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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 668 में से

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पृष्ठ 252

त्रयोदशोऽध्यायः १४१
किसी भी परिमाण तथा शरीर सौष्ठव के लक्षण ( आदि ) की योजना नहीं
करना चाहिए ॥ ६४-६५ ॥
[ मध्यानामपि सत्वज्ञा गतिर्योज्या विधानतः ]
उरःपाते² हतोत्साहः शोकव्यामूढ³चेतनः ॥ ६५ ॥
नात्युत्क्षिप्तैः पदैर्गच्छेदिष्टबन्धुनिपातने ।
गाढप्रहारे कार्या⁴ च शिथिलाङ्गभुजाश्रया ॥ ६६ ॥
विघूर्णितशरीरा च गतिश्चूर्णपदैरथ ।
[ मध्यम पात्रों की गति भी इसी विधान के अनुसार सत्व या शक्ति
को जानकर रखी जाए ] प्रियजन तथा सम्बन्धि ( इष्ट-बन्धु ) आदि के
निधन हो जाने की दशा में छाती पीटना, उत्साहहीन हो जाना तथा
(अतिशय) शोक के कारण चेतनाहीन हो जाना बतलाया जाता है । इसमें
प्रदर्शित गति में पैरों को बहुत ऊँचे नहीं उठाना चाहिए । चोट लगने तथा
अतिशय घायल होने की दशा में भुजा तथा कन्धों को ढीले, शरीर को
घूमता ( चक्कर खाता ) हुआ रखे । इस दशा में गति 'चूर्णपद' ( थोड़ा
उठाकर पृथ्वी पर टिकाना या ठीक से न रखना) की स्थिति में रखी जाए ॥
शीतार्त पात्र की गति—
शीतेन चाभिभूतस्य वर्षेणाभिद्रुतस्य⁷ च ॥ ६७ ॥
गतिः प्रयोक्तृभिः कार्या स्त्रीनीचप्रकृतावथ ।
पिण्डीकृत्य तु गात्राणि तेषाञ्चैव प्रकम्पनम् ॥ ६८ ॥
करौ वक्षसि निक्षिप्य कुब्जीभूतस्तथैव च ।
दन्तोष्ठस्फुरणञ्चैव चिबुकस्य प्रंकम्पनम्⁹ ॥ ६९ ॥
कार्यं शनैश्च¹⁰ कर्तव्यं शीताभिनयने गतौ ।
जाड़े या वर्षा से अभिभूत स्त्री तथा अधम पात्रों की गति में सारे शरीर
के अवयवों को सिकुड़ाकर उनका धूजना, हाथों को छाती पर ( ढकने के
१. श्लोकार्धमेतत्—ख०, ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
२. नतः पादः हतो—क०, उरः पादगतोत्साहः—ख०, ग० ।
३. शोकव्याकुलचेतसः—क०, शोकव्याकुलचेतनः—ग० ।
४. कार्ये—ग० । ५. शिथिलांस—क० ।
६. स्तूर्णपदैरथ—ख० । ७. णाभिहतस्य च—ग० ।
८. कुञ्चीभूतस्तथैव च—क० । ९. तु कम्पनम्—ग० ।
१०. शनैस्तु गन्तव्यं—ख०, ग० ।