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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 668 में से

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पृष्ठ 310

चतुर्दशोऽध्यायः १९९
उक्तो मयेहाभिनयो यथावच्छाखाकृतो¹ यस्तु कृतोऽङ्गहारैः ।
पुनश्च² वाक्याभिनयं यथावद् वक्ष्ये स्वरव्यञ्जनवर्णयुक्तम् ॥ ८४ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे कक्ष्या³-प्रवृत्ति-धर्मी-व्यञ्जको
नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥
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इस प्रकार मैंने शाखा तथा अङ्ग से निर्मित होनेवाले अभिनय का
विधिवत् वर्णन किया। (अर्थात् समग्र आंगिकाभिनय बतलाया) अब मैं
स्वर तथा व्यंजन से निर्मित वाक्याभिनय (वाचिकाभिनय) को (अगले
अध्याय में) बतला रहा हूँ ॥ ८४ ॥
भरत मुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र का कक्ष्या-प्रवृत्ति धर्मी आदि का
निरूपक 'चतुर्दश अध्याय' समाप्त
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१. भावः कृतो यश्च कृताङ्गहारः—ख०; कृताङ्गहारैः—ग० ।
२. वक्ष्यामि वाक्याभिनयं स्वशक्त्या भूयः स्वरव्यञ्जन—क० ।
३. नाट्यधर्मीप्रवृत्तिव्यञ्जनो नाम—क०; करयुक्तिधर्मीव्यञ्जको नाम त्रयो-
दशोऽध्यायः—ख०, प्रवृत्तिधर्मव्यञ्जको नाम—ग० ।