नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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सुकुमार नाट्य-प्रयोग—
नाटकं सप्रकरणं भाणो वीथ्यङ्क१ एव च ।
सुकुमारप्रयोगाणि मानुषेष्वाश्रितानि तु ॥ ६२ ॥
नाटक, प्रकरण, वीथी तथा अंक को सुकुमार नाट्य प्रयोग माना जाता
है तथा इसका अभिनय केवल मनुष्यों के द्वारा किया जाता है ॥ ६२ ॥
अथ बाह्यप्रयोगे तु प्रेक्षागृहविवर्जिते ।
विदिक्ष्वपि भवेद्रङ्गं३ कदाचिद्भर्तुराज्ञया ॥ ६३ ॥
यदि कोई नाट्य-प्रदर्शन खुली जगह पर किया जाए जहाँ स्थायी
प्रेक्षागृह न हो तो स्वामी की आज्ञा से उस प्रेक्षागृह का किसी विदिशा
(ईशान्य आदि कोणों) की ओर भी मुंह रखा जा सकता है ॥ ६३ ॥
पृष्ठे कृत्वा कुतपं नाट्यं युङ्क्ते यतो मुखं भरतः ।
सा पूर्वा मन्तव्या प्रयोग५-कालेन नाट्यज्ञैः ॥ ६४ ॥
अभिनेता वाद्यों की ओर पीठ रखते हुए कभी अभिनय नहीं करता
है अतएव वाद्याभिमुख स्थित नट के मुख की ओर ही पूर्व दिशा मान ली
जाए ॥ ६४ ॥
द्वाराणि षट्चैव भवन्ति चात्र६ रङ्गस्य दिग्भाण्डविनिश्चितानि ।
नाट्यप्रयोगेन खलु प्रवेशे प्राच्यां प्रतीच्याञ्च दिशि प्रवेशः ॥ ६५ ॥
विधानमुत्क्रम्य यथात्र रङ्गे विना७ प्रमाणाद्विदिशः प्रयोगे ।
द्वारन्तु यस्मात्समुदङ्गभाण्डं प्राचीं दिशं तां मनसा८ध्यवस्येत् ॥ ६६ ॥
वयोऽनुरूपः प्रथमं९ तु वेषो वेषानुरूपश्च गतिप्रचारः ।
गतिप्रचारानुगतश्च पाठ्यं पाठ्यानुरूपोऽभिनयश्च कार्यः ॥ ६७ ॥
प्रेक्षागृह के दिशा तथा उनके भागों के विभागानुसार छः द्वार बतलाये
गये हैं परन्तु नाट्य प्रदर्शन के समय पात्रों का प्रवेश केवल पूर्व या पश्चिम
द्वार से ही होना चाहिये । बिना विधान के (कदाचित् स्वामी आदि के
आदेश से) ईशान्य आदि विदिग् की ओर भी रङ्गमञ्च का द्वार रखा जा
१. वीथ्यङ्कनाटिके—ख; ग० । २. योज्यान्येतानि मानुषैः—क० ।
३. भवेद्रङ्गः—ख०; ग० । ४ कृत्वास्य—ख०; ग० ।
५. प्रयोगकाले तु—ख०; ग० । ६. चास्य—ख; ग० ।
७. कृतः कथञ्चिद्विदिशः प्रयोगः—क०; लीना प्रमाणाद्विदिशः—ख०; ग० ।
८. मनसा व्यवस्येत्—क० । ९. प्रथमस्तु—ख०; ग० ।