नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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सकता है। वैसे ही मृदङ्ग आदि वाद्यों का जिधर मुंह रखा जाये उस द्वार
को भी पूर्व द्वार स्वीकार करना चाहिये। नाट्य प्रदर्शन में वय के अनुरूप
(स्वाभाविकता उत्पन्न करने के लिए) वेश, वेष के अनुरूप गति आदि
क्रियाएँ, गति प्रचार के अनुकूल संवाद (पाठ्य) तथा संवाद के अनुकूल ही
अभिनय का संयोजन रहना चाहिये ॥ ६५-६७॥
लोक तथा नाट्य-धर्मी—
धर्मी यौ द्विविधा प्रोक्ता मया पूर्वं द्विजोत्तमाः ।
लौकिकी नाट्यधर्मी च तयोर्वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ ६८ ॥
मैंने पहिले (उद्देशकथन के अवसर पर) जो लोक तथा नाट्य-धर्मी
बतलाये थे, अब उनका लक्षण बतलाता हूँ ॥ ६८ ॥
लोकधर्मी—
स्वभावभावोपगतं^२ शुद्धंन्त्वविकृतं^३ तथा ।
लोकवार्ताक्रियोपेतमङ्गलीलांविवर्जितम्^५ ॥ ६९ ॥
स्वभावाभिनयोपेतं नानास्त्रीपुरुषमाश्रयम्^४ ।
यदीदृशं भवेन्नाट्यं लोकधर्मी तु^१ सा स्मृता ॥ ७० ॥
यदि कोई रूपक लोक स्वभाव के अनुसार भाव प्रदर्शित करने वाला
सादगी तथा बिना बाहरी दिखावट वाला हो, (अविकृत) जो अपनी
(कथा वस्तु में) सामान्य प्रजाजन के आचार तथा क्रियाएं प्रदर्शित
करने वाला तथा आंगिक प्रदर्शन जो—लीला तथा वर्तना आदि के
अभिनय—से रहित सादे एवं सहज भावप्रदर्शन करता हो, जिसमें विभिन्न
पुरुष तथा स्त्री पात्र हों तो उसे 'लोकधर्मी' नाट्य प्रकार समझना
चाहिये ॥ ६९-७० ॥
नाट्यधर्मी—
अतिवाक्य^६क्रियोपेतमतिसत्वाति-भाविकम्^७ ।
लीलाङ्गहाराभिनयं नाट्यलक्षणलक्षितम्^८ ॥ ७१ ॥
१. तु—क० । २. स्वभावकर्मोपगतं—क० ।
३. शुद्धञ्च विकृतञ्च यत्—क० । ४. नानाभावरसान्वितम्—क० ।
५. भिनयस्थानम्—क० ।
६. अतिसत्त्वक्रियोपेतम्, गीतवाद्यक्रियोपेतम्—क० ।
७. भाविकम्—क०; भाषितम्—ख०; ग० ।
८. नाट्यताललयान्वितम्—क० ।