नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 313, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें२०२ नाट्यशास्त्रम्
पाठ्य के विभिन्न आधार—
व्यञ्जनानि स्वरा¹श्चैव सन्धयोऽथ विभक्तयः।
नामाख्यातोपसर्गाश्च निपातास्तद्धितास्तथा॥ ६॥
एतै²रङ्गैः समासैश्च नानाधातुसं³माश्रयम्।
विज्ञेयं संस्कृतं पाठ्यं प्र⁴योगश्च निबोधत॥ ७॥
संस्कृत-पाठ्य व्यञ्जन, स्वर, सन्धि, विभक्ति, नाम (संज्ञा) आख्यात
(क्रिया) उपसर्ग, निपात, तद्धित समास तथा नाम धातु के द्वारा निर्मित
(या आश्रय से युक्त) होता है। अब मैं इनका सलक्षण प्रयोग बतलाता
हूँ॥ ६-७॥
पाठ्यवर्ण-निरूपण—
अकारा⁵द्याः स्वरा ज्ञेया औकारान्ताश्चतुर्दश।
हका⁶रान्तानि कादीनि व्यञ्जनानि विदुर्बुधाः॥ ८॥
'अ' कार से प्रारम्भ होकर 'औ' कार तक पूर्ण हो जाने वाले चौदह
स्वर तथा 'क' से प्रारम्भ होकर 'ह' पर समाप्त हो जाने वाले वर्ण व्यञ्जन
कहलाते हैं॥ ८॥
अत्र स्वराश्चतुर्दश कादीनि व्यञ्जनानि यथा—अ आ इ ई उ ऊ
ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ स्वरा ज्ञेयाः। व्यञ्जनानि यथा—क ख ग
घ ङ, च छ ज झ ञ, ट ठ ड ढ ण, त थ द ध न, प फ ब भ म, य
र ल व, श ष स हः इति व्यञ्जनवर्गाः।⁷
१. शिक्षा तथा प्रातिशाख्य ग्रन्थों में वर्णों (स्वरों) की विभिन्न संख्याएँ
बतलाई गई हैं जिनमें पाणिनि-शिक्षा में इनकी संख्या २२ है। अन्य प्रातिशाख्यों
और ऋक्तन्त्रव्याकरण में इनकी संख्या क्रमशः १३, १६ तथा २३ प्राप्त होती
है। पाणिनिशिक्षा में अनुस्वार, विसर्ग जिह्वामूलीय और उपध्मानीय को भी
व्यञ्जनान्तर्गत माना गया है।
१. स्वरश्चैव—क०। २ तथा समासा इत्येवं; एतैरङ्गविधानैश्च—क०।
३. गवेक्षितम्—क०। ४. तद्वक्ष्यामि समासतः—ख०; ग०।
५. अकारादि—क०। ६. ककारादीनि हान्तानि—क०।
७. अस्मादनन्तरं क० पुस्तके तु—
अष्टौ स्थानानि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस्तथा।
जिह्वामूलञ्च दन्ताश्च नासिकोष्ठौ च तालु च॥
अकुहविसर्जनीयाः कण्ठ्याः, इचुयशास्तालव्याः, ऋटुरषा मूर्धन्याः, लुतुलसा