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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

त्रयोदशोऽध्यायः १३१
वामवेधं ततः कुर्याद्विक्षेपं दक्षिणेन च ।
परिवृत्य द्वितीयन्तु गच्छेत् कोणं ततः परम् ॥ १७ ॥
तत्रापि वामवेधस्तु विक्षेपो दक्षिणेन च ।
ततो भाण्डोन्मुखो गच्छेत्तान्येवं तु पदानि च ॥ १८ ॥
एवं गतागतैर्गत्वा पदानामेकविंशतिम् ।
वामवेधं ततः कुर्याद्विक्षेपं दक्षिणस्य च ॥ १९ ॥
वह पार्श्वक्रान्ता चारी में वाद्यवादन के साथ सुन्दरतापूर्वक पैरों को
रखते हुए रङ्गमञ्च के कोने की ओर पाँच डग भरे । फिर वह 'सूची' चारी
को बाएँ पैर को आगे रखते हुए प्रदर्शित करे तथा दाहिने पैर को पीछे
रख कर 'विक्षेप' को प्रस्तुत करे; फिर (गोल) घूमकर दूसरे कोने की
ओर पाँच डग भरे और बाएँ पैर को आगे रखते सूचीचारी को तथा
दाहिने पैर को उसके पीछे रखकर 'विक्षेप' को प्रदर्शित करे; फिर गोल
घुमाव लेकर वाद्यों की ओर बढ़ते हुए इसी प्रकार पाँच डग भरे । इस
प्रकार आने-जाने में होने वाली डगों की इक्कीस संख्या को पूरी कर वह
बाँए पैर से 'सूची' चारी को तथा उसके पीछे दाहिने पैर को रखकर पुनः
विक्षेप का प्रदर्शन करे ॥ १६-१९ ॥
रङ्गे विकृष्टे भरतेन कार्यो गतागतः पादगतिप्रचारः ।
त्र्यश्रस्त्रिकोणे चतुरस्ररङ्गे गतिप्रचारश्चतुरस्र एव ॥ २० ॥
'विकृष्ट' नाट्यगृह में अभिनेता अपने पैरों की डग आने-जाने वाली
तथा विस्तीर्ण रखे, त्र्यस्रनाट्यगृह में वही चारी (त्रिकोणाभिमुखी या) तिरछी
और चतुरस्र नाट्यगृह में पैरों की डग चतुरश्र प्रकार वाली रखनी चाहिए ॥
यः समैः सहितो गच्छेत्तत्र कार्यो लयाश्रयः ।
चतुष्कलोऽथ द्विकलस्तथैवैककलः पुनः ॥ २१ ॥
जब अभिनेता समगति में अपने समानस्थितिवाले पात्रों के साथ
चल रहा हो तो उसकी गति की लय (उसकी प्रकृति तथा विधि के
अनुसार) चार, दो या एक कला के अनुसार रखी जाए ॥ २१ ॥
१. दक्षिणस्य च—क० । २. तान्येव विपदानि च—ख०; ग० ।
३. गतागतैः कृत्वा—ख०; ग० । ४. विंशतिः—क० ।
५. दक्षिणेन च—ख० । ६. त्र्यस्रे त्रिकोणे—ग० ।
७. द्विकलो भवेदेककलः—ग० ।

१३२ नाट्यशास्त्रम्
अथ मध्यमनीचैस्तु गच्छेद्यः परिवारितः ।
चतुष्कलमथोर्द्ध्वञ्च¹ तथा चैककलं पुनः ॥ २२ ॥
किन्तु जब कोई (अभिनेता) मध्य तथा नीच प्रकृति के पात्रों के
साथ चले तो (इस वर्ग की गति के समय) लय को चार, दो तथा एक
कला वाली (स्थिति या योग्यतानुसार) रखी जाय ॥ २२ ॥
देव²-दानव-यक्षाणां नृपपन्नगरक्षसाम् ।
चतुस्तालप्रमाणेन कर्त्तव्याथ गतिर्बुधैः ॥ २३ ॥
देव, दानव, नाग, राक्षस, यक्ष तथा राजा (जैसे उत्तम पात्रों) की
गति चारताल के प्रमाणवाले डग भरते हुए रहना चाहिए ॥ २३ ॥
दिवौकसान्तु सर्वेषां³ मध्यमा गतिरिष्यते ।
तत्रापि चो⁴द्धृता ये तु तेषां देवैः समा गतिः ॥ २४ ॥
स्वर्ग के (सभी प्रकृति के) देवताओं की मध्यमा गति होती है। पर
उनमें भी जो उद्धत प्रकृति के पात्र हों उनकी गति देवताओं के समान
प्रमाणवाली रखी जाए ॥ २४ ॥
पात्रानुसारी गति—
ऋषयः ऊचुः—
यदा मनुष्या राजानस्तेषां दैव⁶गतिः कथम् ।
अत्रोच्यते⁵ कथं नैषा गतिं⁷ राज्ञां भविष्यति ॥ २५ ॥
अथ⁸ दिव्या प्रकृतयो दिव्यमा⁹नुष्य एव च ।
मानुष्यं¹⁰ इति विज्ञेया नाट्यवृत्तिक्रियां¹¹ प्रति ॥ २६ ॥
देवानां¹² प्रकृतिर्दिव्या राज्ञां¹³ वै दिव्यमानुषी ।
यात्वन्या लोकविदिता मानुषी सा प्रकीर्तिता ॥ २७ ॥
१. अथोर्द्ध्वञ्च—ख०, ग० । २. दैत्य—ख० ।
३. शेषाणां—क० । ४. चोर्द्ध्वगा—ख०, ग० ।
५. अत्राह—ग० । ६. तथा दैवगतिः—क० । ७. गते—क० ।
८. इह प्रकृतयो दिव्या—ख० ग० ।
९. तथा च दिव्यमानुषी—ख०, ग० । १०. मानुषी चेति—ख०, ग० ।
११. नाट्यस्य प्रक्रियां—क०, नाट्यनृत्तक्रियां—ख० ।
१२. देवा हि—ख० । १३. राजानो—ख० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १४३
देवांशाजास्तु १ राजानो वेदाध्यात्मसु २ कीर्तिताः ।
एवं देवानुकरणे ३ दोषो ह्यत्र ४ न विद्यते ॥ २८ ॥
ऋषियों ने भरतमुनि से पूछा कि राजा के मनुष्य पात्र के रूप में रहने
पर उसकी दिव्य—पात्रों जैसी गति क्यों रखी जाती है ? उत्तर—राजाओं
की देवगण के समान गति रखने में क्या अड़चन है ? क्योंकि रूपकों में,
दिव्यमानुष तथा मानुष-पात्र होते हैं। इनमें देवताओं की दिव्य, राजाओं
की दिव्यमानुष तथा शेष लोक सुलभ ( प्रसिद्ध ) पात्रों की मानुषी-प्रकृति
मानी गई है। वेद तथा वेदान्त-( अध्यात्म ) शास्त्र में राजा को देवों के
अंश से उत्पन्न माना गया है; इसलिए 'राजा' की दिव्यपात्र जैसी गति
रखने में कोई हानि नहीं समझना चाहिए ॥ २५-२८ ॥
अयं विधिस्तु कर्त्तव्यः ५ स्वच्छन्दगमनं प्रति ।
सम्भ्रमोत्पातरोषेषु प्रमाणं न विधीयते ॥ २९ ॥
यह विधान साधारण ( सामान्य ) गति के लिए हैं। आवेग, उत्पात
तथा क्रोध की दशा में (पात्रों की) गति के कोई नियम नहीं रहते हैं ॥२९॥
विशेष अवस्थाओं में पात्रों की गति—
सर्वासां प्रकृतीनान्तु अवस्थान्तरसंज्ञया ।
उत्तमाधममध्यानां ६ गतिः कार्या प्रयोक्तृभिः ॥ ३० ॥
( किन्तु ) नाट्य विधायक जन सभी पात्रों की—जो कि उत्तम, मध्यम
तथा अधम प्रकृति के हों उनकी अवस्थाओं को देखकर तदनुसार 'गति'
को रखें ॥ ३० ॥
चतुरर्द्धकलं ७ वा स्यात्तदर्धकलमेव च ।
अवस्थान्तर ८ मासाद्य कुर्याद्गतिविचेष्टितम् ॥ ३१ ॥
विशेष अवस्था में इन उत्तमादि पात्रों की गति का समय चार कलाओं
का, उसका आधा (दो कला) तथा उसके अर्धभाग का आधा ( एक कला )
रखना चाहिए ॥ ३१ ॥
१. देवाम्बजास्तु—ख०, ग० । २. वेदाध्यात्मप्रकीर्तिताः—ग० ।
३. देवानुसरणे—क० । ४. देवो—ख० ।
५. विधेयः—क० । ६. मध्योत्तमाधमानाञ्च—ग० ।
७. चतुर्थेककलं चा—क०, चतुरर्धकलंञ्च—ख० । ८. अथवान्तर—क० ।

१३४ नाट्यशास्त्रम्
ज्येष्ठे चतुष्कलं यत्र मध्यमे द्विकलं भवेत् ।
द्विकला चोत्तमे यत्र मध्ये त्वेककला भवेत् ॥ ३२ ॥
( विभिन्न पात्रों से सम्बद्ध उनके समय तथा गतियों की विशिष्ट
अवस्थाओं में ) उत्तम पात्र की गति चार कला के प्रमाणवाली, मध्यम पात्र
की दो कला की गति तथा अधम पात्र की गति एक कला की
होती है परन्तु जब उत्तमपात्र की दो कला की हो तो मध्यमपात्र की एक
कला के प्रमाण की गति रखना चाहिए ॥ ३२ ॥
कँलिकं मध्यमे यत्र नीचेष्वर्द्धकलं भवेत् ।
एवमर्द्धार्द्धहीनन्तु कलानां सम्प्रयोजयेत् ॥ ३३ ॥
तथा जब मध्यम पात्र की एक कला की गति हो तो अधम पात्र की
आधी कला की रहती है। इस प्रकार विशेष अवस्थाओं में कला का
परिमाण आधा-आधा कर दिया जाता है ॥ ३३ ॥
उत्तमानां गतिर्या तु न तां मध्येषु योजयेत् ।
मध्यमानां गतिर्या तु न तां नीचेषु योजयेत् ॥ ३४ ॥
उत्तम पात्रों की गति की मध्यम पात्र तथा मध्यम पात्र की गति की
अधम पात्र में योजना नहीं करना चाहिए ॥ ३४ ॥
( विशेष दशा में ) गतियों का लय-विधान—
त्वरार्त्ते च क्षुधार्त्ते च तपः श्रान्ते भयान्विते ।
विस्मये चावहित्ये च तथौत्सुक्यसमन्विते ॥ ३५ ॥
शृङ्गारे चैव शोके च स्वच्छन्दगमने तथा ।
गतिः स्थितलया कार्याधिकलान्तरपातिता ॥ ३६ ॥
पुनश्चिन्तान्विते चैव गतिः कार्या चतुष्कला ।
१. विकला—क०, विकलं चोत्तमा यत्र—ख०, ग० ।
२. नीचेष्वर्द्धकलं भवेत्—ख०, ग० ।
३. श्लोकार्धमेतत् ख०, म० पुस्तकयोर्नास्ति ।
४. मर्द्धार्द्धहानिं तु—ख०, ग० । ५. पद्यमेतत्—क० पुस्तकेऽत्र नास्ति ।
६. विक्षते—क० ।
७. गतिः स्थितलया कार्या विफलान्तरपातिना—ख० ग० ।
८. श्लोकार्धमेतत्—ख० पु० नास्ति ।

त्रयोदशोऽध्यायः १३५
ज्वर-ग्रस्त, क्षुधार्त, श्रान्त, भयभीत व्यक्ति की तथा विस्मय,
अवहित्था, औत्सुक्य, शृङ्गार रस (विप्रलम्भ इष्ट है) तथा शोक की
अवस्थाओं में स्थित (विलम्बित) लय में गति रखते हैं—जिसमें चारकलो
से अधिक समय लगता हो (या कम से कम चार कला का समय लगे)
किन्तु सचिन्तायुक्त-दशा में गति चार कला प्रमाणवाली ही रहना चाहिए ॥
अस्वस्थकामिते चैव भये² वित्रासिते तथा ॥ ३७ ॥
आवेगे चैव हर्षे च कार्ये यच्च त्वरान्वितम् ।
अनिष्टश्रवणे चैव क्षेपे⁴ चाद्भुतदर्शने ॥ ३८ ॥
अपि चात्ययिके कार्ये दुःखिते शत्रुमार्गणे ।
अपराद्धानुसरणे⁶ श्वापदानुगतौ⁷ तथा ॥ ३९ ॥
एतेष्वेवं⁸ गतिं प्राज्ञो द्विकलां सम्प्रयोजयेत् ।
प्रच्छन्न-कामिता, (अस्वस्थकामिता) भय, व्यग्रता (वित्रास),
आवेग, हर्ष, शीघ्रता के कार्य, अनिष्ट-श्रवण, निन्दा, अद्भुत-दर्शन,
आवश्यक कार्य, दुःख, शत्रु के ढूँढ़ने, अपराधी का पीछा करने तथा शिकार
के पीछे पड़ने की दशा में ऐसे पात्रों की दो कला की गति बुद्धिमान्
निर्देशक द्वारा संयोजित की जाए ॥ ३७-४० ॥
गतिः शृङ्गारिणी कार्या स्वस्थे¹⁰कामितसम्भवा ॥ ४० ॥
१. आचार्य अभिनवगुप्त ने यहाँ अधिकलान्तरपातिता पद की व्याख्या में
बतलाया कि यहाँ अधिकलान्तरपातिता में अधि शब्द का अर्थ आधिक्यपरक होता
है। यह आधिक्य उत्कर्ष है जो चार कला के प्रमाण की गति से बिलम्बित लय
में पैरों का रखना है। यह प्लुत जैसे स्वर या विराम के आधिक्य में ताल के
बोध का सूचक है। इसका आशय यह कि पाद-पात में छः या आठ कलाओं के
अन्तर से रखी जाने वाली गति या डग का भी आधिक्यपरक स्थिति में ग्रहण
हो सकता है परन्तु ऐसी गतियाँ स्त्री पात्रों में संयोजित नहीं करना चाहिए।
१. अस्वस्थे कामिते—ख०, ग० ।
२. भयाद्वित्रा—क०, भयवित्रा—क० । ३. यच्चतुरान्विते—क० ।
४. कोपेष्याद्भुतदर्शने—ग० । ५. तथा चैवारिमार्गणे—ख० ।
६. अवरुद्धानुकरणे, अपराद्धानुकरणे—क०, अपराध्वानुसरणे—ग० ।
७. नुगते—ख०, ग० । ८. एतेष्वेव—क० ।
९. विकलां—क० । १०. स्वच्छकामित—ख०, ग० ।

१३६ नाट्यशास्त्रम्
शृङ्गार रस में गति :-
१दूतीदर्शितमार्गस्तु प्रविशेदङ्गमण्डलम् ।
सूच्या२ चाप्यभिनयं कुर्यादर्थसमाश्रयम् ॥ ४१ ॥
३हद्यैर्वस्त्रैस्तथा गन्धैर्धूपैश्चूर्णैश्च भूषितः ।
नानापुष्पसुगन्धाभिर्मालाभिः समलङ्कृतः ॥ ४२ ॥
गच्छेत् सललितैः पादैरतिक्रान्तस्थितैस्तथा ।
तथा सौष्ठवसंयुक्तैर्लयतालवशानुगैः ॥ ४३ ॥
पादयोर्नुगौ चापि हस्तौ कार्यौ प्रयोक्तृभिः ।
७उत्क्षिप्य हस्तं पातेन पादयोश्च विपर्ययात् ॥ ४४ ॥
शृङ्गार रस की दशा में प्रकट रूपवाले या अप्रच्छन्न कामासक्त पात्र
(स्वस्थकामित) की गति ललित रखना चाहिए। शृंगारी पात्र दूती के
द्वारा बतलाए मार्ग से रंग-मंच पर प्रवेश करे। वह सूचाभिनय१ के द्वारा
अपने आन्तरिक भावों को प्रकट करें। यह सुन्दर वस्त्रालंकारों से सुसज्जित
सुगन्धित गन्ध, धूप तथा चूर्ण से भूषित तथा विभिन्न एवं मधुर गन्धवाली
पुष्प मालाएं धारण किये हो, यह ललित गति से 'अतिक्रान्ता' चारी में
चले, (शरीर के) सभी अवयव 'सौष्ठव' युक्त हो तथा इसकी चाल लय-ताल
के अनुसार हो। पैरों की गति का हाथों द्वारा अनुसरण होना चाहिए व
१. सूच्चाभिनय के लक्षण के लिये देखिये : ना० शा० सामान्याभिनयाध्याय
का निम्न श्लोक ।
'वाक्यार्थावाक्यं वा, सत्त्वाङ्गैः सूच्यते यदा पूर्वम् ।
पश्चाद् वाक्याभिनयः, सूचेत्यभिसंज्ञिता सा तु ॥' (अ० २४।४४ )
अर्थात् जब किसी वाक्य के भाव की किसी वाक्य के आरम्भ में चेष्टाओं के
द्वारा अभिव्यक्ति हो तथा बाद में उसे वाचिक अभिनय या कथोपकथन के द्वारा
प्रस्तुत किया जाए तो ऐसी नाट्यविधा 'सूचा' कहलाती है ।
१. दर्शनमार्गस्तु—क०, दर्शनमार्गेण—ग०।
२. सूच्या चाभिगमनं-क०, सूचयन्वाभिनयं-ख०, सूचयन्चाप्यभिनयं-ग० !
३. हृद्यैर्गन्धैस्तथा वस्त्रैरलङ्कारैश्च भूषितः—ग०।
४. रतिक्रान्तोत्थितैस्तथा—ग०। ५. तालसमन्वितैः—ग०।
६. पादयो र्नुगौ हस्तौ नित्यौ कार्यौ प्रयोक्तृभिः—ग०।
७. उत्क्षिप्तः सहपादेन पतनेन विपर्ययः—ग०।

त्रयोदशोऽध्यायः १३७
पैर को हाथ के गिराने के साथ उठावे और हाथ के उठाने पर पैर को
नीचे टिका दे ॥ ४०-४४ ॥
प्रच्छन्नकामिते चैव गतिं भूयो निबोधत ।
विसर्जितजनः स्रस्तस्तथा दूतीसहायवान् ॥ ४५ ॥
निर्वाणदीपो नात्यर्थं भूषणैश्च विभूषितः ।
वेलासद्दशवस्त्रैश्च३ सह दूत्या शनैस्तथा ॥ ४६ ॥
व्रजेत् प्रच्छन्नकामस्तु पादैर्निश्शब्दमन्दगैः ।
शब्दशङ्क्युत्सुकश्च स्यादवलोकनतत्परः ॥ ४७ ॥
वेपमानशरीरश्च शङ्कितः प्रस्खलन्मुहुः ।
अब प्रच्छन्नकामी पात्र की गति बतलाता हूँ। अपने सेवक तथा
सहायकों को लौटा कर यह (रात्रि में) दूती के साथ चले। शून्य मार्ग
दीपक या प्रकाश रहित हो ऐसा समय बतलाना चाहिए। वह शरीर को
अधिक वस्त्रों तथा अलंकारों से न सजाये। यह समयानुसारी वस्त्रों को
धारण करे और दूती के साथ बिना आहट किये धीमें पैरों से (बिना
आवाज किये) चले। (किसी शब्द के या खड़खड़ाहट के होने पर) शंका
तथा कौतूहल से देखते हुए कम्पित शरीर तथा अन्धेरे में ठोकर लगने से
लड़खड़ाते कदमों से चलने का प्रदर्शन करे ॥ ४५-४८ ॥
रौद्ररस में (पात्रों की) गति—
रसे रौद्रे तु वक्ष्यामि दैत्यरक्षोगणान् प्रति ॥ ४८ ॥
एक एव रसस्तेषां स्थायी रौद्रो द्विजोत्तमाः ।
नेपथ्यरौद्रो विज्ञेयस्त्वङ्गरौद्रस्तथैव च ॥ ४९ ॥
तथा स्वभावजश्चैव५ त्रिधा रौद्रः प्रकीर्त्तितः ।
रुधिरक्लिन्नदेहो यो रुधिराद्रर्मुखस्तथा ॥ ५० ॥
तथा पिशितहस्तश्च रौद्रो७ नेपथ्यजस्तु सः ।
बहुबाहुर्बहुमुखो नानाप्रहरणाकुलः ॥ ५१ ॥
स्थूलकायस्तथा प्रांशुरङ्गरौद्रः प्रकीर्तितः ।
रक्ताक्षः पिङ्गकेशश्च असितो विकृतस्वरः ॥ ५२ ॥
१ विसर्जितगतिस्तत्र—क०, विसर्जितजनस्तत्र—ग० । २. दूत—क० ।
३. वस्त्रश्च—ग० । ४. शब्दशक्त्युत्सुकश्च—ग० ।
५. स्वभावतः, स्वभावजश्चेति—क० । ६. प्रकीतितः—ग० ।
७. रौद्रनेपथ्य—क० ।

१३८ नाट्यशास्त्रम्
रूक्षो¹ निर्भर्त्सनपरो रौद्रे² सोऽथ स्वभावजः ।
चतुस्तालान्तरोत्क्षिप्तैः पादैस्त्वन्तरपातितैः ॥ ५३ ॥
गतिरेवं प्रकर्तव्या तेषां ये चापि तद्विधाः ॥ ५४ ॥
अब मैं रौद्ररस में दैत्य तथा राक्षस पात्रों से सम्बन्धित गति को
बतलाता हूँ क्योंकि रौद्ररस इन पात्रों में स्थायी स्वरूप लिए (रहता) है।
रौद्र रस के तीन प्रकार हैं—(१) नेपथ्य रौद्र, (२) अंग रौद्र तथा (३)
स्वभावज रौद्र। नेपथ्य रौद्र का स्वरूप है—रक्त से सना हुआ शरीर (तथा
रक्त से) लाल मुँह रहना और हाथ में मांस के टुकड़ों को लिये
रहना। अंग रौद्र का स्वरूप है—शरीर बड़ा लम्बा होना। स्वभावज रौद्र
का स्वरूप है—शरीर बड़ा लम्बा और ऊँचा, अनेक मुख तथा हाथों वाला,
जिनमें अनेक शस्त्र हों। स्वभावज रौद्र (पात्र-विशेष का) का स्वरूप हैं—
लाल आँखें, पीले बाल, काला रंग, कठोर स्वर, रूखा स्वभाव तथा दूसरों
को डाटते रहने की प्रवृत्ति रखना। रौद्ररस में 'चंडगति' रहती है। इसमें
पैरों को चार चाल के अन्तर से उठाकर मध्य में ही पृथ्वी पर टिका दिया
जाता है। इस प्रकार मैंने यह रौद्र पात्रों की गति बतलाई। इसीके समान
प्रकृतिवाले अन्य पात्रों की भी ऐसी ही गति रखी जाती है ॥ ४८-५४ ॥
बीभत्सरसगति—
अहूर्णा⁴ तु मही यत्र श्मशानरणकश्मला ।
गतिं तत्र प्रयुञ्जीत बीभत्सौभिनयं प्रति ॥ ५५ ॥
क्वचिदासन्नपतितैर्विकृष्टपतितैः क्वचित् ।
एलँकाक्रीडितैः पादैरुपर्युपरि पातितैः ॥ ५६ ॥
तेषामेवानुगेहैस्तैर्बीभत्से गतिरिष्यते ।
बीभत्सरस की गति के लिए ऐसे स्थान की योजना करनी चाहिए जो
श्मशान या रणभूमि होने के कारण भीषण तथा घिनौना हो रहा हो। इस
रस में (पात्र की) 'संकुचित गति' रहती है, जिसमें 'एलकाक्रीडिता' चारी
में पैरों को कभी पास-पास, कभी दूर तथा कभी एक दूसरे पर ( या एक में
१. रूक्षे—ग० । २. रौद्रः सोऽयं स्वभावजः—ख० ।
३. पादैस्त्यन्तरपातितैः—क०, पदैस्त्यन्तरपातितैः—ग० ।
४. आहीर्णा—क० । ५. बीभत्सानुनयं—ग० । ६. एडका—ख०, ग० ।
७. बीभत्सगतिरुच्यते—ख०, बीभत्सा गतिरिष्यते—ग० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १३९
दूसरे को ) रखते हुए गति रहती है तथा हाथों की गति भी पैरों की
गति के अनुसार रखी जाती है ॥ ५४-५७ ॥
वीररसगति :—
अथ वीरे च¹ कर्त्तव्या पाद²विक्षेपसंयुता ॥ ५७ ॥
द्रुत³प्रचाराधिष्ठाना नानाचारीसमाकुला ।
पार्श्वक्रान्तैर्द्रुतै⁴र्विद्धैः सूचीविद्धैस्तथैव च ॥ ५८ ॥
कलौकालगतैः⁵ पादैरावेगे योजयेद्गतिम् ।
वीर रस की गति में पैरों को शीघ्रतापूर्वक उठाकर ( गन्तव्य स्थान
की ओर ) बढ़ाया जाए । ( वीर रस की गति 'गौरवगति' कहलाती है
और यह उत्तम तथा वीर पुरुषों की स्वाभाविक गति मानी जाती है । )
इसमें पात्र की आवेग दशा में पार्श्वक्रान्ता, आविद्धा तथा सूचीचारी में
कला तथा ताल के अनुसार पैरों की उचित गति रखना चाहिए ॥५७-५९॥
उत्तमानामयं प्रायः प्रोक्तो गतिपरिक्रमः ॥ ५९ ॥
मध्यानामधमानाञ्च⁶ गतिं वक्ष्याम्यहं पुनः ।
यह मैंने उत्तम पात्रों की सामान्य गति बतलाई । अब मध्यम तथा
अधम पात्रों की गति बतलाता हूँ ॥ ५९-६० ॥
अद्भुत तथा हास्य रस में गति :—
विस्मये चैव हर्षे च विक्षिप्तपदविक्रमा⁷ ॥ ६० ॥
आसाद्य तु रसं हास्यमेतं⁸च्चान्याश्च योजयेत् ।
विस्मय तथा हर्ष की दशा में पैरों की गति लड़खड़ाती हुई तथा
चारों ओर घूमनेवाली रखना चाहिए। इसी प्रकार हास्य रस में ऐसी ही या
इसी प्रकार की अन्य उचित गति की योजना करनी चाहिए। (हास्यरस की
विक्षिप्ता गति तथा अद्भुत रस की 'आश्चर्यगति' कहलाती है) ॥६०-६१॥
१. प्रकर्त्तव्या—ग० । २. पदविक्षेप—ख०, ग० ।
३. द्रुता प्रहरणाविद्धा—ग० । ४. स्तथाविद्धैः—ग० ।
५. कालाकालागतैः—ख०, ग० । ६. मध्यमानामधमानाञ्च—क०, ख० ।
७. विक्षिप्य पदविक्रमान्—ख०, ग० ।
८. एताञ्चान्याश्च—ख०, ग० ।

१४० : नाट्यशास्त्रम् :
करुण-रस गति :—
पुनश्च करुणे कार्या गतिः स्थितं१पदैरथ ॥ ६१ ॥
बाष्पाम्बु२रुद्धनयनः सन्नगात्रस्तथैव च ।
उत्क्षिप्तपातितकरस्तथा सस्वनं३रोदनः ॥ ६२ ॥
गच्छेत्तथा४ध्यर्धिकया प्रत्यग्राप्रियसंश्रये ।
एषा स्त्रीणां प्रयोक्तव्या नीचसत्वे तथैव च ॥ ६३ ॥
करुण रस में पात्रों के पैरों की गति धीमी१ रखनी चाहिए (अतएव
करुण रस की गति 'शिथिल-गति' कहलाती है)। आँखें आँसुओं से
लबालब, शरीर सुन्न, हाथों को उठाकर फिर ढीला छोड़ देना तथा जोर से
रोना आदि का अभिनय इसमें किया जाता है। यह गति अत्यन्त
अप्रिय घटना (मरण) के समय रखते हैं तथा 'अध्यर्धिका' चारी में
स्थित-लय में डेढ़ कला के अन्तर या विलम्ब से तथा इसी प्रकार धीमी
गति से पैरों को रखते हुए प्रदर्शित करते हैं। इस गति को स्त्री तथा
नीचपात्र में प्रयुक्त करना चाहिए ॥ ६१-६३ ॥
उत्तमानान्तु कर्तव्या स५धैर्या बाष्पसङ्गता ।
निःश्वासैरायतोत्सृष्टै६स्तथैवोर्द्धनिरीक्षितैः ॥ ६४ ॥
न तत्र सौष्ठवङ्कार्यं न प्रमाणन्तथाविधम् ।
(करुण रस की दशा में) उत्तम पात्रों की गति धैर्ययुक्त, आँसुओं के साथ
तथा ऊर्ध्वनिश्वास छोड़ते हुए तथा ऊपर की ओर देखते हुए (ऊर्ध्वनिरीक्षण
युक्त) रखनी चाहिए। इस प्रकार की गति में कला तथा कालगत
१. :—'स्थितपदै' पद का अर्थ है बिलम्बितगति से चरण रखना। 'आश्रयतो-
त्सृष्टै' का अर्थ है दीर्घ या छोड़ी हुई श्वास अर्थात् ऊर्ध्वनिश्वास। यहाँ ऊर्ध्वनिरीक्षण
पद में देवोपालम्भ का संकेत है। 'न प्रमाणं तथा विधम्' का आशय है कि यहाँ
किसी भी शास्त्रीयप्रमाण वाली गति को न रखते हुए केवल स्वच्छन्द चरणपात की
ही योजना पर्याप्त मानी गयी है। आचार्य कोहल का मत है कि यहाँ जम्भटिका
लय का प्रयोग करना चाहिए।
१. स्थिरपदैः—ख० ग० । २. बाष्पाम्बुनद्ध—क० ।
३. सस्वररोदनः—क० ।
४. तथाविद्धकायः प्रत्यग्रगतिसंश्रये—ख०, ग० । ५. सधैर्य—ग० ।
६. रायतोत्कृष्टै—क०, ग० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १४१
किसी भी परिमाण तथा शरीर सौष्ठव के लक्षण ( आदि ) की योजना नहीं
करना चाहिए ॥ ६४-६५ ॥
[ मध्यानामपि सत्वज्ञा गतिर्योज्या विधानतः ]
उरःपाते² हतोत्साहः शोकव्यामूढ³चेतनः ॥ ६५ ॥
नात्युत्क्षिप्तैः पदैर्गच्छेदिष्टबन्धुनिपातने ।
गाढप्रहारे कार्या⁴ च शिथिलाङ्गभुजाश्रया ॥ ६६ ॥
विघूर्णितशरीरा च गतिश्चूर्णपदैरथ ।
[ मध्यम पात्रों की गति भी इसी विधान के अनुसार सत्व या शक्ति
को जानकर रखी जाए ] प्रियजन तथा सम्बन्धि ( इष्ट-बन्धु ) आदि के
निधन हो जाने की दशा में छाती पीटना, उत्साहहीन हो जाना तथा
(अतिशय) शोक के कारण चेतनाहीन हो जाना बतलाया जाता है । इसमें
प्रदर्शित गति में पैरों को बहुत ऊँचे नहीं उठाना चाहिए । चोट लगने तथा
अतिशय घायल होने की दशा में भुजा तथा कन्धों को ढीले, शरीर को
घूमता ( चक्कर खाता ) हुआ रखे । इस दशा में गति 'चूर्णपद' ( थोड़ा
उठाकर पृथ्वी पर टिकाना या ठीक से न रखना) की स्थिति में रखी जाए ॥
शीतार्त पात्र की गति—
शीतेन चाभिभूतस्य वर्षेणाभिद्रुतस्य⁷ च ॥ ६७ ॥
गतिः प्रयोक्तृभिः कार्या स्त्रीनीचप्रकृतावथ ।
पिण्डीकृत्य तु गात्राणि तेषाञ्चैव प्रकम्पनम् ॥ ६८ ॥
करौ वक्षसि निक्षिप्य कुब्जीभूतस्तथैव च ।
दन्तोष्ठस्फुरणञ्चैव चिबुकस्य प्रंकम्पनम्⁹ ॥ ६९ ॥
कार्यं शनैश्च¹⁰ कर्तव्यं शीताभिनयने गतौ ।
जाड़े या वर्षा से अभिभूत स्त्री तथा अधम पात्रों की गति में सारे शरीर
के अवयवों को सिकुड़ाकर उनका धूजना, हाथों को छाती पर ( ढकने के
१. श्लोकार्धमेतत्—ख०, ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
२. नतः पादः हतो—क०, उरः पादगतोत्साहः—ख०, ग० ।
३. शोकव्याकुलचेतसः—क०, शोकव्याकुलचेतनः—ग० ।
४. कार्ये—ग० । ५. शिथिलांस—क० ।
६. स्तूर्णपदैरथ—ख० । ७. णाभिहतस्य च—ग० ।
८. कुञ्चीभूतस्तथैव च—क० । ९. तु कम्पनम्—ग० ।
१०. शनैस्तु गन्तव्यं—ख०, ग० ।

१४२ नाट्यशास्त्रम्
लिए) रखना, शरीर को झुका लेना, दाँत और ओठों का फड़काना, ठुड्डी का
धुजाना धीरे-धीरे कार्य करना आदि प्रदर्शित करना चाहिये । इस शीता-
भिनय की दशा में गति अत्यन्त धीमी (स्थित लय में) रखना चाहिए ॥
भयानक-रस गति—
तथा भयानके चैव गतिः कार्या विचक्षणैः ॥ ७० ॥
स्त्रीणां कापुरुषाणाञ्च ये चान्ये सत्ववर्जिताः ।
विस्फारिते चले नेत्रे विधुतञ्च शिरस्तथा ॥ ७१ ॥
भयसंयुक्तया दृष्ट्या पार्श्वयोश्च ³विलोकितैः ।
द्रुतैश्चूर्णपदैश्चैव बद्ध्वा हस्तं कपोतकम् ॥ ७२ ॥
प्रवेपितशरीरश्च शुष्कोष्ठः स्खलितं व्रजेत् ।
एषानुसरणे कार्या तर्जने त्रासने तथा ॥ ७३ ॥
सत्त्वञ्च विकृतं दृष्ट्वा श्रुत्वा च विकृतं रवम् ।
एषा स्त्रीणां प्रयोक्तव्या ¹⁰नृणामाक्षिप्तविक्रमा ॥ ७४ ॥
क्वचिदासन्नपतितैर्विकृष्टपतितैः क्वचित् ।
एलकाक्रीडितैः पादैरुपर्युपरि पतितैः ॥ ७५ ॥
एषामेवानुगैर्हस्तैर्गति¹¹ भीतेषु योजयेत् ।
भयानकरस में स्त्री तथा ( उन ) अधम पात्रों की—जो डरपोक या
कमजोर (सत्वहीन) हों—प्रकृति के अनुसार सहज गति रखनी चाहिए ।
भयानक रस की दशा में इनके नेत्र खुले तथा धूजते हुए, मस्तक 'विधुत'
(ना० शा० ८।२२) मुद्रा में तथा भययुक्त दृष्टि में क्रमशः बगलों को देखना
प्रदर्शित करना चाहिए । इसमें गति द्रुत तथा 'चूर्णपद' लक्षण की, हाथों
को 'कपोत' मुद्रा में, शरीर को कम्पित तथा ओठों को सूखते हुए रखे
यह 'धैर्यविभासित' गति है जो भयानक रस में संयोजित की जाती है ।
१. विस्फारितचलन्नेत्रो विधून्वन् स्वशिरस्तथा—क० ।
२ भयाकुलितचित्तत्वात् पार्श्वानि च विलोकयन्—क० ।
३.-विलोकनैः—ग० । ४. पूर्णपदैश्चैव—ख० ।
५. कृत्वा—क० । ६. प्रलेपितशरीरस्तु शुष्कोष्ठश्च स्खलन् व्रजेत्—क० ।
७. एषानुकरणे—ख०, ग० । ८. कलहे—क० ।
९. विकृतं स्वरम्—क०, विकृतस्वरम्—ग० ।
१०. नृणाञ्च क्षिप्तविक्रमा—क०, नृणाञ्चावक्षिप्त—ख०, ग० ।
११. गतिर्भीतेषु—क० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १४३
यही गति शत्रु द्वारा पीछा करने, डराने या दुःख देने की स्थिति में
भी प्रदर्शित करना चाहिए। किसी भयंकर प्राणी को देखने या किसी
भयानक आवाज को सुनने की स्थिति में भी इसी गति की योजना
की जाए। तथा डरपोक पुरुष-स्त्री पात्रों में भी इसी गति की संयोजना की
जाए (पर पुरुष पात्र में थोड़ी धैर्य या पराक्रम प्रदर्शन (आक्षत विक्रमा)
की वृत्ति का संमिश्रण रखते हुए उक्त गति रहे।) भयभीत पुरुष की गति
में 'एलकाक्रीडित' चारी (ना० शा० ११।२०) में पैरों को शीघ्रता
से ऊपर रखते हुए या कभी वहीं टिकाकर या एक-दूसरे से बहुत दूर
रखकर तथा हाथों को पैरों की गति के अनुसार रखते हुए रहना
चाहिए ॥ ७०-७६ ॥१
(विविध-पात्र-गति)—
वणिक् तथा मन्त्रिगण की गति—
वणिजां सचिवानाञ्च१ गतिः कार्या स्वभावजा ॥ ७६ ॥
अतिक्रान्तैः पदैर्विप्रा द्वितालान्तरगामिभिः ।
कृत्वा नाभितटे हस्तमुत्तानं३ खटकामुखम् ॥ ७७ ॥
आद्यं चारालमुत्तानं कुर्यात्४ पार्श्वे तथान्तरे ।
न निष्पण्णं न च स्तब्धं नै५ चापि परिवाहितम् ॥ ७८ ॥
कृत्वा गात्रं तथा६ गच्छेत्तेन चैव क्रमेण तु ।
वणिक् तथा सचिव गण की गति उनकी प्रकृति के अनुकूल
रखनी चाहिए (अर्थात् यह मध्यमगति में रहना चाहिए। क्योंकि
ये मध्यमपात्र हैं) इन्हें 'अतिक्रान्ताचारी' में दो ताल के प्रमाणवाली
डग भरना चाहिए। इनका बायाँ हाथ 'कटकामुख' मुद्रा में हथेली
१. ७०-७६ श्लोक के उपरान्त ना० शा० में शान्तरसगति का निरूपण नहीं
है। अभिनव गुप्त के अनुसार (तथा अन्य नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों के अनुसार)
शान्तरस में 'अचंचल या स्थिर गति' रहती है। जिसकी योजना स्थित-प्रज्ञ या
शांत-प्रकृति के योगी जैसे पात्र में रखनी चाहिए।
१. मन्त्रिणाञ्चैव—क०। २. अतिक्रान्तपदैः सा तु—क० ।
३. हस्तमुत्थानं—क०, हस्तं मुक्ताङ्गकटका—ख०, ग० ।
४. कुर्यात् पार्श्वस्तनान्तरे—क०, कुर्यात् पार्श्वं तदन्तरे—क०, ख० ।
५. न ततो—क०; न चैव—ग०। ६. ततो—क० ।

१४४ नाट्यशास्त्रम्
को उठी हुई रखकर नाभि पर रहे तथा दाहिना हाथ 'अराल' मुद्रा में
एक बाजू (पार्श्व) पर रखा जाए। ये अपने शरीर को स्थित, स्तब्ध या
हिलाते हुए न रखें (किन्तु वर्णित गति में ही शरीर को रखें) ॥७६-७८॥
यति, श्रमण (आदि की) गति—
यतीनां श्रमणानाञ्च ये चान्ये तपसि स्थिताः ।
तेषां कार्या गतिर्यै² तु नैष्ठिकं व्रतमास्थिताः ॥ ७९ ॥
अलोलंचक्षुश्च भवेद्युगमात्रनिरीक्षणः⁴ ।
उपस्थितस्मृतिश्चैव गात्रं सर्वं विधाय⁵ च ॥ ८० ॥
अचञ्चलमनाश्चैव यथावल्लिङ्गमाश्रितः ।
विनीतवेषश्च भवेत्काषायवसनस्तथा ॥ ८१ ॥
प्रथमं समपादेन स्थित्वा स्थानेन⁸ वै बुधः ।
हस्तञ्च चतुरङ्कृत्वो तथा चैकम्प्रसारयेत् ॥ ८२ ॥
प्रसन्नं¹¹ वदनं कृत्वा प्रयोगस्य वशानुगम् ।
अनिष्पणेन¹² गात्रेण गतिं गच्छेद्व्यतिक्रमात्¹³ ॥ ८३ ॥
उत्तमानां भवेदेषा लिङ्गिनां ये महाव्रताः ।
एभिरेव विपर्यस्तैर्गुणैरन्येषु योजयेत् ॥ ८४ ॥
तथा¹⁵ व्रतानुगावस्था अन्येषां लिङ्गिनामपि ।
विभ्रान्ता चाप्युदात्ता वा ¹⁶विभ्रान्ता निभृतापि वा ॥ ८५ ॥
शकटास्यस्थितैः पादैरतिक्रान्तैस्तथैव च ।
कार्या पाशुपतानाञ्च ¹⁷गतिरुद्धतगामिनी ॥ ८६ ॥
१. यतिनश्चाश्रमस्था ये—क०, यतीनाञ्चैव सर्वेषां—ख० ।
२. ऋषयस्तपसाञ्चैव—क० । ३. आलोलचक्षुः स्याच्चैव—क० ।
४. निरीक्षणे—क० । ५. नियम्य च—क० ।
६. तथा लिङ्गं समाश्रितः—ग० । ७. कृत्वा—ग० ।
८. स्थानेन नाट्यवित्—क० । ९. चतुरकं कृत्वा—क० ।
१०. प्रयोजनम्—ग० । ११. प्रसन्नवदनं—क० ग० ।
१२. सुनिष्पणेन—क० ।
१३. गच्छेदतिक्रमात्—क०, दतिक्रमान्—ग० । १४. लिङ्गिषु—क० ।
१५. व्रतानुगा च स्यादन्येषां लिङ्गिनां गतिः—ख०, ग० ।
१६. विभ्रान्ता विहृता तथा—क०; विभ्रान्तनिभृतापि वा—ख० ग० ।
१७. रुद्भ्रान्तगामिनी—क०; ग० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १४५
यति, श्रमण, तपस्वी तथा नैष्ठिकब्रह्मचारी जैसे पात्रों की गति में
चतुर अभिनेता नेत्रों को स्थिर (अलोलचक्षु) तथा चार हाथ आगे
(सामने) की भूमि को देखते हुए रखे, वह अपना चित्त स्थिर तथा अपने
पन्थ का स्वरूप या धर्म-चिह्न धारण करे। इसका वेष विनीत तथा भगवां
कपड़े वाला (या अपने सम्प्रदायानुसार पीला, सफेद वस्त्रधारी आदि भी)
रहना चाहिए।
यह ‘समपाद’ चारी तथा समपाद स्थान में स्थित होकर दोनों हाथों
को ‘चतुर’ मुद्रा में रखकर एक को फैला दे। वह अपना मुँह प्रसन्न तथा
प्रयोग के अनुसार रखते हुए स्वाभाविक गति में ‘अतिक्रान्ता’ चारी में चले।
यह गति उत्तम यतियों की तथा महाव्रतचारी या इसी कोटि के
साधुओं आदि की होती है शेष साधुजन जो इनसे गुणों से हीन या विपरीत
लक्षण वाले हों, जो उन्मत्त, शान्त प्रकृति (उदात्त) या दयालु (निभृत)
स्वभाव के हों, या पाशुपतसम्प्रदाय के शैव संन्यासी हों तो उन्हें ‘शकटास्या’
तथा ‘अतिक्रान्ता’ चारी में उद्धत डग भरते हुए रखा जाए ॥ ७९-८६ ॥
(अन्धकार में स्थित या) अन्धे पात्र की गति—
अन्धकारेऽथ याने च गतिः कार्या प्रयोक्तृभिः ।
भूमौ विसर्पितैः पादैर्हस्तैर्मार्गप्रदर्शिभिः ॥ ८७ ॥
अन्धेरे में चलने वाले या अन्धे पात्र की गति पैरों को पृथ्वी पर
रगड़ते हुए तथा हाथों से रास्ता टटोलते हुए रखना चाहिए ॥ ८७ ॥
रथावरोही पात्र की गति—
रथस्थस्यापि कर्तव्या गतिश्चूर्णपदैरथ ।
समपादं तथा स्थानङ्कृत्वा रथगतिं व्रजेत् ॥ ८८ ॥
धनुर्गृहीत्वा चैकेन तथा चैकेन कूबरम् ।
सूतश्चास्य भवेदेवं प्रतोदप्रग्रहाकुलः ॥ ८९ ॥
वाहनानि विचित्राणि कर्तव्यानि विभागशः ।
द्रुतैश्चूर्णपदैश्चैव गन्तव्यं रङ्गमण्डले ॥ ९० ॥
१. अन्धस्येव गतिं कुर्यादन्धकारेषु योगवत्—क०, अन्धयाने च—ग० ।
२. हस्तदर्शितमार्गभिः—क०; हस्तैर्मार्गप्रदर्शितैः—ग० ।
३. चूर्णपदक्रमा—क०, तूर्णपदैरथ—ख० ।
४. धनुरेकेन हस्तेन गृहीत्वान्येन सायकम्—क० ।
५. करणानि विचित्राणि—क० । ६. रङ्गमण्डलम्—क० ।
१० ना० शा० द्वि०

१४६ नाट्यशास्त्रम्
रथ पर आरोहण करने वाले पात्र की गति सामान्य डगों ( चूर्णपद )
द्वारा प्रदर्शित की जाए। वह समपादस्थान के द्वारा ( दोनों पैरों को
समान रूप से पृथ्वी पर टिकाते हुए ) रथ की गति को सूचित करे । वह
एक हाथ में धनुष तथा दूसरे में रथ का डण्डा (कूबर) सम्हाले रहे । ( इसी
प्रकार ) इसका सारथि भी चाबुक तथा लगाम के सम्हालने में व्यस्त रहे ।
इसके वाहन भी रथ की स्थिति के अनुसार विभिन्न प्रकार के स्वरूप वाले
प्रदर्शित किये जाएँ तथा वह द्रुत गति में सामान्य डगों को भरते हुए
रङ्गमञ्च पर प्रवेश करे ॥ ८८-६० ॥
विमानावरोहण गति —
विमानस्थस्य कर्तव्या ह्येषैवं स्यन्दनी गतिः ।
आरोदुमुद्वहेद्गात्रं किञ्चित्स्यादुन्मुखस्थितम् ॥ ९१ ॥
अस्यैव वैपरीत्येन कुर्याच्चाप्यवरोहणम् ।
अधोऽवलोकनैश्चैव मण्डलावर्तनेन च ॥ ९२ ॥
रथ पर चढ़ने की गति का ही विमान पर अधिरोहण करते समय भी
अनुसरण किया जाए जिसमें केवल शरीर ऊपर की ओर रखते हुए स्थित रहे
तथा अवतरण (आकाश से नीचे उतरने) की दशा में अधिरोहण के विरुद्ध
कार्यों का प्रदर्शन करे ( अर्थात् शरीर को झुकाकर नीचा मुँह किये रहे ) ॥
आकाश गति—
आकाशगमने चैव कर्तव्यो नाट्ययोक्तृभिः ।
स्थानेन समपादेन तथा चूर्णपदैरपि ॥ ९३ ॥
व्योम्नश्चावतरेद्यस्तु तस्यैतां कारयेद्गतिम् ।
ऋज्वायतोन्नततनैः कुटिलावर्तितैरथ ॥ ९४ ॥
१. समपाद-स्थान में दोनों पैर पृथ्वी पर टिकाकर रथ के मार्ग पर
या रथ से चलने का अभिनय किया जाता है परन्तु कथकलि में एक पैर को
पृथ्वी पर टिका कर ही रथस्थ रथी का अभिनय करने की परम्परा है । (सम्पा०)
१. गती रथगतोपमा—क० ।
२. स्यादुन्मुखस्तथा—क०, उन्मुखस्थितः—ख० ।
३. अधोऽवलोकनेनैव—क० ।
४. कर्त्तव्यं गतिचेष्टितम्—क० । ५. पदैरथ—क० ।
६. स्तंववतरेद्यस्तु—क० । ७. रुद्धायतोन्नुतननै—ख० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १४७
आकाश-गमन — आकाशगामी पात्र की गति आकाशिकी चारियों के
प्रभूत प्रदर्शन (मण्डलावर्तन) तथा ऊँचा मुँह कर देखने के द्वारा प्रदर्शित
करे और (इसके अतिरिक्त) यह समपादस्थान में साधारण डग (चूर्णपद)
भरते हुए हो। आकाश से अवतरण करने वाले पात्र की भी इसी प्रकार
'गति' रहना चाहिए। ऐसी गति सीधे या लम्बे, ऊँचे, नीचे या तिरछे
(अव्यवस्थित) घूमते हुए डगों को भरते हुए प्रदर्शित करना चाहिए ॥
१भ्रश्यतश्च तथाकाशादपविद्ध२र्भुजा गतिः ।
विकीर्ण३वसना चैव तथा भूगतलोचना ॥ ९५ ॥
आकाशावतरण — आकाश से गिरते हुए पात्र की गति में भुजाओं को
झूले के समान डोलते हुए (अपविद्ध भुज) कपड़ों के छोर इधर-उधर
बिखराते हुए तथा दृष्टि पृथ्वी की ओर नीची रहनी चाहिएँ ॥ ९५ ॥
उन्नतप्रदेशारोहण गति —
प्रासा४दद्रुम-शैलेषु नदीनिम्नोन्नतेषु च ।
आरोहणावतरणं कार्यमर्थ५वशात्तथा ॥ ९६ ॥
प्रासादारोहणं कार्यमतिक्रान्तैः पदैरथ ।
उद्वाह्य गात्रं पादञ्च६ न्यसेत्सोपानपङ्क्तिषु ॥ ९७ ॥
७तथावतरणञ्चैव गात्रमस्यैव८ कारयेत् ।
९अतिक्रान्तेन पादेन द्वितीयेनाञ्चितेन च ॥ ९८ ॥
(नाटक में पात्रों के) प्रासाद, वृक्ष या पर्वत (अथवा किसी ऊँचे
स्थान) पर चढ़ने की या उनसे उतरने की तथा नदी, गढ़ तथा टीलों
पर से (ऊँचे-नीचे प्रदेशों पर से) चढ़ने-उतरने की आवश्यकता
१. दिव्यपात्र का पृथ्वी पर अवतरण होने पर उक्त पात्र की गति
आकाशमार्ग से विमान द्वारा या किसी दूसरे विचित्र प्रकार द्वारा भी बतलाना
चाहिए। क्योंकि ऐसे पात्रों की सभी खण्डों में स्वेच्छानुसार गति रहती है।
१. भ्रममाणस्य — क० । २. दपरुद्धभुजा गतिः — क० ।
३. वदना — क० । ४. द्रुमप्रासाद — क० ।
५. मर्थवशाद् बुधैः — क०, ख० ।
६. सोपानं निक्षिपेद् बुधः — क०, सोपाने निक्षिपेत्ररः — ग० ।
७. वतरणे चैव — क० । ८. गात्रमानम्य रेचयेत् — क०; ग० ।
९. पद्यार्धमेतत् — ख० पुस्तके प्रक्षिप्तम् ।

१४८ नाट्यशास्त्रम्
( कथावस्तु के कारण ) रहती है । प्रासाद पर चढ़ने ( के अभिनय ) में
'अतिक्रान्ता' चारी के पैरों द्वारा शरीर को उपर उठाते हुए सीढ़ी पर चढ़े
तथा प्रासाद से उतरने ( की दशा में ) में शरीर को थोड़ा झुकाते हुए एक
पैर को 'अतिक्रान्ता' चारी तथा दूसरे को 'अंचित' गति में रखते हुए
चलना चाहिए ॥ ९६-९८ ॥
प्रासादारोहणं यत्तु तदेवाद्रिषु कारयेत् ।
केवलं तच्चै² निक्षेपमङ्घ्रिपक्ष्णं भवेदथ ॥ ९९ ॥
द्रुमे चारोहणङ्कार्यमतिक्रान्तोत्थितैः³ पदैः ।
सूचीविद्धैरपक्रान्तैः पार्श्वक्रान्तैस्तथैव च ॥ १०० ॥
मैंने प्रासादारोहण में जिस 'गति' का प्रदर्शन बतलाया पर्वतारोहण में
भी वही गति रखे, केवल पर्वतारोहण की दशा में पैर के पंजों पर अंग को
ऊपर उठाए रखना ( पाठान्तर से अर्थ—मस्तक को ऊपर-नीचे उठाकर
तथा हाथ का सहारा पैर को देते हुए रखना ) चाहिए। वृक्ष पर चढ़

त्रयोदशोऽध्यायः १४९
(के अभिनय) में पानी की गहराई के अनुसार तैरने की गति रखना
चाहिए। यदि उथला (थोड़ा) जल हो तो कपड़ों को उठाते हुए तथा गहरा
होने पर शरीर को झुकाकर हाथों को हिलाते हुए (जिससे पानी काटने
का भाव या तैरने की क्रिया की अभिव्यक्ति हो) अभिनय करना चाहिए।
(तैरने का अभिनय करते समय हाथों को 'पताक' या सर्पशीर्ष मुद्रा में
रखना चाहिए) ॥ १०१-१०३ ॥
प्रसार्य बाहुमेकैकं मुहुर्वारिविकर्षणैः ॥ १०३ ॥
तिर्यक्प्रसारिता चैव ह्रियमाणा च वारिणा ।
अशोषाङ्गाकुलापूरे¹वदना गतिरिष्यते ॥ १०४ ॥
यदि नदी के बहाव को पार करने का अभिनय करना हो तो हाथों
को फैलाकर बार-बार पानी को काटने, थपथपाने तिरछा होकर हाथों
को फैलाते हुए सम्पूर्ण शरीर को तैरने में लगे हुए और मुँह को पानी भर
जाने के कारण बन्द रखते (या हिलाते हुए—पाठान्तर से अर्थ) हुए
बतलाना चाहिए ॥ १०३-१०४ ॥
नौका-यात्रा में गति—
नौस्थस्यापि प्रयोक्तव्या द्रुतै²श्चूर्णपदैर्गतिः ।
अनेनैव विधानेन कर्तव्यं गतिचेष्टितम् ॥ १०५ ॥
संज्ञामात्रेण कर्त्तव्यान्येतानि विधिपूर्वकम् ।
³कस्मान्मृत इति प्रोक्ते किं मर्तव्यं प्रयोक्तृभिः ॥ १०६ ॥
अङ्कुशग्रहणाच्चाङ्गं खलीन⁵ग्रहणाद्धयम् ।
प्रग्रह⁴ग्रहणाच्चानमेवमेवापरेष्वपि ॥ १०७ ॥
नौका से यात्रा करने वाले पात्र की गति शीघ्रतापूर्वक डग भरते
हुए (द्रुतैः चूर्णपदैः) बतलाना चाहिए। इसी प्रकार विभिन्न गति तथा
क्रियाओं को प्रदर्शित करना चाहिए। ये सभी कार्य निर्दिष्ट लक्षणानुसार
इंगितों से प्रदर्शित करे। (क्योंकि ये कार्य यथार्थ में तो रहते नहीं केवल
अनुकरण भर रहता है) जैसे किसी पात्र का मरण प्रदर्शित करने पर
अभिनेता नहीं मरता (केवल मरने का अभिनय करता है।) यह
१. कुलाधूतवदना—क०।
२. द्रुतैस्तूर्णैः पदै—क०, गतिश्चूर्णपदैर्गतैः—ग०।
३. तस्मान्मृत—क०, ग०। ४. प्रग्रहग्रहणाद् रथम्—क०।
५. खलीनग्रहणादश्वम्—क०।

१५० नाट्यशास्त्रम्
उसी प्रकार सूचित हो जाता है जैसे अंकुश के हाथ में लेने पर हाथी
की, पावड़ी लगाने पर घोड़े की तथा रास लेने पर रथ की अभिव्यक्ति
होती है । ( अतएव नौका गमन अनुकरणात्मक क्रियाओं के द्वारा
अभिनीत किया१ जाए ) ॥ १०५-१०७ ॥
अश्वाधिरोहण-गति—
अश्वयाने गतिः कार्या वैशाखस्थानकेन तु ।
तथा१ चूर्णपदैश्चित्रैरुपर्युपरि-पातितैः ॥ १०८ ॥
घुड़सवारी या घोड़े पर चढ़ते हुए पात्र की गति वैशाखस्थान तथा
शीघ्रता से उठाई जाने वाली डगों ( चूर्णपदैः ) द्वारा प्रदर्शित
की जाए ॥ १०८ ॥
सर्पगति—
पन्नगानां गतिः कार्या पादैः स्वस्तिकैः२संयुतैः ।
पार्श्वक्रान्तं पदं कृत्वा३ स्वस्तिकं रेचयेदिह४ ॥ १०९ ॥
सर्पों की गति ‘स्वस्तिक’ पदों के द्वारा की जाए जिसमें पहिले
पार्श्वक्रान्ता चारी को प्रदर्शित कर फिर स्वस्तिक पदों के रेचक द्वारा
अभिनय प्रस्तुत नाट्यधर्मिता के द्वारा करना चाहिए ॥ १०९ ॥
१ नौकाभिनय के इस भाग से यह स्पष्ट हो जाता है कि सादे रंगमंच पर
कई कार्य तथा दृश्य शारीरिक अनुकरण पर ही प्रदर्शित किये जाते थे । तदनुसारी
दृश्यों से चित्रित पर्दों आदि से सुसज्जित मंच पर नहीं । आचार्य अभिनवगुप्ता-
चार्य ने चित्रपट (दृश्याङ्कित पर्दों) के बिना भी उक्त अभिनय के प्रदर्शन करने की
सहमति प्रदर्शित की है तथा चित्रपट द्वारा बतलाने का उल्लेख भी किया है ।
‘तेन चित्रपटादिवियोगेऽपि रथगमनाद्यभिनयं नायुक्तम् । सौकर्यात् तु तत्क-
रणमपि भवतीति भावः’ ॥
( अभि० Vol. II, पृ० १५४ )
१. इच्चैव—क०, तथा तूर्णंपादैश्चित्तै—ख० ।
२. संस्थितैः—क०; संज्ञितैः—ख० ।
३. पार्श्वक्रान्तक्रमं कृत्वा स्वस्तिकं योजयेत्तथा—क० ।
४ कुर्यात्—क० ।