नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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शृङ्गार रस में गति :-
१दूतीदर्शितमार्गस्तु प्रविशेदङ्गमण्डलम् ।
सूच्या२ चाप्यभिनयं कुर्यादर्थसमाश्रयम् ॥ ४१ ॥
३हद्यैर्वस्त्रैस्तथा गन्धैर्धूपैश्चूर्णैश्च भूषितः ।
नानापुष्पसुगन्धाभिर्मालाभिः समलङ्कृतः ॥ ४२ ॥
गच्छेत् सललितैः पादैरतिक्रान्तस्थितैस्तथा ।
तथा सौष्ठवसंयुक्तैर्लयतालवशानुगैः ॥ ४३ ॥
पादयोर्नुगौ चापि हस्तौ कार्यौ प्रयोक्तृभिः ।
७उत्क्षिप्य हस्तं पातेन पादयोश्च विपर्ययात् ॥ ४४ ॥
शृङ्गार रस की दशा में प्रकट रूपवाले या अप्रच्छन्न कामासक्त पात्र
(स्वस्थकामित) की गति ललित रखना चाहिए। शृंगारी पात्र दूती के
द्वारा बतलाए मार्ग से रंग-मंच पर प्रवेश करे। वह सूचाभिनय१ के द्वारा
अपने आन्तरिक भावों को प्रकट करें। यह सुन्दर वस्त्रालंकारों से सुसज्जित
सुगन्धित गन्ध, धूप तथा चूर्ण से भूषित तथा विभिन्न एवं मधुर गन्धवाली
पुष्प मालाएं धारण किये हो, यह ललित गति से 'अतिक्रान्ता' चारी में
चले, (शरीर के) सभी अवयव 'सौष्ठव' युक्त हो तथा इसकी चाल लय-ताल
के अनुसार हो। पैरों की गति का हाथों द्वारा अनुसरण होना चाहिए व
१. सूच्चाभिनय के लक्षण के लिये देखिये : ना० शा० सामान्याभिनयाध्याय
का निम्न श्लोक ।
'वाक्यार्थावाक्यं वा, सत्त्वाङ्गैः सूच्यते यदा पूर्वम् ।
पश्चाद् वाक्याभिनयः, सूचेत्यभिसंज्ञिता सा तु ॥' (अ० २४।४४ )
अर्थात् जब किसी वाक्य के भाव की किसी वाक्य के आरम्भ में चेष्टाओं के
द्वारा अभिव्यक्ति हो तथा बाद में उसे वाचिक अभिनय या कथोपकथन के द्वारा
प्रस्तुत किया जाए तो ऐसी नाट्यविधा 'सूचा' कहलाती है ।
१. दर्शनमार्गस्तु—क०, दर्शनमार्गेण—ग०।
२. सूच्या चाभिगमनं-क०, सूचयन्वाभिनयं-ख०, सूचयन्चाप्यभिनयं-ग० !
३. हृद्यैर्गन्धैस्तथा वस्त्रैरलङ्कारैश्च भूषितः—ग०।
४. रतिक्रान्तोत्थितैस्तथा—ग०। ५. तालसमन्वितैः—ग०।
६. पादयो र्नुगौ हस्तौ नित्यौ कार्यौ प्रयोक्तृभिः—ग०।
७. उत्क्षिप्तः सहपादेन पतनेन विपर्ययः—ग०।