नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
चतुर्दशोऽध्यायः १९१
हिमवत्संश्रिता ये तु गङ्गायाश्चोत्तरां दिशम् ।
ये² श्रिता वै जनपदास्तेषु पाञ्चालमध्यमा ॥ ४८ ॥
पांचाल, शौरसेन, काश्मीर, हस्तिनापुर, वाल्हीक, शाकल (शल्यक
या शाल्व) मद्र, उशीनर प्रदेश तथा गंगा नदी के उत्तर में या हिमाचल
पर स्थित प्रदेश हैं, ये सभी पांचालमध्यमा प्रवृत्ति को ग्रहण करते हैं ॥
पाञ्चालमध्यमायान्तु सात्वत्यारभटी स्मृताै ।
प्रयोगस्त्वल्पगीतार्थ आविद्धगतिविक्रमः ॥ ४९ ॥
इस (पांचालमध्यमा) प्रवृत्ति में सात्वती तथा आरभटी वृत्ति का
प्राधान्य रहता है। इसके व्यवहार में गीत की न्यूनता तथा असामान्य
गति और पादचालन का आधिक्य रखा जाता है ॥ ४९ ॥
प्रवृत्ति (के अवेक्षण) में दो क्रियाएं—
द्विधा क्रिया भवत्यासां रङ्गपीठपरिक्रमे ।
प्रदक्षिणप्रवेशाँ च तथा चैवाप्रदक्षिणा ॥ ५० ॥
रंगमंच पर चलने में उपयोग की जाने वाली क्रियाएं इन प्रवृत्तियों के
द्वारा दो प्रकार से प्रदर्शित की जाती हैं—एक दाहिनी ओर से तथा दूसरी
बायीं ओर से मंच पर प्रवेश करते हुए ॥ ५० ॥
आवन्ती दाक्षिणात्या च प्रदक्षिणपरिक्रमे ।
अपसव्यप्रवेशाँ तु पाञ्चाली चोढ्रमागधी ॥ ५१ ॥
आवन्ती तथा दाक्षिणात्या प्रवृत्ति में दाहिनी ओर से रंगमंच पर
प्रवेश कर चलना होता है तथा पांचाली और औढ्रमागधी प्रवृत्ति में यह
बायीं ओर से रहता है ॥ ५१ ॥
आवन्त्यां दाक्षिणात्यायां पार्श्वद्वारमथोत्तरम् ।
पाञ्चाल्यामोढ्रमागध्यां योज्यं द्वारन्तु दक्षिणम् ॥ ५२ ॥
आवन्ती तथा दाक्षिणात्या प्रवृत्ति में उत्तर दिशा के बाजू के द्वार से
तथा पांचाली और औढमागधी में दक्षिण प्रवृत्ति द्वार से प्रवेश करने की
योजना करनी चाहिए ॥ ५२ ॥
१. तथा प्राप्य प्रदक्षिणम्—क० । २. ये चाश्रिता—क० ।
३ श्रिता—क० । ४ प्रदेशास्तु—ख०; ग० ।
५. प्रदेशा च—ख०; ग० । ६. योज्यं द्वार—ख०; ग०, घ० ।
१९२ नाट्यशास्त्रम्
एकीभूताः पुनश्चैताः प्रयोक्तव्याः प्रयोक्तृभिः ।
पर्षदं देशकालौ चाप्यर्थयुक्तिमवेक्ष्य च ॥ ५३ ॥
परन्तु किसी विशेष सभा, स्थान, कार्य तथा प्रयोजन ( अर्थ ) या
अर्थ विशेष की अभिव्यक्ति को देखते हुए इन नियमों को सम्मिलित
( एकत्रित या समान ) भी कर सकते हैं ॥ ५३ ॥
येषु देशेषु या कार्या प्रवृत्तिः परिकीर्तिता ।
तद्वृत्तिकानि रूपाणि तेषु तज्ज्ञः प्रयोजयेत् ॥ ५४ ॥
चतुर नाट्य प्रयोक्ता इन प्रवृत्तियों में से जिन देशों में जो व्यवहार
होते हों वहां नाट्य प्रदर्शन करते समय वैसी ही प्रवृत्तियां बतलाएं ॥५४॥
एकीभूताः पुनस्त्वेताः नाटकादौ भवन्ति हि ।
अवेक्ष्य वृत्तिबाहुल्यं तत्तत् कर्म समाचरेत् ॥ ५५ ॥
ये नियम ( नाटिकादि ) नाट्य¹ रचना में सम्मिलित रूप में
रखने पर संक्षिप्त किये जाएं तथा प्रवृत्तियों की अधिकता को देखते हुए
प्रयोक्ताजन इनके आवश्यक या महत्वपूर्ण कुछेक कार्यों का प्रयोग या
प्रदर्शन करें ।
सार्थे बाहुल्यमेकस्य शेषाणामथ बुद्धिमान् ।
येषामन्यस्य बाहुल्यं प्रवृत्तिं पूरयेत्तथा ॥ ५६ ॥
जिसमें सभी का सामूहिक (सार्थ) या मिश्र रूप हो वहां किसी एक का
तथा जहां वैसा न हो वहां शेष का, इसी प्रकार जहां दूसरे की अधिकता
न हो वहां प्रवृत्तियों की बीच में अधिकता से पूर्ति करनी चाहिए ॥ ५६ ॥
१. आशय यह हे कि जिन प्रदेशों या देशों में जिस वृत्ति का उपयोग होता
हो या जिन वृत्तियों में जनसमुदाय रुचि लेता हो वहाँ प्रस्तुत किये जाने वाले
नाटकादि में उसी देश के नायक, या अन्य प्रवृत्तियों को प्रधानता देते हुए नाट्य-
प्रयोग प्रस्तुत करना चाहिए । यह कार्य कविगण अपनी रचना में तथा प्रयोक्ता-
गण अपने प्रयोग के प्रस्तुतीकरण में बिना किसी अपवाद के अवश्य रखें ।
१. वर्षञ्च देशं कालञ्च—क०; देशं कालमवस्थाञ्च काव्ययुक्तिमवेक्ष्य च—
क०; वर्षञ्च देशं कालौ चाप्यर्थयुक्तिमवेक्ष्य च—ख० ।
२. पूर्वं—क०; ख; ग० । ३. यदा त्वेताः—क० ।
४. गानकादौ—ख०; ग० । ५. कर्माचरेत् सदा—ख० ग० ।
६. पद्यमिदं ख—पुस्तके नास्ति । ७. यस्यान्यस्येऽस्य—क० ।
चतुर्दशोऽध्यायः १९३
नाट्य रचना के दो सामान्य प्रकार—
प्रयोगो द्विविधश्चैव विज्ञेयो नाटकाश्रयः।
सुकुमारस्तथाविद्धो नाट्ययुक्तिसमाश्रयः ॥ ५७ ॥
नाट्य व्यवहार (नियम) के अनुसार नाट्य प्रयोग दो प्रकार का
सामान्य रूप में माना जाता है। ये हैं—सुकुमार तथा आविद्ध ॥ ५७ ॥
आविद्ध नाट्य-प्रयोग—
यस्त्वाविद्धाङ्गहारन्तु छेद्यभेद्याह्वोत्मकम् ।
मायेन्द्रजालबहुलं पुस्तनेपथ्यसंयुतम् ॥ ५८ ॥
पुरुषैर्बहुभिर्युक्तमल्पस्त्रीकं तथैव च ।
सात्वत्यारभटीप्रायं नाट्यमाविद्धमेव तत् ॥ ५९ ॥
आविद्ध नाट्य-प्रयोग में अंगहारों के साथ छेदन, भेदन तथा युद्ध का
(युद्ध की चुनौती देने का) प्रदर्शन रहता है। इसमें माया तथा इन्द्रजाल
आदि शक्तियों का उपयोग बतलाया जाता है तथा मुख-रचना (नेपथ्य)
में पलस्तर की बहुलता होती है। इसमें पुरुष-पात्र अधिक तथा स्त्री-पात्र
कम रखे जाते हैं और इसमें सात्वती और आरभटी वृत्ति का (अधिकांश)
प्रदर्शन रहता है ॥ ५८-५९ ॥
डिमः समवकारश्च व्यायोगेहामृगौ तथा ।
एतान्याविद्धसंज्ञानि विज्ञेयानि प्रयोक्तृभिः ॥ ६० ॥
रूपकों में डिम, समवकार, व्यायोग तथा ईहामृग को नाट्यकुशल
महानुभाव आविद्ध नाट्यप्रकार मानते हैं ॥ ६० ॥
एषां प्रयोगः कर्तव्यो देवं दानवराक्षसैः ।
उद्धता ये च पुरुषाः शौर्यवीर्यबलोन्विताः ॥ ६१ ॥
आविद्ध नाट्य प्रकार का प्रयोग देव, दानव, राक्षस तथा शौर्य,
वीर्य एवं शक्ति सम्पन्न उद्धत प्रकृति के पुरुषों के द्वारा किया जाना
चाहिए ॥ ६१ ॥
१. नाटकाश्रितः—क० । २. तत्राविद्धा—सत्वाविद्धाङ्ग—क० ।
३. हवात्मकः—क० । ४. बहुलो—क० । ५. संयुतः—क० ।
६. प्रयोगः पुरुषप्रायस्तथाल्पस्त्रीक एव च—क० ।
७. भटीयुक्तो ज्ञेय आविद्धसंज्ञितः—क० ।
८. आविद्धसंज्ञा विज्ञेमाः प्रयोगस्य वशानुगाः—क० ।
९. एष—ग० । १०. दैत्य—ख; ग० । ११. उद्धताश्चैव—क० ।
१२. समन्विताः—क० ।
१३ ना० शा० द्वि०
१९४ नाट्यशास्त्रम्
सुकुमार नाट्य-प्रयोग—
नाटकं सप्रकरणं भाणो वीथ्यङ्क१ एव च ।
सुकुमारप्रयोगाणि मानुषेष्वाश्रितानि तु ॥ ६२ ॥
नाटक, प्रकरण, वीथी तथा अंक को सुकुमार नाट्य प्रयोग माना जाता
है तथा इसका अभिनय केवल मनुष्यों के द्वारा किया जाता है ॥ ६२ ॥
अथ बाह्यप्रयोगे तु प्रेक्षागृहविवर्जिते ।
विदिक्ष्वपि भवेद्रङ्गं३ कदाचिद्भर्तुराज्ञया ॥ ६३ ॥
यदि कोई नाट्य-प्रदर्शन खुली जगह पर किया जाए जहाँ स्थायी
प्रेक्षागृह न हो तो स्वामी की आज्ञा से उस प्रेक्षागृह का किसी विदिशा
(ईशान्य आदि कोणों) की ओर भी मुंह रखा जा सकता है ॥ ६३ ॥
पृष्ठे कृत्वा कुतपं नाट्यं युङ्क्ते यतो मुखं भरतः ।
सा पूर्वा मन्तव्या प्रयोग५-कालेन नाट्यज्ञैः ॥ ६४ ॥
अभिनेता वाद्यों की ओर पीठ रखते हुए कभी अभिनय नहीं करता
है अतएव वाद्याभिमुख स्थित नट के मुख की ओर ही पूर्व दिशा मान ली
जाए ॥ ६४ ॥
द्वाराणि षट्चैव भवन्ति चात्र६ रङ्गस्य दिग्भाण्डविनिश्चितानि ।
नाट्यप्रयोगेन खलु प्रवेशे प्राच्यां प्रतीच्याञ्च दिशि प्रवेशः ॥ ६५ ॥
विधानमुत्क्रम्य यथात्र रङ्गे विना७ प्रमाणाद्विदिशः प्रयोगे ।
द्वारन्तु यस्मात्समुदङ्गभाण्डं प्राचीं दिशं तां मनसा८ध्यवस्येत् ॥ ६६ ॥
वयोऽनुरूपः प्रथमं९ तु वेषो वेषानुरूपश्च गतिप्रचारः ।
गतिप्रचारानुगतश्च पाठ्यं पाठ्यानुरूपोऽभिनयश्च कार्यः ॥ ६७ ॥
प्रेक्षागृह के दिशा तथा उनके भागों के विभागानुसार छः द्वार बतलाये
गये हैं परन्तु नाट्य प्रदर्शन के समय पात्रों का प्रवेश केवल पूर्व या पश्चिम
द्वार से ही होना चाहिये । बिना विधान के (कदाचित् स्वामी आदि के
आदेश से) ईशान्य आदि विदिग् की ओर भी रङ्गमञ्च का द्वार रखा जा
१. वीथ्यङ्कनाटिके—ख; ग० । २. योज्यान्येतानि मानुषैः—क० ।
३. भवेद्रङ्गः—ख०; ग० । ४ कृत्वास्य—ख०; ग० ।
५. प्रयोगकाले तु—ख०; ग० । ६. चास्य—ख; ग० ।
७. कृतः कथञ्चिद्विदिशः प्रयोगः—क०; लीना प्रमाणाद्विदिशः—ख०; ग० ।
८. मनसा व्यवस्येत्—क० । ९. प्रथमस्तु—ख०; ग० ।
चतुर्दशोऽध्यायः १९५
सकता है। वैसे ही मृदङ्ग आदि वाद्यों का जिधर मुंह रखा जाये उस द्वार
को भी पूर्व द्वार स्वीकार करना चाहिये। नाट्य प्रदर्शन में वय के अनुरूप
(स्वाभाविकता उत्पन्न करने के लिए) वेश, वेष के अनुरूप गति आदि
क्रियाएँ, गति प्रचार के अनुकूल संवाद (पाठ्य) तथा संवाद के अनुकूल ही
अभिनय का संयोजन रहना चाहिये ॥ ६५-६७॥
लोक तथा नाट्य-धर्मी—
धर्मी यौ द्विविधा प्रोक्ता मया पूर्वं द्विजोत्तमाः ।
लौकिकी नाट्यधर्मी च तयोर्वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ ६८ ॥
मैंने पहिले (उद्देशकथन के अवसर पर) जो लोक तथा नाट्य-धर्मी
बतलाये थे, अब उनका लक्षण बतलाता हूँ ॥ ६८ ॥
लोकधर्मी—
स्वभावभावोपगतं^२ शुद्धंन्त्वविकृतं^३ तथा ।
लोकवार्ताक्रियोपेतमङ्गलीलांविवर्जितम्^५ ॥ ६९ ॥
स्वभावाभिनयोपेतं नानास्त्रीपुरुषमाश्रयम्^४ ।
यदीदृशं भवेन्नाट्यं लोकधर्मी तु^१ सा स्मृता ॥ ७० ॥
यदि कोई रूपक लोक स्वभाव के अनुसार भाव प्रदर्शित करने वाला
सादगी तथा बिना बाहरी दिखावट वाला हो, (अविकृत) जो अपनी
(कथा वस्तु में) सामान्य प्रजाजन के आचार तथा क्रियाएं प्रदर्शित
करने वाला तथा आंगिक प्रदर्शन जो—लीला तथा वर्तना आदि के
अभिनय—से रहित सादे एवं सहज भावप्रदर्शन करता हो, जिसमें विभिन्न
पुरुष तथा स्त्री पात्र हों तो उसे 'लोकधर्मी' नाट्य प्रकार समझना
चाहिये ॥ ६९-७० ॥
नाट्यधर्मी—
अतिवाक्य^६क्रियोपेतमतिसत्वाति-भाविकम्^७ ।
लीलाङ्गहाराभिनयं नाट्यलक्षणलक्षितम्^८ ॥ ७१ ॥
१. तु—क० । २. स्वभावकर्मोपगतं—क० ।
३. शुद्धञ्च विकृतञ्च यत्—क० । ४. नानाभावरसान्वितम्—क० ।
५. भिनयस्थानम्—क० ।
६. अतिसत्त्वक्रियोपेतम्, गीतवाद्यक्रियोपेतम्—क० ।
७. भाविकम्—क०; भाषितम्—ख०; ग० ।
८. नाट्यताललयान्वितम्—क० ।
१९६ नाट्यशास्त्रम्
स्वरोलङ्कारसंयुक्तमस्वस्थंपुरुषाश्रयम् ।
यदीदृशं भवेन्नाट्यं नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७२ ॥
यदि किसी रूपक में वाक्यावली, क्रियाएँ, प्राणी-वर्ग (पुरुष या दिव्य
जाति के पात्र) तथा भाव असामान्य हों, जिसमें लीला (मनोहर
चेष्टाओं) से युक्त अङ्गहारों तथा लक्षण सम्पन्न नृत्य का प्रदर्शन हो, स्वर
तथा अलङ्कारों की (काव्य-रचना तथा संगीत में) सुव्यवस्थित योजना हो,
जिसमें (भूमिका धारण करने वाले) अदिव्य पुरुषों के भाव तथा चरित्र
कुशलतापूर्वक वहन किये जाएँ तो उसे नाट्यधर्मी प्रकार जानिये ॥७१-७२॥
लोके³ यदभियोज्यञ्च पदमत्रोपयुज्यते ।
मूर्त्तिमत्साभिभाषञ्च नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७३ ॥
जिसमें लोक प्रसिद्ध वस्तु का मूर्तरूप में वैसी ही कुशलता से संवाद
सहित प्रयोग किया जाये तो उसे भी 'नाट्यधर्मी' जानो ॥ ७३ ॥
आसन्नोक्तञ्च यद्वाक्यं न शृण्वन्ति परस्परम् ।
अनुक्तं श्रूयते यच्च नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७४ ॥
(प्रदर्शन के समय) जहाँ समीपतर वचन भी न सुने जाएँ और
अनुक्त वचन का भी सुनते हुए प्रत्युत्तर दिया जाता हो उसे भी 'नाट्यधर्मी'
समझो ॥ ७४ ॥
शैलयानविमानानि चर्मवर्मायुधध्वजाः ।
मूर्तिमन्तः प्रयुज्यन्ते नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७५ ॥
जिसमें पर्वत, वाहन, विमान तथा ढाल, कवच, शस्त्र तथा ध्वज आदि
का मूर्तरूप में प्रयोग किया गया हो तो उसे भी 'नाट्यधर्मी' जानो । ७५॥
यं एकां भूमिकां कृत्वा कुर्वीतैकान्तरेऽपराम् ।
कौशल्यादेककृत्वाद्वा नाट्यधर्मीति सा स्मृता ॥ ७६ ॥
१. अभिनवगुप्ताचार्य ने बतलाया है कि इसका उदाहरण है—माया—पुष्पक
नामक नाटक में ब्रह्मशाप का मूर्तरूप में रङ्ग पर प्रवेश ।
१. सर्वालङ्कार—क० । २. नाट्यस्थ—क०; मस्वर्भू—ख० ग० ।
३. लोकप्रसिद्धद्रव्यन्तु यदा नाट्ये प्रयुज्यते—क०; ख० ।
४. वृत्तिमत् साभिभाषञ्च—ख०; ग० । ५. साभिलाषञ्च—क० ।
६. कृतं हि तत्—क० । ७. पद्यद्वयं ख-ग पुस्तकयोर्नास्ति ।
८. पुनरन्यां प्रयोजयेत्—क० । ९. कोशलादेककृत्यत्वात्—क० ।
चतुर्दशोऽध्यायः १९७
जिसमें अभिनेता एक भूमिका का निर्वाह कर चुकने पर पुनः दूसरी
भूमिका धारण कर ले तथा अपनी कुशलता से दोनों भूमिकाओं का एक
समान सफलतापूर्वक निर्वाह करे तो उसे भी 'नाट्यधर्मी' जानो ॥ ७६ ॥
याऽगम्या प्रमदा भूत्वा गम्या भूमिषु युज्यते¹।
गम्या भूमिष्वगम्या वा नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७७ ॥
जो स्त्री अभिनेत्री पहिले अगम्य स्त्री (पूज्य या वृद्धा) की भूमिका
धारण करने के उपरान्त गम्या स्त्री (नायिका या प्रेयसी) की भूमिका धारण
करे या गम्या स्त्री की भूमिका के साथ अगम्या स्त्री की भूमिका भी धारण
करे तो यह (केवल नाट्य प्रयोजन या कार्य चलाने के कारण) 'नाट्यधर्मी'
कहलाता है ॥ ७७ ॥
ललितैरङ्ग²विन्यासैस्तथोत्क्षिप्तपदक्रमैः।
नृत्यते गम्यते चा³पि नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७८ ॥
(किसी नाटक में पात्रों की) गति ललित अङ्गों की हलचल के साथ
पैरों की डग भरते हुए प्रदर्शित की जाने पर सामान्य गति होने पर भी
(सुन्दरता के कारण) नृत्य की गति के समान असामान्य लगे तो उसे भी
'नाट्यधर्मी' समझना चाहिये ॥ ७८ ॥
योऽयं⁴ स्वभावो लोकस्य सुखदुःखक्रियात्मकः।
सोऽङ्गाभिनयसंयुक्तो नाट्यधर्मी प्र⁵कीर्तितः ॥ ७९ ॥
जब प्रतिदिन होने वाले स्वाभाविक सुख दुःखों की क्रियाओं का
(अभिनेताओं के द्वारा) अङ्गादि अभिनयों से युक्त हूबहू प्रदर्शन किया
जाता हो तो उसे भी 'नाट्यधर्मी' समझना चाहिये ॥ ७९ ॥
यश्चेतिहा⁶सवेदार्थो ब्रह्मणा समु⁷दाहृतः।
दिव्यै⁸र्मानुषरत्यर्थे⁹ नाट्यधर्मी तु सः स्मृतः ॥
१. योज्यते—क०।
२. यश्चाङ्गहारविन्यासै—क०।
३. चैव—क०।
४. यश्च स्वभावो—क०।
५. तु सा स्मृता—क०।
६. यत् सेतिहास—क०।
७. काव्यसम्मतः, काव्यधर्मतः—क०।
८. देव—क०। ९. रत्यर्थो—क०।
१९८ नाट्यशास्त्रम्
(प्रक्षिप्त—ब्रह्मा के द्वारा अभिहित इतिहास तथा वेद के अर्थों का
निदर्शक जो नाट्यवेद निर्मित किया गया है। जो देवता और मनुष्यों का
मनोरञ्जक उपकरण है उस नाट्यशास्त्र को भी 'नाट्यधर्मी' समझना
चाहिये।)
यश्च कक्ष्याविभागोऽयं नानाविधिसंमाश्रितः ।
रङ्गपीठगतः प्रोक्तो नाट्यधर्मी तु सः स्मृतः ॥ ८० ॥
अभी जो रङ्गमञ्च तथा उसकी कक्ष्याओं का विधिवत् विभाग बतलाया
गया वह भी 'नाट्यधर्मी' प्रकार का उदाहरण समझिये ॥ ८० ॥
नाट्यधर्मीप्रवृत्तं हि सदा नाट्यं प्रयोजयेत् ।
न ह्यङ्गाभिनयात् किञ्चिदृते² रागः प्रवर्तते ॥ ८१ ॥
सदा 'नाट्यधर्मी' के द्वारा सम्पन्न होने वाले 'नाट्य प्रयोग' का प्रदर्शन
करना चाहिए। क्योंकि आंगिक अभिनय के प्रदर्शन से हीन नाट्य-प्रयोग
दर्शकों को प्रसन्न नहीं कर सकता ॥ ८१ ॥
सर्वस्य सहजो भावः सर्वो ह्यभिनयोऽर्थतः³ ।
अङ्गालङ्कारचेष्टा तु नाट्यधर्मी प्रकीर्तिता ॥ ८२ ॥
मनुष्यों में विद्यमान सभी सहज भाव जब आंगिक अभिनय, अलङ्कार
तथा चेष्टाओं के साथ आवश्यकतानुसार (अर्थतः) प्रदर्शित किये जाते
हैं तो वे सभी अन्ततोगत्वा नाट्यधर्मी ही कहलाते हैं ॥ ८२ ॥
एवं कक्ष्याविभागस्तु धर्मी युक्तय एव च ।
विज्ञेया नाट्यतत्त्वज्ञैः प्रयोक्तव्याश्च तत्त्वतः ॥ ८३ ॥
(मैने) इस प्रकार कक्ष्या विभाग, धर्मी तथा प्रवृत्तियों के विषय में
जो बतलाया उसे नाट्य-प्रयोक्ता ठीक से समझे और फिर उसे प्रयत्न-
पूर्वक (यथातथ्य) प्रदर्शित करे ॥ ८३ ॥
१. देशसमाश्रयः —क० ।
२. किञ्चिद्विना नाट्यं—क० ।
३. -र्थजः—क० ।
४. धर्मीति संज्ञिता—क० ।
५. विभागास्तु—ग० ।
६. धर्मी-युक्तस्तथैव च-क; धर्मयुक्ताः प्रकीर्तिता. —ग० ।
७. विज्ञेयो—क० ।
८. प्रयोक्तव्यश्च—क० ।
चतुर्दशोऽध्यायः १९९
उक्तो मयेहाभिनयो यथावच्छाखाकृतो¹ यस्तु कृतोऽङ्गहारैः ।
पुनश्च² वाक्याभिनयं यथावद् वक्ष्ये स्वरव्यञ्जनवर्णयुक्तम् ॥ ८४ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे कक्ष्या³-प्रवृत्ति-धर्मी-व्यञ्जको
नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥
❖ ❖ ❖
इस प्रकार मैंने शाखा तथा अङ्ग से निर्मित होनेवाले अभिनय का
विधिवत् वर्णन किया। (अर्थात् समग्र आंगिकाभिनय बतलाया) अब मैं
स्वर तथा व्यंजन से निर्मित वाक्याभिनय (वाचिकाभिनय) को (अगले
अध्याय में) बतला रहा हूँ ॥ ८४ ॥
भरत मुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र का कक्ष्या-प्रवृत्ति धर्मी आदि का
निरूपक 'चतुर्दश अध्याय' समाप्त
❖ ❖ ❖
१. भावः कृतो यश्च कृताङ्गहारः—ख०; कृताङ्गहारैः—ग० ।
२. वक्ष्यामि वाक्याभिनयं स्वशक्त्या भूयः स्वरव्यञ्जन—क० ।
३. नाट्यधर्मीप्रवृत्तिव्यञ्जनो नाम—क०; करयुक्तिधर्मीव्यञ्जको नाम त्रयो-
दशोऽध्यायः—ख०, प्रवृत्तिधर्मव्यञ्जको नाम—ग० ।
पञ्चदशोऽध्यायः
( वाचिकाभिनयाद्याध्याय )
यो वागभिनयः १पूर्वं मया प्रोक्तो द्विजोत्तमाः ।
लक्षणन्तस्य वक्ष्यामि स्वरव्यञ्जनसम्भवम् ॥ १ ॥
हे मुनिजन, अभिनयों के निरूपण के प्रसङ्ग में जो पहिले मैंने वाचिक
अभिनय बतलाया था अब उसका ( अवसर प्राप्त होने के कारण ) स्वर
एवं व्यञ्जनों के द्वारा निर्मित होने वाला लक्षण बतलाता हूँ ॥ १ ॥
नाट्य ( रचना ) में संवादों का महत्त्व—
वाचि यत्नस्तु२ कर्तव्यो नाट्यस्यैषा३ तनुः स्मृता ।
अङ्गनेपथ्यसत्त्वानि४ वाक्यार्थं५ व्यञ्जयन्ति हि ॥ २ ॥
( कवि के द्वारा काव्यादि निर्माण तथा अभिनेता के द्वारा प्रयोग के
अवसर पर ) शब्दों पर२ विशेष उद्योग ( प्रयत्न ) रहना चाहिये, क्योंकि यही
सारे नाट्यप्रदर्शन का कलेवर है। क्योंकि अङ्ग, नेपथ्य-रचना तथा सत्त्वा-
भिनय वाक्य के ( शब्द के ) अर्थों की ( ही ) अभिव्यक्ति करते हैं ( आशय
यह कि—वाचिक अभिनय के ये सभी सहायक ( मात्र ) है। यदि वाचिक
अभिनय शिथिल हो तो अन्य अभिनयों से प्रयोग सुरुचिपूर्ण नहीं बन
सकता ) ॥ २ ॥
१. चार प्रकार के अभिनय का ना० शा० अध्याय ६।२३ पर उल्लेख किया
जा चुका है।
२. यह नियम अभिनेताओं और नाट्यरचनाकार पर समान रूप से लागू
है। अभिनवगुप्तपादाचार्य का मत है कि नट के द्वारा अभिनय की और लेखक
के द्वारा निर्माण की दशा में शब्दों की रचना पर ध्यान देना चाहिये। ( अभि०
भा० पृ० २२० )
आङ्गिक अभिनय के पश्चात् वाचिक अभिनय का स्वरूप निरूपण क्रम प्राप्त
है; यह नाट्य का अनुप्राणक तत्व है तथा विषय के उत्तमता से प्रस्तुत करने में
अतिशय महत्वशाली भी है इसीलिए वाचिक अभिनय का लक्षण बतलाने के
क्रम को चलाने के कारण इसकी पूर्व अध्याय से संगति भी स्थापित होती है।
१. प्रोक्तो मयापूर्व—क० । २. यत्नो विधातव्यः—क० ।
३. नाट्यस्येयं—क० । ४. तत्त्वानि—क० । ५. वागर्थं—क० ।
पञ्चदशोऽध्यायः २०१
वाङ्मयानीह¹ शास्त्राणि वाङ्निष्ठानि तथैव च ।
तस्माद्वाचः परं नास्ति वाग्धि² सर्वस्य कारणम् ॥ ३ ॥
इस जगत में सभी शास्त्र तथा वाङ्मय शब्दात्मक हैं तथा शब्दनिष्ठ
(शब्दाश्रित) भी । इसलिए वाणी से परे कुछ भी नहीं है और सभी का
(भावों वस्तुओं आदि का) कारण शब्द ही¹ होता है ॥ ३ ॥
वाचिकाभिनय विभाग—
³नामाख्यातनिपातोपसर्गतद्धितसमासनिर्वर्त्यः ।
सन्धिविभक्ति⁴नियुक्तो विज्ञेयो वाचिको⁵भिनयः ॥ ४ ॥
यह वाचिकाभिनय नाम (संज्ञा), आख्यात (क्रिया), निपात,
उपसर्ग, तद्धित, समास, सन्धि तथा विभक्ति (के ज्ञान) से सम्बद्ध
होता है ॥ ४ ॥
पाठ्य के (दो) भेद—
द्विविधं हि स्मृतं पाठ्यं संस्कृतं प्राकृतं तथा⁶ ।
⁷तयोर्विभागं वक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ ५ ॥
(नाटक में स्थित) पाठ्य दो प्रकार का है—संस्कृत-पाठ्य तथा प्राकृत-
पाठ्य । अब मैं क्रमशः उनका विभागपूर्वक स्वरूप बतलाता हूँ ॥ ५ ॥
१. शब्द सभी का कारण होता है यह विचार भर्तृहरि द्वारा भी निरूपित
किया गया है । तुलना कीजिये—वाक्यपदीय ब्रह्मकाण्ड की निम्न कारिकाओं से—
शब्दस्य परिणामोऽयमित्याम्नायविदो विदुः ।
छन्दोभ्य एव प्रथममेतद्विश्वं व्यवर्तत ॥ (ब्र० का० १२१)
न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥ (ब्र० का० १२४)
सा सर्व-विद्या-शिल्पानां कलानाञ्चोपबन्धनी ।
तद्वशादभिनिष्पत्तौ सर्वं वस्तु विभाव्यते ॥ (ब्र० का० १२६)
१. वाङ्मयानि तु—क० । २. वाग्भिः—क० ।
३. नामाख्यातनिपातैरुपसर्गसमासतद्धितैर्युक्तः—ख०; ग० ।
४. विभक्तिषु युक्तौ—ख०; ग० ।
५. वाचिकोऽभिनयः—क० । अत्र व्याख्यातृपाठस्त्वेवम्—
आगमनामाख्यातोपसर्गतद्धितनिपातसन्धियुतः ।
सवचनविभक्त्युपग्रहानिर्वर्त्यो वाचिकाभिनयः ॥
६ यथा—क० । ७. अङ्गानि वक्ष्याम्यनयोः—क० ।
२०२ नाट्यशास्त्रम्
पाठ्य के विभिन्न आधार—
व्यञ्जनानि स्वरा¹श्चैव सन्धयोऽथ विभक्तयः।
नामाख्यातोपसर्गाश्च निपातास्तद्धितास्तथा॥ ६॥
एतै²रङ्गैः समासैश्च नानाधातुसं³माश्रयम्।
विज्ञेयं संस्कृतं पाठ्यं प्र⁴योगश्च निबोधत॥ ७॥
संस्कृत-पाठ्य व्यञ्जन, स्वर, सन्धि, विभक्ति, नाम (संज्ञा) आख्यात
(क्रिया) उपसर्ग, निपात, तद्धित समास तथा नाम धातु के द्वारा निर्मित
(या आश्रय से युक्त) होता है। अब मैं इनका सलक्षण प्रयोग बतलाता
हूँ॥ ६-७॥
पाठ्यवर्ण-निरूपण—
अकारा⁵द्याः स्वरा ज्ञेया औकारान्ताश्चतुर्दश।
हका⁶रान्तानि कादीनि व्यञ्जनानि विदुर्बुधाः॥ ८॥
'अ' कार से प्रारम्भ होकर 'औ' कार तक पूर्ण हो जाने वाले चौदह
स्वर तथा 'क' से प्रारम्भ होकर 'ह' पर समाप्त हो जाने वाले वर्ण व्यञ्जन
कहलाते हैं॥ ८॥
अत्र स्वराश्चतुर्दश कादीनि व्यञ्जनानि यथा—अ आ इ ई उ ऊ
ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ स्वरा ज्ञेयाः। व्यञ्जनानि यथा—क ख ग
घ ङ, च छ ज झ ञ, ट ठ ड ढ ण, त थ द ध न, प फ ब भ म, य
र ल व, श ष स हः इति व्यञ्जनवर्गाः।⁷
१. शिक्षा तथा प्रातिशाख्य ग्रन्थों में वर्णों (स्वरों) की विभिन्न संख्याएँ
बतलाई गई हैं जिनमें पाणिनि-शिक्षा में इनकी संख्या २२ है। अन्य प्रातिशाख्यों
और ऋक्तन्त्रव्याकरण में इनकी संख्या क्रमशः १३, १६ तथा २३ प्राप्त होती
है। पाणिनिशिक्षा में अनुस्वार, विसर्ग जिह्वामूलीय और उपध्मानीय को भी
व्यञ्जनान्तर्गत माना गया है।
१. स्वरश्चैव—क०। २ तथा समासा इत्येवं; एतैरङ्गविधानैश्च—क०।
३. गवेक्षितम्—क०। ४. तद्वक्ष्यामि समासतः—ख०; ग०।
५. अकारादि—क०। ६. ककारादीनि हान्तानि—क०।
७. अस्मादनन्तरं क० पुस्तके तु—
अष्टौ स्थानानि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस्तथा।
जिह्वामूलञ्च दन्ताश्च नासिकोष्ठौ च तालु च॥
अकुहविसर्जनीयाः कण्ठ्याः, इचुयशास्तालव्याः, ऋटुरषा मूर्धन्याः, लुतुलसा
( गद्यभाग ) ( 'अ' से प्रारम्भ होने वाले ) स्वर चौदह हैं—अ, आ,
इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऌ, ए ऐ ओ औ तथा क से प्रारम्भ होने वाला
व्यञ्जन समूह है—क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, न, प, फ, ब, भ, म, य, र,
ल, व, श, ष, स, ह ।
व्यञ्जन—तथा उनके उच्चारण स्थान—
वर्गे वर्गे समाख्यातौ द्वौ वर्णौ प्रागवस्थितौ ।
अघोषा इति ये त्वन्ये सघोषाः परिकीर्तिताः ॥ ९ ॥
प्रत्येक वर्ग के प्रारम्भ के दो ( व्यञ्जन ) वर्ण ( जैसे—क, ख तथा श,
ष, स ) अघोष तथा शेष सभी वर्ण सघोष ( घोष ) कहलाते हैं ॥ ९ ॥
एते घोषाघोषाः कण्ठ्यौष्ठ्या दन्त्यजिह्वनासिक्याः ।
ऊष्माणस्तालव्यो विसर्जनीयाश्च बोद्धव्याः ॥ १० ॥
ये घोष तथा अघोष वर्ण कण्ठ्य, ओष्ठ्य, दन्त्य, जिह्व्य, नासिक्य,
ऊष्माण, तालव्य तथा विसर्जनीय भेद से आठ स्थानों से उच्चारित
होते हैं ।
ग घ ङ ज झ ञ ड ढ ण द ध न ब भ म य³ र ल वा मता घोषाः ।
क ख च छ ट ठ त थ प फ⁴ श ष सा इति वर्गेष्वघोषाः स्युः ॥ ११ ॥
इस व्यञ्जन समूह में ग घ ङ, ज झ ञ, ड ढ ण, द ध न, ब भ म,
१. जिह्व्य वर्णों का किसी व्याकरण में विवरण नहीं मिलता, सम्भवतः
यह मूर्धन्य के स्थान का निर्देश करता है क्योंकि मूर्धन्य वर्णों की ध्वनि में
जिह्वा का महत्वपूर्ण योगदान रहता है ।
दन्त्या; उपूध्मानीया ओष्ठ्या; इत्युपध्मानीयः, इति जिह्वामूलीयः, ए ऐ कण्ठ-
तालव्यौ, ओ औ कण्ठौष्ठ्यौ, वकारो दन्तोष्ठ्यः, ङ-ञ-ण न-मा अनुनासिकाः,
विसर्जनीयस्योरस्य इत्येके सर्वमुखस्थानमवर्णमित्यपरे ।
द्वौ द्वौ वर्णौ तु वर्गाद्यौ शषसाश्च त्रयोऽपरे ।
अघोषा घोषवन्तश्च ततोऽन्ये परिकीर्तिताः ॥ इति-क० पुस्तकेऽधिकम् ।
१. कण्ठ्योष्ठ(ष्ठ्य)दन्त (न्त्य)जिह्नानुनासिक्यः— ख०; ग० ।
२. स्तालव्य विसर्जनीयाश्च—ख०; ग० ।
३. तथैव य र ल व हा घोषाः—ख०; ग० ।
४. प फ इति वर्गेष्वघोषाः स्युः—ख० ग० ।
२०४ नाट्यशास्त्रम्
तथा य र ल व ‘घोष’ तथा क ख, च छ, ट ठ, त थ, और प फ ‘अघोष’
वर्ण कहलाते हैं ॥ ११ ॥
क ख ग घ ङाः कण्ठस्थास्तालुस्थानास्तु१ च छ ज झ ञाः ।
ट ठ ड ढ णा मूर्द्धन्याः त थ द ध नाश्चैव दन्तस्थाः ॥ १२ ॥
क, ख, ग, घ, ङ को कण्ठ्य, च, छ, ज, झ को तालव्य, ट, ठ, ड, ढ,
ण को मूर्धन्य तथा त, थ, द, ध, न को दन्त्य व्यञ्जन समझना चाहिये ।
अर्थात् इनका उच्चारण स्थान यही है ॥ १२ ॥
पफबभमास्त्वोष्ठ्याः स्युर्दन्त्या ललसा अहौ२ च कण्ठस्थौ ।
तालव्या इचुयेशाः३ स्युः ऋटुरषा४ मूर्ध्नि५ स्थिता ज्ञेयाः ॥ १३ ॥
लूलूदन्त्यौ ओऔकण्ठोष्ठ्यौ६ ए ऐकारौ च कण्ठतालव्यौ ।
प, फ, ब, भ, म को ओष्ठ्य, ऌ, ल तथा स को दन्त्य, अ, ह को
कण्ठ्य, इ, चु (चवर्ग) तथा य, श को तालव्य तथा ऋ, र और ष को
मूर्धन्य, ऌ ॡ को दन्त्य, ओ, औ को कण्ठ्योष्ठ्य तथा ए, ऐ को तालव्य
जानो ॥ १३-१४ ॥
कण्ठ्यौ७ विसर्जनीयो जिह्वामूलोद्भवौ८ क ख योः ॥ १४ ॥
पफयोरोष्ठस्थानो भवेदुकारस्तथा स्वरो विवृतः ।
स्पृष्टाः काद्या मान्ताः श ष स हकारास्तथा विवृताः ॥ १५ ॥
अन्तःस्था संवृतं१०जा ङ ञ ण नमा नासिकोद्भवा ज्ञेयाः ।
ऊष्माणश्च श ष स हा य व र ल वर्णास्तथैव चान्तस्थाः ॥ १६ ॥
जिह्वामूलीयः कः प उपध्मानीयसंज्ञया ज्ञेयः११ ।
कचटतपाः स्वरिताः स्युः खछठथफाः स्युस्तथा कण्ठ्याः१२ ॥ १७॥
कण्ठोरे१३स्थान् विद्याद् गजँडँदबान् पाठ्यसम्प्रयोगे तु ।
वेद्यो विसर्जनीयो जिह्वास्थोनै१५स्थितो वर्णः ॥ १८ ॥
१. तालुस्थाना मतास्तु—ख०; ग० । २. गहौ—क० ।
३. इयशाः—ख०; ग० । ४. ऋ र पा—ख० ।
५. मूर्धंस्थिताः—ख०; ग० । ६. ओ औ कण्ठोष्ठस्थानौ—ख०; ग० ।
७. कण्ठ्यौ विसर्जनीयौ जिह्वामूल्योद्भवौ कखयोः—क० ।
८. जिह्वामूलोद्भवः कपयोः—ख०; ग० ।
९. स्थानं भवेदकारः स्वराविद्धः—क०; ग० ।
१०. संवृताः—ख०; ग० । ११. ज्ञेयौ—क० ।
१२. तथाक्रम्याः—क० । १३. कण्ठोरस्थान्—क० ।
१४. घझढधभान्—क० । १५. जिह्वामूलस्थितो—क० ।
पञ्चदशोऽध्यायः २०५
विसर्ग का कण्ठ तथा क, ख का जिह्वामूलीय, प, फ तथा उ का ओष्ठ
तथा स्वरों का विवृत उच्चारण स्थान है। क से म तक स्पृष्ट तथा श, ष, स,
ह विवृत कहलाते हैं। अन्तस्थ का संवृत ङ, ञ, ण, न, म का नासिका
उच्चारण स्थान है। श, ष, स, ह उष्मा, य, र, ल, व अन्तस्थ, क
जिह्वामूलीय तथा प उपध्मानीय होता है।
क, च, ट, त, प स्वरित, ख, छ, ठ, थ, फ कण्ठ्य, (कम्य ?) ग,
ज, ड, द, ब (घ, झ, ढ, ध, भ) कण्ठ तथा उरस्थल से उच्चारित किये
जाते हैं।
विसर्जनीय जिह्वा के मूल भाग से उच्चरित होने वाला समझना
चाहिये ॥ १४-१८ ॥
एते व्यञ्जनवर्गाः समासतः संज्ञया कथिताः ।
शब्दप्रयोगविषये स्वरांस्तु भूयः प्रवक्ष्यामि ॥ १९ ॥
इस प्रकार संक्षेप से व्यञ्जनवर्ग का मैंने वर्णन किया। अब मैं शब्द
प्रयोग के विषय में (की दशा में) स्वरों का कार्य बतलाता हूँ ॥ १९ ॥
स्वरः तथा उनका परिमाण—
य इमे स्वराश्चतुर्दश निर्द्दिष्टास्तत्र वै दश समानाः ।
पूर्वो ह्रस्वस्तेषां परश्च³ दीर्घो विधातव्यः ॥ २० ॥
मैंने पहिले जो चौदह स्वर बतलाये उनमें १ से १० तक के (स्वर)
समान कहलाते हैं। इन समान स्वरों में क्रमशः पहिला ह्रस्व और दूसरा
दीर्घ होता है ॥ २० ॥
शब्दों के विभेद—
४एभिर्व्यञ्जनवर्गैर्नामाख्यातोपसर्गवनिपातैः ।
तद्धितसन्धिविभक्तिभिरधिष्ठितः शब्द इत्युक्तः ॥ २१ ॥
१. व्यंजनों के उच्चारण स्थान तथा उनकी परम्परा आदि के विशेष
विवरण पाणिनि-शिक्षा तथा पातंजल-महाभाष्य आदि में भी देखे जा सकते हैं।
१. शब्दविषयप्रयोगे—क० ।
२. अस्मात्परं—यस्मिन् स्थानेषु समो विज्ञेयो यः सवर्णसंज्ञोऽसौ ।
इति क० पुस्तकेऽधिकम् ।
३. परस्तु दीर्घो विनिर्द्देश्यः—क०; परश्च दीर्घोऽवगन्तव्यः—क० ।
४. इत्थं व्यञ्जनयोगैः परैश्च साख्यातनामपदविहितैः ।
काव्यनिबन्धाश्च स्युर्धातुनिपातोपसर्गैस्तु ।—क० ।
२०६ : नाट्यशास्त्रम्
इस प्रकार इन स्वर तथा व्यंजनों के योग से तथा आख्यात (क्रिया,
धातु) नाम (संज्ञा), उपसर्ग, निपात, तद्धित, सन्धि तथा विभक्ति से
अधिष्ठित शब्द होता है ॥ २१ ॥
पूर्वाचार्यैरुक्तं शब्दानां लक्षणन्तु विस्तरतः ।
पुनरेव संहृतार्थं लक्षणतः सम्प्रवक्ष्यामिं ॥ २२ ॥
प्राचीन आचार्यों ने शब्द का विस्तारपूर्वक लक्षण (निर्दिष्ट) किया
है। मैं उनका संक्षेप में (सार भूत) लक्षण प्रसंगवश बतलाऊँगा ॥ २२ ॥
नाम (संज्ञा)—
स्वौ⁴चाद्यधिकारगुणैरर्थविशेषैर्विभूषितन्यासम्⁵ ।
प्रातिपदिकार्थलिङ्गैर्युक्तं⁶ पञ्चविधमिदं ज्ञेयम् ॥ २३ ॥
संज्ञा (नाम)—अपने 'सु' आदि विभक्ति प्रत्ययों तथा उनके द्वारा
प्रकट होने वाले विशेष अर्थों से युक्त होती है। इसके पाँच प्रकार होते हैं
तथा यह प्रातिपदिकार्थ तथा लिंग से युक्त होती है ॥ २३ ॥
१. नाम या संज्ञा के पाँच प्रकार संक्षिप्तसार के अनुसार इस प्रकार हैं—
(१) उणाद्यन्त, (२) कृदन्त, (३) तद्धितान्त, (४) समासान्त तथा (५)
शब्दानुकरण ।
उणाद्यन्तं कृदन्तञ्च तद्धितान्तं तथैव च ।
शब्दानुकरणं चैव नाम पञ्चविधं स्मृतम् ॥ (संक्षिप्त सार-विवरणे—गोपीचन्द्रः)
२. प्रादिपदिकार्थ के विषय में विविध मत हैं—पाणिनि ने प्रातिपदिक या
१. विस्तरतो लक्षणन्तु शब्दानाम् । सङ्क्षेपादहमेषां लक्षणमर्थञ्च
वक्ष्यामि—क०।
२. अस्मादनन्तरम्—
अर्थप्रधानं नाम स्यादाख्यातन्तु क्रियाकृतम् ।
द्योतयन्त्युपसर्गास्तु विशेषं भावसंश्रयम् ॥ २३ ॥
नामाख्याताथंविषयं विशेषं द्योतयन्ति ते ।
पृथक् तत्रोपसर्गेभ्यो निपाता नियमे च्युते ॥ २४ ॥ इति क० पुस्तक
टिप्पण्यामधिकं पद्यद्वयमुपलभ्यते ।
३. एतस्य स्थाने च—
उद्दिष्टं शब्दानां लक्षणमेतत् समासयोगेन ।
प्रकरणवशाद्धि तदहं विस्तरतः सम्प्रवक्ष्यामि ॥ इति क० पुस्तके लभ्यते ।
४. स्वाद्यत्यधिकार—ख०, ग० । ५. विभूषितन्यासा—ख०; ग० ।
६. लिङ्गयुक्तम्—ख०, ग० ।
पञ्चदशोऽध्यायः २०७
तत्प्राहुः सप्तविधं षट्कारकसंयुतं प्रथितसाध्यम् ।
निर्देशसम्प्रदानोपोदानप्रभृतिसंज्ञाभिः ॥ २४ ॥
यह नाम सात श्रेणियों से तथा छः कारको से युक्त होता है। कभी
कभी यह सिद्ध वाच्यार्थ (प्रथित) तथा कभी-कभी साध्यभूत वाच्यार्थ
(साध्य) वाला होता है। (और जब यह (विभिन्न) प्रत्ययों से युक्त होता है
तो) निर्देश, सम्प्रदान, अपादान प्रभृति संज्ञा को सूचित करता है ॥ २४ ॥
सम्प्रत्यतीतकालक्रियादिसंयोजितं प्रथितसाध्यम् ।
वचनं नागतयुक्तं सुसंदृशसंयोजनविभक्तम् ॥ २५ ॥
जो क्रियाएँ वर्तमान तथा भूतकाल एवं इसके समान समय में होने
वाले कार्य को बतलाने वाले अर्थ से सम्बद्ध शब्द बनाती हैं। वह 'प्रथित'
तथा जो कभी-कभी व्यवस्थित रस में निमित विभेद सम्पन्न शब्द बनाती
हों साध्य कहलाती है।
आख्यात—(क्रिया)
पँश्चशतधातुयुक्तं पञ्चगुणं पञ्चविधमिदं वापि ।
आख्यातं पाठ्यैकृतं ज्ञेयं नानार्थ्याश्रयविशेषम् ॥ २६ ॥
नाम के दो प्रकार (जाति तथा द्रव्य) माने हैं, कात्यायन के मत में एक प्रकार
और जोड़ा गया जिसे 'लिंग' कहते हैं। व्याघ्रपाद आचार्य के मत से संख्या
तथा भाष्यकार पतंजलि के मत से 'कारक' के संयुक्त करने पर नाम के ये पाँच
प्रकार हो जाते हैं। यथा—जाति, द्रव्य, लिङ्ग, संख्या तथा कारक ।
१. सात श्रेणी का अर्थ सात विभक्तियाँ हैं। प्रथित तथा साध्य शब्दों का
आश्रय यह भी है कि सिद्धवाच्यार्थ वाला शब्द जिसका प्रकृति, प्रत्यय आदि से
विभाग करते हुए निर्वचन न किया जा सके 'प्रथित' कहलाता है (अर्थात्
रूढ़ शब्द) तथा साध्य का आशय है कि प्रकृति प्रत्यय आदि से जिस शब्द का
निर्वचन किया जाए तथा अन्तर्निहित अर्थ की अभिव्यक्ति हो सके। इसे हम
दूसरे शब्दों में 'यौगिक' शब्द कह सकते हैं।
२. 'निर्देश' का सम्बन्ध 'कारक' से (प्रतीत होता) है। जैसा कि विवरण
है और विभक्त्यन्त प्रत्यय से इसकी पुष्टि भी होती है।
१. निर्देशसम्प्रदानोपादान—क० ।
२. सम्प्रत्यतीतकालप्रयोजितः क्रियादिसंयोगः प्रथितः—ख०; ग० ।
३. वचनानागत—क०; साध्ये वचनानां यतियुक्तं—ख०; ग० ।
४. सदृशसंयोजन—ख०; ग० । ४. पद्यार्धमेतत् ख० ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
५. पाठ्यमिदं—क० । ६. नामाश्रय—क०; नामार्थसंश्रय विशेषम्—ख० ।
पाँच सौ¹ धातुओं का पच्चीस वर्गों में विभक्त होने वाला क्रिया का
समूह 'आख्यात' कहलाता है । ये पाठ्य या संवादों में संज्ञाओं के आश्रित
अर्थों से संयुक्त की जाती हैं ॥ २६ ॥
उपसर्ग—
प्रातिपदिकार्थयुक्तान्¹ धात्वर्थानुपसृजन्ति² ये स्वार्थैः³ ।
उपसर्गा ह्युद्दिष्टास्तस्मात् संस्कारतस्तस्मिन्⁴ ॥ २७ ॥
जो अपने अर्थों के द्वारा प्रातिपादिक अर्थ सम्पन्न धातु के मूल अर्थ को
विशिष्टार्थ सम्पन्न बना देते हैं उन्हें संस्कार शास्त्र में ( व्याकरण शास्त्र में )
( इसी कारण ) 'उपसर्ग²' कहते हैं ॥ २७ ॥
निपात—
प्रातिपदिकार्थयोगाद्धातुच्छन्दोनिरुक्तयुक्त्या च ।
यस्मान्निपतन्ति पदे तस्मात् प्रोक्ता निपातास्तु ॥ २८ ॥
क्योंकि प्रादिपदिकार्थ के साथ, धातु, छन्द, निर्वचन तथा युक्ति द्वारा
उनके मूलार्थ को फैलाने के लिए संयुक्त होकर आते हैं । ( अतएव पद के
समीप आने के कारण ) इन्हें निपात³ कहते हैं ॥ २८ ॥
१. धातुओं की निश्चित संख्या नहीं बतलाई जा सकती क्योंकि विभिन्न
व्याकरण ग्रन्थों में इनकी अलग-अलग संख्या बतलाई गई है । पाणिनि ने अपनी
धातुओं को दस गणों में विभक्त किया है । परन्तु धातुओं का पच्चीस भागों में
विभाग किसी भी व्याकरण ग्रन्थ में प्राप्त नहीं होता ।
२. उपसर्ग का भरत प्रोक्त स्वरूप निरुक्त ( १।१-३-४ ) में उद्धृत
शाकटायन के विवरण से मिलता है । ( तुलना कीजिए सम्बद्ध दोनों अंशों की । )
उपसर्गों का त्रिविध अर्थद्योतन निम्न श्लोक से स्पष्ट है—
कचिद् भिनत्ति धात्वर्थं क्वचित्तमनुवर्तते ।
विशिनष्टि तमेवार्थमुपसर्गगतिस्त्रिधा ॥
३. पाणिनि के अनुसार अव्यय जो 'च' आदि वर्ग में पठित है 'निपात'
कहलाते हैं । पतंजलि के मत में विभक्ति तथा स्वरों का समानता रखने
वाले अव्यय कारक के कार्य की पूर्ति भी कर देते हैं । द्रष्ट० पात० महा० ३।४।२
( विभक्तिस्वरप्रतिरूपकाश्च भवन्तीति निपातसंज्ञाः )
१. युक्तं—क० । २. नुत्सृजन्ति—ख०; ग० ।
३. स्वार्थैः—ख० । ४. संस्कारशास्त्रेऽस्मिन्—ख०; ग० ।
पञ्चदशोऽध्यायः २०९
प्रत्यय—
प्रत्ययविभागजनिताः प्रकर्षसंयोगस¹त्ववचनैश्च ।
यस्मात् पूरयतेऽर्थान् प्रत्यय उक्तस्ततस्तस्मात् ॥ २९ ॥
जो प्रकर्ष, संयोग तथा भाव (सत्व) के द्वारा शब्दों के आंशिक अर्थों
की पूर्ति करते हैं उन्हें इन विचारों (विश्वासों-प्रत्यय) को विकसित करने के
कारण 'प्रत्यय' कहा जाता है ॥ २६ ॥
तद्धित—
³लोप-प्रकृति-प्रत्यय-विभागसंयोगसत्व⁴-वचनेषु ।
तांस्तान् पूर्यन्तेऽर्था स्तेषु यतस्तद्धितस्तस्मात् ॥ ३० ॥
क्योंकि यह शब्द के अर्थों को—लोप, प्रकृति तथा प्रत्यय के विभाग या
संयोग द्वारा विकसित या पूर्ण करता है तथा उनके अन्तःस्थित (विचारया)
भावाभिप्राय को बतलाता है अतएव 'तद्धित' कहलाता है ॥ ३० ॥
विभक्ति—
एकस्य बहूनां वा धातोलिङ्गस्य⁷ वा पदानां वा ।
यस्माद्विभजन्त्यर्थान् विभक्तयः कीर्तितास्तस्मात् ॥ ३१ ॥
एक या अनेक शब्दों के अर्थों का उनकी मूलधातु या लिङ्ग के
अनुसार विभाग या विभेद करने के कारण 'विभक्ति' कहलाती है ॥ ३१ ॥
१. प्रत्यय की भरत ने व्यापक परिभाषा की है। अभिनवगुप्त ने इस लक्षण
को ऐन्द्रव्याकरण के अनुसार तथा वहीं से लिया हुआ निरूपित किया है। धातु में
अवस्थित अर्थ के बोध में जो सहायक हो उसे सामान्यतः 'प्रत्यय' कहा जाता
है। (येनार्थः प्रतीयते स प्रत्ययः) ।
२. भरतोक्त तद्धित का स्वरूप अन्य व्याकरण ग्रंथों से मेल नहीं खाता ।
३. विभक्ति शब्द का निर्वचन या व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ लेकर यहाँ भरत ने
१. तत्व—क० । २. तांस्तान् पूरयते—क० । ३. लोक—ख०; ग० ।
४. तत्ववचनैस्तु—क० ।
५. ते ते पूर्यन्तेऽर्थाः—क०; तस्मात् पूरयतेऽर्थान्—ख०; ग० ।
६. अर्थान् हि तो यतः—क०; ततो यतः—ख०; ग० ।
७. लिङ्गस्यापदानां वा—ख०; ग० ।
८. विभजन्त्यर्थं यस्मिन्—क०, विभजन्त्यर्थं यस्मात विभक्तयस्तेन ताः
प्रोक्ताः—ख०; ग० ।
१४ ना० शा० द्वि०
२१० नाट्यशास्त्रम्
सन्धि—
वर्णपदक्रमसिद्धः पदैकयोगाच्च वर्णयोगाच्च ।
संन्धीयते तु यस्मात्तस्मादुपदिश्यते सन्धिः ॥ ३२ ॥
जब पृथक्भूत पद, वर्ण या स्वर व्यञ्जन परस्पर शब्द या शब्दों के
समीप आकर मिल जाते हों तो इस सन्धान या जोड़ के हो जाने को
'सन्धि' कहते हैं ॥ ३२ ॥
विंशिष्टास्तु स्वरा यत्र व्यञ्जनं वापि योगतः ।
सन्धीयते पदे यस्मात्तस्मात् सन्धिः प्रकीर्तितः ॥ ३३ ॥
अथवा दो विशिष्ट स्वरों या पदों का क्रम ( यदि ) परस्पर मिल जाता
हो तो उसे भी 'सन्धि' जानो ॥ ३३ ॥
उसके लक्षण को बतलाया गया है । इसी प्रकार का आशय कलापव्याकरण में
दुर्ग सिंह ने भी व्यक्त किया है । यथाः—'अर्थस्य विभजनाद्विभक्तिः'
१. स्वर या व्यंजनों का केवल संयोग या सम्मिश्रण मात्र न तो सन्धि है
न ही यह उसका प्रयोजन है किन्तु ध्वनिगतप्रभाव तथा सम्भाषणगत
आवश्यकता के कारण भी सन्धियाँ होती हैं । इन सन्धियों का पाँच प्रकारों में
विभाजन है और इसी कारण इनकी संज्ञा भी पाँच हैं—यथा—( १ ) स्वर,
( २ ) व्यंजन, ( ३ ) प्रकृतिभाव, ( ४ ) अनुस्वार तथा ( ५ ) विसर्गसन्धि ।
समीप आकर ( समय के लाघवार्थ ) मिलने का कार्य—जो कि पृथक् दो
ध्वनियों के अलग उच्चारण करने पर व्यर्थ ही अधिक समय ले लेता है—यदि
किया गया हो तो सन्धि कहलाता है । यह प्राचीन वैयाकरणों की 'अर्धमात्रा-
लाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणाः' उक्ति के साथ ही सन्धि के उस नियम को
भी—जिसके अनुसार अर्धमात्रा का उच्चारण में व्यवधान होने से उसके पृथक्
उच्चारण के बजाय सम्मिलित उच्चारण ही 'सन्धि' करते हुए किया जाए—इस
प्रकार के सिद्धान्त तथा उनकी स्वाभाविक वृत्ति तथा योजना को समर्थित करता
है । यह सन्धि इसीलिए भी की जाती है कि दो जिससे श्लोकार्थ एकत्र न हों ।
१. वर्णक्रमसंसिद्धः—क०; वर्णक्रमसम्बद्धः—ख०; ग० ।
२. पदैकयोगोऽन्यवर्णयोगाच्च—ख०; ग० ।
३. सन्धीयते च यस्मात्तस्मात् सन्धिः समुद्दिष्ट—ख०; ग० ।
४. पद्यमेतत् ख० ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।