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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 668 में से

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पृष्ठ 316

पञ्चदशोऽध्यायः २०५
विसर्ग का कण्ठ तथा क, ख का जिह्वामूलीय, प, फ तथा उ का ओष्ठ
तथा स्वरों का विवृत उच्चारण स्थान है। क से म तक स्पृष्ट तथा श, ष, स,
ह विवृत कहलाते हैं। अन्तस्थ का संवृत ङ, ञ, ण, न, म का नासिका
उच्चारण स्थान है। श, ष, स, ह उष्मा, य, र, ल, व अन्तस्थ, क
जिह्वामूलीय तथा प उपध्मानीय होता है।
क, च, ट, त, प स्वरित, ख, छ, ठ, थ, फ कण्ठ्य, (कम्य ?) ग,
ज, ड, द, ब (घ, झ, ढ, ध, भ) कण्ठ तथा उरस्थल से उच्चारित किये
जाते हैं।
विसर्जनीय जिह्वा के मूल भाग से उच्चरित होने वाला समझना
चाहिये ॥ १४-१८ ॥
एते व्यञ्जनवर्गाः समासतः संज्ञया कथिताः ।
शब्दप्रयोगविषये स्वरांस्तु भूयः प्रवक्ष्यामि ॥ १९ ॥
इस प्रकार संक्षेप से व्यञ्जनवर्ग का मैंने वर्णन किया। अब मैं शब्द
प्रयोग के विषय में (की दशा में) स्वरों का कार्य बतलाता हूँ ॥ १९ ॥
स्वरः तथा उनका परिमाण—
य इमे स्वराश्चतुर्दश निर्द्दिष्टास्तत्र वै दश समानाः ।
पूर्वो ह्रस्वस्तेषां परश्च³ दीर्घो विधातव्यः ॥ २० ॥
मैंने पहिले जो चौदह स्वर बतलाये उनमें १ से १० तक के (स्वर)
समान कहलाते हैं। इन समान स्वरों में क्रमशः पहिला ह्रस्व और दूसरा
दीर्घ होता है ॥ २० ॥
शब्दों के विभेद—
४एभिर्व्यञ्जनवर्गैर्नामाख्यातोपसर्गवनिपातैः ।
तद्धितसन्धिविभक्तिभिरधिष्ठितः शब्द इत्युक्तः ॥ २१ ॥
१. व्यंजनों के उच्चारण स्थान तथा उनकी परम्परा आदि के विशेष
विवरण पाणिनि-शिक्षा तथा पातंजल-महाभाष्य आदि में भी देखे जा सकते हैं।
१. शब्दविषयप्रयोगे—क० ।
२. अस्मात्परं—यस्मिन् स्थानेषु समो विज्ञेयो यः सवर्णसंज्ञोऽसौ ।
इति क० पुस्तकेऽधिकम् ।
३. परस्तु दीर्घो विनिर्द्देश्यः—क०; परश्च दीर्घोऽवगन्तव्यः—क० ।
४. इत्थं व्यञ्जनयोगैः परैश्च साख्यातनामपदविहितैः ।
काव्यनिबन्धाश्च स्युर्धातुनिपातोपसर्गैस्तु ।—क० ।