नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः
( वाचिकाभिनयाद्याध्याय )
यो वागभिनयः १पूर्वं मया प्रोक्तो द्विजोत्तमाः ।
लक्षणन्तस्य वक्ष्यामि स्वरव्यञ्जनसम्भवम् ॥ १ ॥
हे मुनिजन, अभिनयों के निरूपण के प्रसङ्ग में जो पहिले मैंने वाचिक
अभिनय बतलाया था अब उसका ( अवसर प्राप्त होने के कारण ) स्वर
एवं व्यञ्जनों के द्वारा निर्मित होने वाला लक्षण बतलाता हूँ ॥ १ ॥
नाट्य ( रचना ) में संवादों का महत्त्व—
वाचि यत्नस्तु२ कर्तव्यो नाट्यस्यैषा३ तनुः स्मृता ।
अङ्गनेपथ्यसत्त्वानि४ वाक्यार्थं५ व्यञ्जयन्ति हि ॥ २ ॥
( कवि के द्वारा काव्यादि निर्माण तथा अभिनेता के द्वारा प्रयोग के
अवसर पर ) शब्दों पर२ विशेष उद्योग ( प्रयत्न ) रहना चाहिये, क्योंकि यही
सारे नाट्यप्रदर्शन का कलेवर है। क्योंकि अङ्ग, नेपथ्य-रचना तथा सत्त्वा-
भिनय वाक्य के ( शब्द के ) अर्थों की ( ही ) अभिव्यक्ति करते हैं ( आशय
यह कि—वाचिक अभिनय के ये सभी सहायक ( मात्र ) है। यदि वाचिक
अभिनय शिथिल हो तो अन्य अभिनयों से प्रयोग सुरुचिपूर्ण नहीं बन
सकता ) ॥ २ ॥
१. चार प्रकार के अभिनय का ना० शा० अध्याय ६।२३ पर उल्लेख किया
जा चुका है।
२. यह नियम अभिनेताओं और नाट्यरचनाकार पर समान रूप से लागू
है। अभिनवगुप्तपादाचार्य का मत है कि नट के द्वारा अभिनय की और लेखक
के द्वारा निर्माण की दशा में शब्दों की रचना पर ध्यान देना चाहिये। ( अभि०
भा० पृ० २२० )
आङ्गिक अभिनय के पश्चात् वाचिक अभिनय का स्वरूप निरूपण क्रम प्राप्त
है; यह नाट्य का अनुप्राणक तत्व है तथा विषय के उत्तमता से प्रस्तुत करने में
अतिशय महत्वशाली भी है इसीलिए वाचिक अभिनय का लक्षण बतलाने के
क्रम को चलाने के कारण इसकी पूर्व अध्याय से संगति भी स्थापित होती है।
१. प्रोक्तो मयापूर्व—क० । २. यत्नो विधातव्यः—क० ।
३. नाट्यस्येयं—क० । ४. तत्त्वानि—क० । ५. वागर्थं—क० ।