नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः १९७
जिसमें अभिनेता एक भूमिका का निर्वाह कर चुकने पर पुनः दूसरी
भूमिका धारण कर ले तथा अपनी कुशलता से दोनों भूमिकाओं का एक
समान सफलतापूर्वक निर्वाह करे तो उसे भी 'नाट्यधर्मी' जानो ॥ ७६ ॥
याऽगम्या प्रमदा भूत्वा गम्या भूमिषु युज्यते¹।
गम्या भूमिष्वगम्या वा नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७७ ॥
जो स्त्री अभिनेत्री पहिले अगम्य स्त्री (पूज्य या वृद्धा) की भूमिका
धारण करने के उपरान्त गम्या स्त्री (नायिका या प्रेयसी) की भूमिका धारण
करे या गम्या स्त्री की भूमिका के साथ अगम्या स्त्री की भूमिका भी धारण
करे तो यह (केवल नाट्य प्रयोजन या कार्य चलाने के कारण) 'नाट्यधर्मी'
कहलाता है ॥ ७७ ॥
ललितैरङ्ग²विन्यासैस्तथोत्क्षिप्तपदक्रमैः।
नृत्यते गम्यते चा³पि नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७८ ॥
(किसी नाटक में पात्रों की) गति ललित अङ्गों की हलचल के साथ
पैरों की डग भरते हुए प्रदर्शित की जाने पर सामान्य गति होने पर भी
(सुन्दरता के कारण) नृत्य की गति के समान असामान्य लगे तो उसे भी
'नाट्यधर्मी' समझना चाहिये ॥ ७८ ॥
योऽयं⁴ स्वभावो लोकस्य सुखदुःखक्रियात्मकः।
सोऽङ्गाभिनयसंयुक्तो नाट्यधर्मी प्र⁵कीर्तितः ॥ ७९ ॥
जब प्रतिदिन होने वाले स्वाभाविक सुख दुःखों की क्रियाओं का
(अभिनेताओं के द्वारा) अङ्गादि अभिनयों से युक्त हूबहू प्रदर्शन किया
जाता हो तो उसे भी 'नाट्यधर्मी' समझना चाहिये ॥ ७९ ॥
यश्चेतिहा⁶सवेदार्थो ब्रह्मणा समु⁷दाहृतः।
दिव्यै⁸र्मानुषरत्यर्थे⁹ नाट्यधर्मी तु सः स्मृतः ॥
१. योज्यते—क०।
२. यश्चाङ्गहारविन्यासै—क०।
३. चैव—क०।
४. यश्च स्वभावो—क०।
५. तु सा स्मृता—क०।
६. यत् सेतिहास—क०।
७. काव्यसम्मतः, काव्यधर्मतः—क०।
८. देव—क०। ९. रत्यर्थो—क०।