नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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(प्रक्षिप्त—ब्रह्मा के द्वारा अभिहित इतिहास तथा वेद के अर्थों का
निदर्शक जो नाट्यवेद निर्मित किया गया है। जो देवता और मनुष्यों का
मनोरञ्जक उपकरण है उस नाट्यशास्त्र को भी 'नाट्यधर्मी' समझना
चाहिये।)
यश्च कक्ष्याविभागोऽयं नानाविधिसंमाश्रितः ।
रङ्गपीठगतः प्रोक्तो नाट्यधर्मी तु सः स्मृतः ॥ ८० ॥
अभी जो रङ्गमञ्च तथा उसकी कक्ष्याओं का विधिवत् विभाग बतलाया
गया वह भी 'नाट्यधर्मी' प्रकार का उदाहरण समझिये ॥ ८० ॥
नाट्यधर्मीप्रवृत्तं हि सदा नाट्यं प्रयोजयेत् ।
न ह्यङ्गाभिनयात् किञ्चिदृते² रागः प्रवर्तते ॥ ८१ ॥
सदा 'नाट्यधर्मी' के द्वारा सम्पन्न होने वाले 'नाट्य प्रयोग' का प्रदर्शन
करना चाहिए। क्योंकि आंगिक अभिनय के प्रदर्शन से हीन नाट्य-प्रयोग
दर्शकों को प्रसन्न नहीं कर सकता ॥ ८१ ॥
सर्वस्य सहजो भावः सर्वो ह्यभिनयोऽर्थतः³ ।
अङ्गालङ्कारचेष्टा तु नाट्यधर्मी प्रकीर्तिता ॥ ८२ ॥
मनुष्यों में विद्यमान सभी सहज भाव जब आंगिक अभिनय, अलङ्कार
तथा चेष्टाओं के साथ आवश्यकतानुसार (अर्थतः) प्रदर्शित किये जाते
हैं तो वे सभी अन्ततोगत्वा नाट्यधर्मी ही कहलाते हैं ॥ ८२ ॥
एवं कक्ष्याविभागस्तु धर्मी युक्तय एव च ।
विज्ञेया नाट्यतत्त्वज्ञैः प्रयोक्तव्याश्च तत्त्वतः ॥ ८३ ॥
(मैने) इस प्रकार कक्ष्या विभाग, धर्मी तथा प्रवृत्तियों के विषय में
जो बतलाया उसे नाट्य-प्रयोक्ता ठीक से समझे और फिर उसे प्रयत्न-
पूर्वक (यथातथ्य) प्रदर्शित करे ॥ ८३ ॥
१. देशसमाश्रयः —क० ।
२. किञ्चिद्विना नाट्यं—क० ।
३. -र्थजः—क० ।
४. धर्मीति संज्ञिता—क० ।
५. विभागास्तु—ग० ।
६. धर्मी-युक्तस्तथैव च-क; धर्मयुक्ताः प्रकीर्तिता. —ग० ।
७. विज्ञेयो—क० ।
८. प्रयोक्तव्यश्च—क० ।