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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 249

१३८ नाट्यशास्त्रम्
रूक्षो¹ निर्भर्त्सनपरो रौद्रे² सोऽथ स्वभावजः ।
चतुस्तालान्तरोत्क्षिप्तैः पादैस्त्वन्तरपातितैः ॥ ५३ ॥
गतिरेवं प्रकर्तव्या तेषां ये चापि तद्विधाः ॥ ५४ ॥
अब मैं रौद्ररस में दैत्य तथा राक्षस पात्रों से सम्बन्धित गति को
बतलाता हूँ क्योंकि रौद्ररस इन पात्रों में स्थायी स्वरूप लिए (रहता) है।
रौद्र रस के तीन प्रकार हैं—(१) नेपथ्य रौद्र, (२) अंग रौद्र तथा (३)
स्वभावज रौद्र। नेपथ्य रौद्र का स्वरूप है—रक्त से सना हुआ शरीर (तथा
रक्त से) लाल मुँह रहना और हाथ में मांस के टुकड़ों को लिये
रहना। अंग रौद्र का स्वरूप है—शरीर बड़ा लम्बा होना। स्वभावज रौद्र
का स्वरूप है—शरीर बड़ा लम्बा और ऊँचा, अनेक मुख तथा हाथों वाला,
जिनमें अनेक शस्त्र हों। स्वभावज रौद्र (पात्र-विशेष का) का स्वरूप हैं—
लाल आँखें, पीले बाल, काला रंग, कठोर स्वर, रूखा स्वभाव तथा दूसरों
को डाटते रहने की प्रवृत्ति रखना। रौद्ररस में 'चंडगति' रहती है। इसमें
पैरों को चार चाल के अन्तर से उठाकर मध्य में ही पृथ्वी पर टिका दिया
जाता है। इस प्रकार मैंने यह रौद्र पात्रों की गति बतलाई। इसीके समान
प्रकृतिवाले अन्य पात्रों की भी ऐसी ही गति रखी जाती है ॥ ४८-५४ ॥
बीभत्सरसगति—
अहूर्णा⁴ तु मही यत्र श्मशानरणकश्मला ।
गतिं तत्र प्रयुञ्जीत बीभत्सौभिनयं प्रति ॥ ५५ ॥
क्वचिदासन्नपतितैर्विकृष्टपतितैः क्वचित् ।
एलँकाक्रीडितैः पादैरुपर्युपरि पातितैः ॥ ५६ ॥
तेषामेवानुगेहैस्तैर्बीभत्से गतिरिष्यते ।
बीभत्सरस की गति के लिए ऐसे स्थान की योजना करनी चाहिए जो
श्मशान या रणभूमि होने के कारण भीषण तथा घिनौना हो रहा हो। इस
रस में (पात्र की) 'संकुचित गति' रहती है, जिसमें 'एलकाक्रीडिता' चारी
में पैरों को कभी पास-पास, कभी दूर तथा कभी एक दूसरे पर ( या एक में
१. रूक्षे—ग० । २. रौद्रः सोऽयं स्वभावजः—ख० ।
३. पादैस्त्यन्तरपातितैः—क०, पदैस्त्यन्तरपातितैः—ग० ।
४. आहीर्णा—क० । ५. बीभत्सानुनयं—ग० । ६. एडका—ख०, ग० ।
७. बीभत्सगतिरुच्यते—ख०, बीभत्सा गतिरिष्यते—ग० ।