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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

त्रयोदशोऽध्यायः १३७
पैर को हाथ के गिराने के साथ उठावे और हाथ के उठाने पर पैर को
नीचे टिका दे ॥ ४०-४४ ॥
प्रच्छन्नकामिते चैव गतिं भूयो निबोधत ।
विसर्जितजनः स्रस्तस्तथा दूतीसहायवान् ॥ ४५ ॥
निर्वाणदीपो नात्यर्थं भूषणैश्च विभूषितः ।
वेलासद्दशवस्त्रैश्च३ सह दूत्या शनैस्तथा ॥ ४६ ॥
व्रजेत् प्रच्छन्नकामस्तु पादैर्निश्शब्दमन्दगैः ।
शब्दशङ्क्युत्सुकश्च स्यादवलोकनतत्परः ॥ ४७ ॥
वेपमानशरीरश्च शङ्कितः प्रस्खलन्मुहुः ।
अब प्रच्छन्नकामी पात्र की गति बतलाता हूँ। अपने सेवक तथा
सहायकों को लौटा कर यह (रात्रि में) दूती के साथ चले। शून्य मार्ग
दीपक या प्रकाश रहित हो ऐसा समय बतलाना चाहिए। वह शरीर को
अधिक वस्त्रों तथा अलंकारों से न सजाये। यह समयानुसारी वस्त्रों को
धारण करे और दूती के साथ बिना आहट किये धीमें पैरों से (बिना
आवाज किये) चले। (किसी शब्द के या खड़खड़ाहट के होने पर) शंका
तथा कौतूहल से देखते हुए कम्पित शरीर तथा अन्धेरे में ठोकर लगने से
लड़खड़ाते कदमों से चलने का प्रदर्शन करे ॥ ४५-४८ ॥
रौद्ररस में (पात्रों की) गति—
रसे रौद्रे तु वक्ष्यामि दैत्यरक्षोगणान् प्रति ॥ ४८ ॥
एक एव रसस्तेषां स्थायी रौद्रो द्विजोत्तमाः ।
नेपथ्यरौद्रो विज्ञेयस्त्वङ्गरौद्रस्तथैव च ॥ ४९ ॥
तथा स्वभावजश्चैव५ त्रिधा रौद्रः प्रकीर्त्तितः ।
रुधिरक्लिन्नदेहो यो रुधिराद्रर्मुखस्तथा ॥ ५० ॥
तथा पिशितहस्तश्च रौद्रो७ नेपथ्यजस्तु सः ।
बहुबाहुर्बहुमुखो नानाप्रहरणाकुलः ॥ ५१ ॥
स्थूलकायस्तथा प्रांशुरङ्गरौद्रः प्रकीर्तितः ।
रक्ताक्षः पिङ्गकेशश्च असितो विकृतस्वरः ॥ ५२ ॥
१ विसर्जितगतिस्तत्र—क०, विसर्जितजनस्तत्र—ग० । २. दूत—क० ।
३. वस्त्रश्च—ग० । ४. शब्दशक्त्युत्सुकश्च—ग० ।
५. स्वभावतः, स्वभावजश्चेति—क० । ६. प्रकीतितः—ग० ।
७. रौद्रनेपथ्य—क० ।