष्ट—ख०; ग० ।
४. पद्यमेतत् ख० ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।

पञ्चदशोऽध्यायः २११
समास—
लुप्त¹विभक्तिर्नाम्नामेकार्थं संहरत्समासोऽपि ।
तत्पुरुषा²दिस्तज्ज्ञैर्निर्दिष्टः षड्‌विधो विप्राः ॥ ३४ ॥
नामों की विभक्तियों का लोप करते हुए एकार्थक पद को जो संक्षेप
करते हुए प्रस्तुत करता हो वह तत्पुरुष आदि छः प्रकारों से युक्त 'समास'
कहलाता है ॥ ३४ ॥
एभिः शब्दविधानैर्विस्तारव्यञ्जना³र्थसंयुक्तैः ।
पदबन्धाः कर्तव्या निब⁴द्धबन्धास्तु चूर्णा वा ॥ ३५ ॥
इस प्रकार शब्दशास्त्र के नियमों को ध्यान में रखते हुए शब्द रचना
करना चाहिए जो गद्य (चूर्ण) निबद्ध बन्ध या पद्यात्मक हो तथा जो
शब्दों के विस्तार और अभिव्यक्ति से पूर्ण या युक्त हो ॥ ३५ ॥
शब्द-द्वैविध्य—
वि⁵भक्त्यन्तं पदं ज्ञेयं नि⁶बद्धं चूर्णमेव च ।
तत्र चूर्णपदस्येह स⁷न्निबोधत लक्षणम् ॥ ३६ ॥
विभक्ति जिस शब्द के अन्त में संयुक्त की जाये उसे 'पद' जानो । यह
दो प्रकार होता है—निबद्ध तथा चूर्णपद । अब मैं चूर्णपद का लक्षण
बतलाता हूँ जिसका गद्य लेखन में उपयोग किया जाता है ॥ ३६ ॥
चूर्णपद—
अनि⁸बद्धपदं छन्दस्त⁹थो चानियताक्षरम् ।
अ¹⁰र्थापेक्ष्यक्षरस्यूतं ज्ञेयं चूर्णपदं बुधैः ॥ ३७ ॥
१. लुप्तविभक्तिर्नाम्ना एकार्थान् संहरन्ति सङ्क्षेपात्—ख०; ग० ।
२. तत्पुरुषादिकसंज्ञैर्निर्दिष्टः षड्‌विधः सोऽपि—ख०; ग० ।
३. व्यञ्जनात्व—ख०; ग० ।
४. वृत्तनिबन्धास्तु—ख०; ग० ।
५. चतुर्विधं पदं तच्च—क०; विभज्यैकं पदं ज्ञेयं—ख०; ग० ।
६. निबन्धं—ख०; ग० ।
७. बहिर्बोधत—ख०; ग० ।
८. अनिबद्धं पदवृन्दं—ख०; ग० ।
९. छन्दो यथेष्टगुरुलाघवम्—क० ।
१०. अर्थापेक्षाक्षरपदं—क०; अर्थापेक्षाक्षरयुतं—ख०; ग० ।

२१२ नाट्यशास्त्रम्
जिसमें किसी निश्चित प्रकार से पदों की संयोजना न हो, जिसमें
अक्षरों की संख्या नियत न हो तथा जो अपने उद्दिष्टार्थ को प्रकट करने के
लिए अनेक वर्ण या पदों को स्वतन्त्रतापूर्वक (रचना में) समाविष्ट कर
सके, तो उसे 'चूर्णपद' शब्द जानो ॥ ३७ ॥
निबद्धपद—
निबद्धाक्षरसंयुक्तं यतिच्छेदसमन्वितम् ।
निबद्धन्तु पदं ज्ञेयं प्रमाणनियतात्मकम् ॥ ३८ ॥
जिसमें पदों तथा अक्षरों का निश्चित क्रम के अनुसार गठन हो, यति
(विच्छेद) समन्वित हो तथा जिसमें अक्षर संख्या का निश्चित प्रमाण रहे
उसे 'निबद्ध' (पद्योपयोगी) शब्द समझना चाहिये ॥ ३८ ॥
छन्द—
एवं नानार्थसंयुक्तैः पादैर्वर्णविभूषितैः ।
चतुर्भिरस्तु भवेद्युक्तं छन्दोवृत्ताभिधानवत् ॥ ३९ ॥
इस प्रकार शब्दों के गठन द्वारा जो पद्य-रचना की जाती है उसमें
चार पाद होते हैं—उसमें अनेक अर्थों का अभिव्यञ्जन रहता है तथा
वर्णों के (गुरु तथा लघु स्वरूपों के) द्वारा यह निर्मित की जाती है। ऐसी
रचना छन्द या वृत्त नाम से अभिहित की जाती है ॥ ३९ ॥
छन्द (वृत्तों) के विभेद—
षड्विंशतिः स्मृतान्येभिः पादैश्छन्दांसि संख्यया ।
सममर्द्धसमञ्चैव तथा विषममेव च ॥ ४० ॥

१. पदच्छेद—ख०; ग० ।
२. प्रमाणनियताक्षरम्—क० ।
३. पदवर्णं—क०; पदैर्वणं—ख०; ग० ।
४. भवेत्पादै—क०; भवेद् वृत्तं—ख०; ग० ।
५. छन्दोवृत्त्यभिधानवत्, छन्दोवृत्तसमाश्रयम्—क० ।
६. स्मृतानीह—ख०; ग० ।
७. पादे—ख०; ग० ।
८. समञ्चार्धसमञ्चैव—ख०; ग० ।

पञ्चदशोऽध्यायः २१३
१छन्दो ज्ञेयं समासेन २त्रिविधं वृत्तमिष्यते ।
छन्दों के एक से २६ संख्या तक के अक्षरों में होने वाले पादों के कारण
२६ भेद हैं। इनके तीन प्रकार और भी है—सम, अर्धसम तथा विषम
वृत्त ॥ ४०-४१ ॥
३नानावृत्तविनिष्पन्ना शब्दस्यैषा तनुः स्मृता ॥ ४१ ॥
४छन्दोहीनो न शब्दोऽस्ति न च्छन्दः शब्दवर्जितम् ५ ।
६एवं तूभयसंयोगो नाट्यस्योद्योतकः स्मृतः ॥ ४२ ॥
यह छन्द—जो कि विभिन्न अक्षरों द्वारा वर्णिक वृत्त का स्वरूप
धारण करता है—शब्दों का ढांचा है। क्योंकि वृत्तहीन कोई शब्द तथा
शब्दहीन कोई वृत्त नहीं होता। ये दोनों परस्पर मिल कर ही नाट्य-
प्रयोग को अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचाते हैं ॥ ४१-४२ ॥
छन्दों के (वर्ण-संख्या के अनुसार पाद वाले) विभेद—
एकाक्षरं भवेदुक्तमत्युक्तं द्वयक्षरं भवेत् ।
७मध्यं त्र्यक्षरमित्याहुः प्रतिष्ठा चतुरक्षरा ॥ ४३ ॥
सुप्रतिष्ठा भवेत् पञ्च षड् गायत्री भवेदिहं ८ ।
९सप्ताक्षरा भवेदुष्णिगष्टौ चानुष्टुबिष्य१०ते ॥ ४४ ॥
नवाक्षरा तु बृहती पङ्क्तिश्चैव दशाक्षरा ।
११एकादशाक्षरा त्रिष्टुब्जगती द्वादशाक्षरा ॥ ४५ ॥
१. छन्दोयुक्तं—ख०; ग० ।
२. निबद्धं—ख० ग० ।
३. नानावृत्तविनिष्पन्नं शब्दमूलं तु तत्स्मृतम्—क० ।
४. न शब्दश्छन्दसा हीनो—क० ।
५. वर्जितः—ख० ग० ।
६. तस्मात्तूभयसंयुक्ते नाट्यस्योद्योतके स्मृते—ख०; ग० ।
७. मध्यमं त्र्यक्षरं प्रोक्तं—क० ।
८. तथैव च—क० ।
९. उष्णिक् सप्ताक्षरकृता त्वष्टाऽनुष्टुप् प्रकीर्तिता—क० ।
१०. उच्यते—क० ।
११. त्रिष्टुबेकादशा ज्ञेया—क० ।

२१४ नाट्यशास्त्रम्
त्रयोदशातिजगती शक्वरी तु चतुर्दश ।
दशपञ्चातिशक्वर्या अष्टिः स्यात् षोडशाक्षरा ॥ ४६ ॥
तथो सप्तदशात्यष्टिः धृतिरष्टादशाक्षरा ।
एकोनविंशातिधृतिः कृतिर्विंशतिरेव च ॥ ४७ ॥
प्रकृतिश्चैकविंशत्या द्वाविंशत्याकृतिस्तथा ।
विकृतिः स्यात्त्रयोविंशा चतुर्विंशापिँ संकृतिः ॥ ४८ ॥
पञ्चविंशत्यभिकृतिः षड्विंशत्यक्षरोत्कृतिः ।
(अक्षर गणना के अनुसार होने वाले छन्दों के भेदों में) एक अक्षर
के पाद वाला वृत्त 'उक्ता', दो अक्षरों वाला 'अत्युक्ता'. तीन अक्षरों वाला
'मध्या', चार अक्षरों वाला 'प्रतिष्ठा', पाँच अक्षरों वाला 'सुप्रतिष्ठा', छः
अक्षरों का 'गायत्री', सात अक्षरों का 'उष्णिक्', आठ अक्षरों का 'अनुष्टुप्',
नौ अक्षरों का 'बृहती', दस अक्षरों का 'पंक्ति', ग्यारह अक्षरों का 'त्रिष्टुप्'
बारह अक्षरों का 'जगती', तेरह अक्षरों का 'अतिजगती', चौदह अक्षरों
का 'शक्वरी', पन्द्रह अक्षरों का 'अतिशंकरी', सोलह अक्षरों का 'अष्टि',
सत्रह अक्षरों का 'अत्यष्टि', अट्ठारह अक्षरों का 'धृति', उन्नीस अक्षरों का
'अतिधृति', बीस अक्षरों का 'कृति', इक्कीस अक्षरों का 'प्रकृति', बाईस
अक्षरों का 'आकृति', तेईस अक्षरों का 'विकृति', चौबीस अक्षरों का
'संकृति', पच्चीस अक्षरों का 'अतिकृति' तथा छब्बीस अक्षरों का
'उत्कृति' होता है ॥ ४३-४९ ॥
अतोऽधिकाक्षरं छन्दो मालावृत्तमिति स्मृतम् ॥ ४९ ॥
१. अतिशक्करी पञ्चदश षोडशाष्टिः प्रकीर्तिता—क० ।
२. अत्यष्टिः स्यात् सप्तदश—क० ।
३. एकाधिका चातिधृतिः—क० ।
४. स्त्वेकविंशत्या—क० ।
५. विकृतिश्च त्रयो—ग० ।
६. चतुर्विंशा च—ख०; ग० ।
७. षड्विंश चोत्कृतिर्भवेत्—क० ।
८. यत् स्यात्—क०; यत्तु—ख०; ग० ।
९. तदिष्यते—ख०; ग० ।

पञ्चदशोऽध्यायः २१५
छन्दसाम्तु तथो¹ होते भेदाः प्रस्तारयोगतः ।
असंख्येय²प्रमाणानि वृत्तान्याहुरतो बुधाः ॥ ५० ॥
गायत्रीप्रभृतित्वेषां प्रमाणं सम्प्रवक्ष्यते³ ।
प्रयोगजानि सर्वाणि प्रायँशो⁴ न भवन्ति हि ॥ ५१ ॥
इससे अधिक अक्षरों के पाद वाले छन्द 'मालावृत्त' कहलाते हैं । छन्दों
के प्रस्तार के (योग) द्वारा अनेक भेद बनते हैं—जिन्हें बुधजन जाने ।
परन्तु इनकी संख्या गणना से परे है । गायत्री तथा अन्य कुछ छन्दों की
प्रस्तारगत संख्या या प्रमाण को ही यहाँ हम बतला रहे हैं । क्योंकि छन्दों
के ये सभी भेद उपयोग में नहीं आते ॥ ४९-५१ ॥
वृत्ता॑⁵नि च चतुःषष्टि गायत्र्यां कीर्तितानि तु ।
शतं विंशतिरष्टौ च वृत्तान्युष्णिग् ह्यथोच्यते⁶ ॥ ५२ ॥
षट्पञ्चाशच्छते⁷ द्वे च वृत्तानामप्यनुष्टुभि⁸ ।
शतानि पञ्च वृत्तानां बृहत्यां⁹ द्वादशैव तु ॥ ५३ ॥
पङ्क्त्यां¹⁰ सहस्रं वृत्तानां चतुर्विंशतिरेव तु ।
त्रैष्टुभे¹¹ द्वे सहस्रे च चत्वारिंशत्तथाष्ट च ॥ ५४ ॥
१. भास्कराचार्य ने लीलावती में छन्दों के प्रस्तारजन्य भेदों को बनाने की
गणितप्रक्रिया बतलाई है । (दे० ली० व० ख० ८४)
१. भवेदेषां भेदोऽनेकविधः पृथक्—ख०; ग० ।
२. असंख्यपरि—ख०; ग० ।
३. संविधीयते—ख०; ग० ।
४. प्रायस्तानी—क०; ग० ।
५. वृत्तानां हि चतुष्षष्टिगायत्री परिकीर्तिता—ख०; ग० ।
६. न्युष्णिगथोच्यते—ख० ।
७. छतं—ख०; ग० ।
८. प्यनुष्टुभः—ख०; ग० ।
९. बृहत्या—क० ।
१०. पङ्क्तेः—क०; ग० ।
११. त्रिष्टुभो द्वि—क० ।

२१६ नाट्यशास्त्रम्
सहस्राण्यथ चत्वारि नवतिश्च षडुत्तरा ।
जगत्यां समवर्णानां वृत्तानामिह सर्वशः ॥ ५५ ॥
शतमष्टौ सहस्राणि द्वयधिका नवतिः पुनः ।
जगत्यामतिपूर्वायां वृत्तानां संर्वेशो भवेत् ॥ ५६ ॥
शतानि त्रीण्यशीतिश्च सहस्राण्यपि षोडश ।
वृत्तानि चैव चत्वारि शकर्याः परिसंख्यया ॥ ५७ ॥
द्वात्रिंशत्तु सहस्राणि सप्त चैव शतानि च ।
अष्टौ षष्टिश्च वृत्तानि ह्याश्रयन्त्यतिशकरीम् ॥ ५८ ॥
पञ्चषष्टि सहस्राणि सहस्रार्धन्तु संख्यया ।
षड्विंशच्चैव वृत्तानि तथाष्ट्यां गदितानि तु ॥ ५९ ॥
एकत्रिशत्सहस्राणि वृत्तानाञ्च द्विसप्ततिः ।
तथा शतसहस्रञ्च छैन्दस्यत्यष्टिसंज्ञिते ॥ ६० ॥
धृत्यामपि हि पिण्डेन वृत्तान्याकलितानि तु ।
तैर्ज्ञैः शतसहस्रे द्वे शतमेकं तथैव च ॥ ६१ ॥
द्विषष्टिश्च सहस्राणि चत्वारिंशच्च योगतः ।
चत्वारि चैव वृत्तानि ⁸समसंख्याश्रयाणि तु ॥ ६२ ॥
अतिधृत्यां सहस्राणि चतुर्विंशतिरेव च ।
तथा शतसहस्राणि पञ्चवृत्तशतद्वयम् ॥ ६३ ॥
अष्टाशीतिश्च वृत्तानि वृत्तज्ञैः कथितानि तु ।
कृतौ शतसहस्राणि दश प्रोक्तानि सङ्ख्यया ॥ ६४ ॥
१. समपादानां—क०; जगत्यामतिपूर्वायां—ग० ।
२. परिमाणतः—क०; ग० ।
३. वृत्तानां संश्रयन्त्यतिशकरीम्—क० ।
४. तथाष्टौ—क० ।
५. स्यादत्यष्टौ परिसंख्यया—क० ।
६. वृत्तमाकलितं मया—ख०; ग० ।
७. तथा—ख०; ग० ।
८. शतसंख्यानि यानि तु—ख०; ग० ।

चत्वारिंशत्तथाष्टौ च सहस्राणि शतानि च ।
पञ्चषट्सप्ततिश्चैव वृत्तानां १परिमाणतः ॥ ६५ ॥
तथा शतसहस्राणां प्रकृतौ विंशतिर्भवेत् ।
सप्त वै गदितान्यत्र नवतिश्चैव सङ्ख्यया ॥ ६६ ॥
सहस्राणि शतञ्चैकं द्विपञ्चाशत्तथैव च ।
वृत्तानि परिमाणेने वृत्तज्ञैः गदितानि तु ॥ ६७ ॥
चत्वारिंशत्तथैकञ्च सहस्राणां शतानि तु ।
तथा चेह सहस्राणि नवतिश्चतुरोत्तरा ॥ ६८ ॥
शतत्रयं समाख्यातं ह्याकृत्याञ्चतुरोत्तरम् ।
ज्ञेयं शतसहस्राणामशीतिस्त्र्यधिका बुधैः ॥ ६९ ॥
अष्टाशीतिसहस्राणि वृत्तानां षट्शतानि च ।
अष्टौ चैव तु वृत्तानि विकृत्यां गदितानि तु ॥ ७० ॥
तथा शतसहस्राणि सप्तषष्टिश्च सप्ततिः ।
सप्त चैव सहस्राणि षोडश द्वे शते तथा ॥ ७१ ॥
कोटिश्चैवेह वृत्तानि सङ्कृतौ कथितानि वै ।
तथा शतसहस्राणि पञ्चत्रिंशच्च संख्यया ॥ ७२ ॥
तिस्रः कोट्यः सहस्राणि चतुष्पञ्चाशदेव च ।
१. प्रविभागशः—क० ।
२. शतसहस्राणि—क० ।
३. कलितानि तु । विंशतिर्नवतिश्चैव सप्त चैव हि संख्यया—क० ।
४. प्रविभागेन—क० ।
५. बुधैः शतसहस्राणि चत्वारिंशत्ततः परम् । नवतिश्चैव चत्वारि सहस्राणि
शतत्रयम् । चत्वारि चैव वृत्तानि कथितान्याकृतौ बुधैः ॥—क० ।
६. तथा शतसहस्राणामशीतित्रिकसंयुता । अष्टाशीति सहस्राणि षडष्टौ च
शतानि च । वृत्तानि विकृतौ छन्दस्युद्दिष्टानीह संख्यया—क० ।
७. कोटिष्षडधिका नित्यं सप्तसप्ताधिका पुनः । सप्त चैव सहस्राणि वृत्ता-
नाञ्च शतद्वयम् । षोडशोत्तरमाख्यातं सङ्कृत्यां परिमाणतः ॥—क० ।
८. कोटित्रयञ्चाभिकृत्यां पञ्चत्रिंशद्विरन्वितम् । पञ्चाशद्भिः सहस्रैस्तु
चतुर्भिरधिकैस्तथा । चतुष्टयं शतानां च द्वात्रिंशद्भिः समन्वितम् ।—क० ।

२१८ नाट्यशास्त्रम्
शतानि चत्वारि तथा द्वात्रिंशत् प्रविभागतः ॥ ७३ ॥
वृत्तान्यभिकृतौ चैव छन्दोज्ञैः कथितानि वै ।
षट्कोट्यस्तु सहस्राणां शतानि ह्येकसप्ततिः ॥ ७४ ॥
अष्टौ चैव सहस्राणि शतान्यष्टौ तथैव च ।
चतुष्षष्टिस्तु वृत्तानि ह्युत्कृतावपि सङ्ख्यया ॥ ७५ ॥
उक्ताद्युत्कृतिजातानि वृत्तसंख्याविचक्षणैः ।
एतेन च विकल्पेन वृत्तान्येतानि निर्दिशेत् ॥ ७६ ॥
सर्वेषां छन्दसामेवं वृत्तानि कथितानि वै ।
तिस्रः कोट्यो दश तथा सहस्राणां शतानि च ॥ ७७ ॥
चत्वारिंशत्तथा द्वे च सहस्राणि दशैव तु ।
सप्तभिः सहितान्येव सप्तचैव शतानि च ॥ ७८ ॥
( इन भेदों में ) गायत्री छन्द के वृत्तों का प्रमाण ( चौसठ ) ६४,
उष्णिक् छन्द के वृत्तों का प्रमाण ( एक सौ अट्ठाईस ) १२८, अनुष्टुप् वृत्त
की संख्या ( दो सौ छप्पन ) २५६, बृहती की ५१२, पंक्ति की १०२४,
त्रिष्टुप की २०४८, जगती की ४०९६, अतिजगती छन्द की ८१९२, शक्वरी
की १६३८४, अतिशक्वरी की ३२७६८, अष्टि की ६५५३६, अत्यष्टि की
१३१०७२, धृति की २६२१४४, अतिधृति की ५२४२८८, कृति की
१०४८५७६, प्रकृति की २०९७१५२, आकृति की ४१९४३०४, विकृति की
८३८८६०८, संकृति की १६७७७२१६, अतिकृति की ( अभिकृति की )
३३५५४४३२ तथा उत्कृति की प्रमाण संख्या ६७१०८८६४ हो जाती है ।
इस प्रकार क्रम से उत्कृति आदि छन्दों की ( प्रस्तारगत ) संख्या बतलायी
१. षट्कोट्यस्तु तथोत्कृत्यां लक्षाणामेकसप्ततिः । चतुःषष्टि शतान्यष्टौ सहस्रा-
ण्यष्ट एव तु ।—क०; ख० ।
२ सर्वेषां छन्दसां पिण्डं कोट्योऽत्र त्रयोदश । शतानि सप्त सप्तैव सहस्राणि
दशैव च । तथा शतसहस्राणां द्विचत्वारिंशदत्र हि । षड्विंशतिश्च वृत्तानामित्यर्थं
चानन्तमुच्यते ( चान्यत् समुच्यते—ख०, ग० )—क० ।
३. वृत्तांशं कथितं मया—ख०; ग० ।
४. कोट्यस्त्रयोदश तथा चत्वारिंशद्वयं तथा । ज्ञेयं शतसहस्राणां ततो दश
च सप्त च । सहस्राणि ततः सप्तशतानि प्रविभागशः । षड्विंशति च वृत्तानि
वृत्तसंख्याविचक्षणैः ।—क० ।

पञ्चदशोऽध्यायः २१९
गयी, जिनकी इसी के अनुसार योजना करनी चाहिये। इन सभी छन्दों
की सम्पूर्ण प्रमाण-संख्या का योग १३४२१७७२६ होता है ॥ ५२-७८ ॥
छन्दों की विभेदक अन्य पद्धति—
षड्विंशतिरिहान्यानि व्याख्यातानि समासतः ।
समानि गणनायुक्तिमाश्रित्य कथितानि वै ॥ ७९ ॥
सर्वेषां छन्दसामेवं त्रिकैर्वृत्तं प्रयोजयेत् ।
एकं वा विंशतिं वापि सहस्रं कोटिरेव वा ॥ ८० ॥
ज्ञेया ह्यष्टौ त्रिकास्तत्र संज्ञाभिः स्थानमक्षरम् ।
त्रीण्यक्षराणि विज्ञेयस्त्रिकोऽशः परिकल्पितः ॥ ८१ ॥
गुरुलध्वक्षरकृतः सर्ववृत्तेषु नित्यशः ।
अभी मैंने गणना प्रमाण के द्वारा २६ अक्षरों तक के छन्दों के भेदों
को बतलाया। इन छन्दों या वृत्तों का त्रिकों (गणों) के द्वारा गठन किया
जाता है। चाहे ये वर्णवृत्त एक, बीस, सहस्र या करोड़ विभेदों को धारण
किये हों किन्तु सामान्यतः इन वृत्त या वृत्तों के स्वरूपगठन में यहाँ गणों
का नियमविधान रहता है तथा इसी से सारा काम चलता है।
ये गण आठ हैं जो तीन अक्षरों से निर्मित होते हैं। इनका अपने
स्वरूपानुसार पृथक्-पृथक् नाम रहता है। गुरु तथा लघु वर्णों के तीन
अक्षरों से निर्मित 'गण' कहलाते हैं तथा इन्हीं से प्रत्येक छन्द का आकार
बनता है। इन्हें 'त्रिक' भी कहते हैं ॥ ७९-८२ ॥
गुरुपूर्वो भकारः स्यान्मकारस्तु गुरुत्रयम् ॥ ८२ ॥
जकारो गुरुमध्य॑स्तु सकारोऽन्तगुरुस्तथा ।
लघुमध्यस्तु रेफः स्यात्तकारोऽन्तलघुस्तथा ॥ ८३ ॥
१. एतेषां तु पुनर्ज्ञेयं त्रिकैर्वृत्तप्रवर्तनम् । एकं वा विंशतिर्वापि सहस्रं कोटिरेव
च । सर्वेषां छन्दसामेवं वृत्तानां वा द्विजोत्तमाः । ज्ञेयास्त्वष्टौ त्रिकास्तत्र स्वसं-
ज्ञाभिः पृथक्-पृथक् ॥—ख०; ग० ।
२. मकारो गुरुकत्रयम्—क०; मकारस्तु गुरुत्रिकम्—ख०; ग० ।
३. गुरुमध्यस्थः—ख०; ग० ।
४. लघुमध्यस्थितो रेफः—ख० ग० ।
५. सकारोऽन्तलघुस्तथा—ख०; ग० ।

२२० नाट्यशास्त्रम्
लघुपूर्वो यकारस्तु नकारैस्तु लघुत्रयम् ।
इन त्रिकों में यदि आदि गुरु हो तो भगण ( ऽ।। ), तीनों गुरु हों तो
मगण ( ऽऽऽ ), गुरु मध्य में हो तो जगण ( ।ऽ। ), अन्त में गुरु हो तो
सगण ( ।।ऽ ), मध्य में लघु हों तो रगण ( ऽ।ऽ ), अन्त में लघु हो तो
तगण ( ऽऽ। ), आदि में लघु हो तो यगण ( ।ऽऽ ) तथा तीनों लघु होने
पर नगण ( ।।। ) कहलाता है ॥ ८२-८४ ॥
एते ह्यष्टौ त्रिकौ नाम्ना विज्ञेयौ ब्रह्मसम्भवाः ॥ ८४ ॥
लाघवार्थं पुनरमी छन्दोमानमवेक्ष्य च ।
५एभ्यो विनिर्गताश्चान्या जातयोऽथ समादयः ॥ ८५ ॥
अस्वराः सस्वराश्चापि प्रोच्यन्ते वृत्तलक्षणैः ।
गुर्वैकं गितिविज्ञेयं तथा लघु लितिस्मृतम् ॥ ८६ ॥
ये आठ 'त्रिक' ( गण ) हैं—जो ब्रह्मा से उत्पन्न हुए। ये गण छन्द-
शास्त्र में लाघव तथा छन्दों के प्रमाण बतलाने के लिए निर्मित किये
गये हैं । ( इन्हीं से समादि वृत्त ) सम, अर्धसम तथा विषम और जाति
( आर्यादि मात्रागणना के लक्षण वाली ) की उत्पत्ति हुई । ये छन्द के
लक्षण-वेत्ताओं द्वारा सस्वर तथा अस्वर रूप में ( भी ) प्रयुक्त किये जाते
हैं । यहाँ एक दीर्घवर्ण को 'ग्' तथा लघु वर्ण को 'ल्' के संकेत द्वारा
समझना भी चाहिये ॥ ८४-८६ ॥
नियतः पदविच्छेदो यतिरित्यभिसंज्ञिता ।
गुरुर्दीर्घं प्लुतश्चैव संयोगपरमेव च ॥ ८७ ॥
सानुस्वारविसर्गश्च तथान्त्यश्च लघु क्वचित् ॥ ८८ ॥
१. नकारश्च—क० ।
२. त्रिका ज्ञेया—क० । ३. प्राज्ञैर्विज्ञेया—क०; ख० ।
४. मपेक्ष्य—क० ।
५. इदं श्लोकार्थं ख०-ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
६. इच्चैव—ख०; ग० ।
७. लक्षणम्—क०; लक्षणे—ख० ।
८. त्यभिधीयते—ख०; ग० ।
९. अस्मात् परं कपुस्तके ।

पञ्चदशोऽध्यायः २२१
सम्पद्वीरामपादश्च देवै¹तास्थानमक्षरम् ।
²वर्णः स्वरा विधिर्वृत्तमिति छन्दोगतो विधिः ॥ ८९ ॥
(छन्दों में) दो शब्दों (पदों) का निश्चित स्थान पर पृथक् या
विच्छिन्न रहना 'यति' या विराम कहलाता है। दीर्घ, प्लुत, अनुस्वार
तथा विसर्ग से युक्त होने पर तथा संयुक्ताक्षर के पूर्व का वर्ण गुरु होता है
तथा कभी-कभी पादान्त में वर्ण गुरु तथा कभी लघु हो जाता है।
छन्दोविधान में सम्पद्, विराम, पाद, देवता, स्थान, अक्षर, वर्ण,
स्वर, विधि तथा वृत्त होते हैं ॥ ८७-८९ ॥
सम्पद—
नैवा³तिरिक्तं हीनं वा यत्र सम्पद्यतेऽक्षरम् ।
विधाने छन्दसामेषा सम्पदित्य⁶भिसंज्ञिता ॥ ९० ॥
जिस छन्द में वर्णों की संख्या न अधिक और न कम हो उस
नियमानुसार पूर्ण छन्द को 'सम्पद' जानो ॥ ९० ॥
विराम—
यत्रार्थस्य समाप्तिः स्यात् स विराम इति स्मृतः ।
छन्द में उद्दिष्ट अर्थ की समाप्ति हो जाना 'विराम' कहलाता है।
पाद—
पादश्च⁷ पद्यतेर्धातोश्चतुर्भागः प्रकीर्तितः ॥ ९१ ॥
'पाद' शब्द पद् धातु से निष्पन्न होता है। छन्द का एक चौथाई भाग
'पाद' कहलाता है ॥ ९१ ॥
१. दैवतस्थानमक्षरम्—ग० ।
२. वर्णस्वराधिकैः--क०; वर्णस्वरोऽधिकं—ग० ।
३. हीनं नैवातिरिक्तञ्च यत्तु स्यात् पादयोगतः ।
विधाने छन्दसामस्मिन् सा हि सम्पदुदाहृता ॥—क० ।
४. क्रमः—ग० ।
५. विविधा—क० ।
६. त्यभिधीयते—क० ।
७. पादस्य—क० ।
८. गत्यर्थात् सम्प्रकीर्तितः—क०, चतुर्भाग इति स्मृतः—ग० ।