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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

१९६ नाट्यशास्त्रम्
स्वरोलङ्कारसंयुक्तमस्वस्थंपुरुषाश्रयम् ।
यदीदृशं भवेन्नाट्यं नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७२ ॥
यदि किसी रूपक में वाक्यावली, क्रियाएँ, प्राणी-वर्ग (पुरुष या दिव्य
जाति के पात्र) तथा भाव असामान्य हों, जिसमें लीला (मनोहर
चेष्टाओं) से युक्त अङ्गहारों तथा लक्षण सम्पन्न नृत्य का प्रदर्शन हो, स्वर
तथा अलङ्कारों की (काव्य-रचना तथा संगीत में) सुव्यवस्थित योजना हो,
जिसमें (भूमिका धारण करने वाले) अदिव्य पुरुषों के भाव तथा चरित्र
कुशलतापूर्वक वहन किये जाएँ तो उसे नाट्यधर्मी प्रकार जानिये ॥७१-७२॥
लोके³ यदभियोज्यञ्च पदमत्रोपयुज्यते ।
मूर्त्तिमत्साभिभाषञ्च नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७३ ॥
जिसमें लोक प्रसिद्ध वस्तु का मूर्तरूप में वैसी ही कुशलता से संवाद
सहित प्रयोग किया जाये तो उसे भी 'नाट्यधर्मी' जानो ॥ ७३ ॥
आसन्नोक्तञ्च यद्वाक्यं न शृण्वन्ति परस्परम् ।
अनुक्तं श्रूयते यच्च नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७४ ॥
(प्रदर्शन के समय) जहाँ समीपतर वचन भी न सुने जाएँ और
अनुक्त वचन का भी सुनते हुए प्रत्युत्तर दिया जाता हो उसे भी 'नाट्यधर्मी'
समझो ॥ ७४ ॥
शैलयानविमानानि चर्मवर्मायुधध्वजाः ।
मूर्तिमन्तः प्रयुज्यन्ते नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७५ ॥
जिसमें पर्वत, वाहन, विमान तथा ढाल, कवच, शस्त्र तथा ध्वज आदि
का मूर्तरूप में प्रयोग किया गया हो तो उसे भी 'नाट्यधर्मी' जानो । ७५॥
यं एकां भूमिकां कृत्वा कुर्वीतैकान्तरेऽपराम् ।
कौशल्यादेककृत्वाद्वा नाट्यधर्मीति सा स्मृता ॥ ७६ ॥
१. अभिनवगुप्ताचार्य ने बतलाया है कि इसका उदाहरण है—माया—पुष्पक
नामक नाटक में ब्रह्मशाप का मूर्तरूप में रङ्ग पर प्रवेश ।
१. सर्वालङ्कार—क० । २. नाट्यस्थ—क०; मस्वर्भू—ख० ग० ।
३. लोकप्रसिद्धद्रव्यन्तु यदा नाट्ये प्रयुज्यते—क०; ख० ।
४. वृत्तिमत् साभिभाषञ्च—ख०; ग० । ५. साभिलाषञ्च—क० ।
६. कृतं हि तत्—क० । ७. पद्यद्वयं ख-ग पुस्तकयोर्नास्ति ।
८. पुनरन्यां प्रयोजयेत्—क० । ९. कोशलादेककृत्यत्वात्—क० ।