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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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२०६ : नाट्यशास्त्रम्
इस प्रकार इन स्वर तथा व्यंजनों के योग से तथा आख्यात (क्रिया,
धातु) नाम (संज्ञा), उपसर्ग, निपात, तद्धित, सन्धि तथा विभक्ति से
अधिष्ठित शब्द होता है ॥ २१ ॥
पूर्वाचार्यैरुक्तं शब्दानां लक्षणन्तु विस्तरतः ।
पुनरेव संहृतार्थं लक्षणतः सम्प्रवक्ष्यामिं ॥ २२ ॥
प्राचीन आचार्यों ने शब्द का विस्तारपूर्वक लक्षण (निर्दिष्ट) किया
है। मैं उनका संक्षेप में (सार भूत) लक्षण प्रसंगवश बतलाऊँगा ॥ २२ ॥
नाम (संज्ञा)—
स्वौ⁴चाद्यधिकारगुणैरर्थविशेषैर्विभूषितन्यासम्⁵ ।
प्रातिपदिकार्थलिङ्गैर्युक्तं⁶ पञ्चविधमिदं ज्ञेयम् ॥ २३ ॥
संज्ञा (नाम)—अपने 'सु' आदि विभक्ति प्रत्ययों तथा उनके द्वारा
प्रकट होने वाले विशेष अर्थों से युक्त होती है। इसके पाँच प्रकार होते हैं
तथा यह प्रातिपदिकार्थ तथा लिंग से युक्त होती है ॥ २३ ॥
१. नाम या संज्ञा के पाँच प्रकार संक्षिप्तसार के अनुसार इस प्रकार हैं—
(१) उणाद्यन्त, (२) कृदन्त, (३) तद्धितान्त, (४) समासान्त तथा (५)
शब्दानुकरण ।
उणाद्यन्तं कृदन्तञ्च तद्धितान्तं तथैव च ।
शब्दानुकरणं चैव नाम पञ्चविधं स्मृतम् ॥ (संक्षिप्त सार-विवरणे—गोपीचन्द्रः)
२. प्रादिपदिकार्थ के विषय में विविध मत हैं—पाणिनि ने प्रातिपदिक या
१. विस्तरतो लक्षणन्तु शब्दानाम् । सङ्क्षेपादहमेषां लक्षणमर्थञ्च
वक्ष्यामि—क०।
२. अस्मादनन्तरम्—
अर्थप्रधानं नाम स्यादाख्यातन्तु क्रियाकृतम् ।
द्योतयन्त्युपसर्गास्तु विशेषं भावसंश्रयम् ॥ २३ ॥
नामाख्याताथंविषयं विशेषं द्योतयन्ति ते ।
पृथक् तत्रोपसर्गेभ्यो निपाता नियमे च्युते ॥ २४ ॥ इति क० पुस्तक
टिप्पण्यामधिकं पद्यद्वयमुपलभ्यते ।
३. एतस्य स्थाने च—
उद्दिष्टं शब्दानां लक्षणमेतत् समासयोगेन ।
प्रकरणवशाद्धि तदहं विस्तरतः सम्प्रवक्ष्यामि ॥ इति क० पुस्तके लभ्यते ।
४. स्वाद्यत्यधिकार—ख०, ग० । ५. विभूषितन्यासा—ख०; ग० ।
६. लिङ्गयुक्तम्—ख०, ग० ।