नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 314, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें( गद्यभाग ) ( 'अ' से प्रारम्भ होने वाले ) स्वर चौदह हैं—अ, आ,
इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऌ, ए ऐ ओ औ तथा क से प्रारम्भ होने वाला
व्यञ्जन समूह है—क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, न, प, फ, ब, भ, म, य, र,
ल, व, श, ष, स, ह ।
व्यञ्जन—तथा उनके उच्चारण स्थान—
वर्गे वर्गे समाख्यातौ द्वौ वर्णौ प्रागवस्थितौ ।
अघोषा इति ये त्वन्ये सघोषाः परिकीर्तिताः ॥ ९ ॥
प्रत्येक वर्ग के प्रारम्भ के दो ( व्यञ्जन ) वर्ण ( जैसे—क, ख तथा श,
ष, स ) अघोष तथा शेष सभी वर्ण सघोष ( घोष ) कहलाते हैं ॥ ९ ॥
एते घोषाघोषाः कण्ठ्यौष्ठ्या दन्त्यजिह्वनासिक्याः ।
ऊष्माणस्तालव्यो विसर्जनीयाश्च बोद्धव्याः ॥ १० ॥
ये घोष तथा अघोष वर्ण कण्ठ्य, ओष्ठ्य, दन्त्य, जिह्व्य, नासिक्य,
ऊष्माण, तालव्य तथा विसर्जनीय भेद से आठ स्थानों से उच्चारित
होते हैं ।
ग घ ङ ज झ ञ ड ढ ण द ध न ब भ म य³ र ल वा मता घोषाः ।
क ख च छ ट ठ त थ प फ⁴ श ष सा इति वर्गेष्वघोषाः स्युः ॥ ११ ॥
इस व्यञ्जन समूह में ग घ ङ, ज झ ञ, ड ढ ण, द ध न, ब भ म,
१. जिह्व्य वर्णों का किसी व्याकरण में विवरण नहीं मिलता, सम्भवतः
यह मूर्धन्य के स्थान का निर्देश करता है क्योंकि मूर्धन्य वर्णों की ध्वनि में
जिह्वा का महत्वपूर्ण योगदान रहता है ।
दन्त्या; उपूध्मानीया ओष्ठ्या; इत्युपध्मानीयः, इति जिह्वामूलीयः, ए ऐ कण्ठ-
तालव्यौ, ओ औ कण्ठौष्ठ्यौ, वकारो दन्तोष्ठ्यः, ङ-ञ-ण न-मा अनुनासिकाः,
विसर्जनीयस्योरस्य इत्येके सर्वमुखस्थानमवर्णमित्यपरे ।
द्वौ द्वौ वर्णौ तु वर्गाद्यौ शषसाश्च त्रयोऽपरे ।
अघोषा घोषवन्तश्च ततोऽन्ये परिकीर्तिताः ॥ इति-क० पुस्तकेऽधिकम् ।
१. कण्ठ्योष्ठ(ष्ठ्य)दन्त (न्त्य)जिह्नानुनासिक्यः— ख०; ग० ।
२. स्तालव्य विसर्जनीयाश्च—ख०; ग० ।
३. तथैव य र ल व हा घोषाः—ख०; ग० ।
४. प फ इति वर्गेष्वघोषाः स्युः—ख० ग० ।