नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः १३९
दूसरे को ) रखते हुए गति रहती है तथा हाथों की गति भी पैरों की
गति के अनुसार रखी जाती है ॥ ५४-५७ ॥
वीररसगति :—
अथ वीरे च¹ कर्त्तव्या पाद²विक्षेपसंयुता ॥ ५७ ॥
द्रुत³प्रचाराधिष्ठाना नानाचारीसमाकुला ।
पार्श्वक्रान्तैर्द्रुतै⁴र्विद्धैः सूचीविद्धैस्तथैव च ॥ ५८ ॥
कलौकालगतैः⁵ पादैरावेगे योजयेद्गतिम् ।
वीर रस की गति में पैरों को शीघ्रतापूर्वक उठाकर ( गन्तव्य स्थान
की ओर ) बढ़ाया जाए । ( वीर रस की गति 'गौरवगति' कहलाती है
और यह उत्तम तथा वीर पुरुषों की स्वाभाविक गति मानी जाती है । )
इसमें पात्र की आवेग दशा में पार्श्वक्रान्ता, आविद्धा तथा सूचीचारी में
कला तथा ताल के अनुसार पैरों की उचित गति रखना चाहिए ॥५७-५९॥
उत्तमानामयं प्रायः प्रोक्तो गतिपरिक्रमः ॥ ५९ ॥
मध्यानामधमानाञ्च⁶ गतिं वक्ष्याम्यहं पुनः ।
यह मैंने उत्तम पात्रों की सामान्य गति बतलाई । अब मध्यम तथा
अधम पात्रों की गति बतलाता हूँ ॥ ५९-६० ॥
अद्भुत तथा हास्य रस में गति :—
विस्मये चैव हर्षे च विक्षिप्तपदविक्रमा⁷ ॥ ६० ॥
आसाद्य तु रसं हास्यमेतं⁸च्चान्याश्च योजयेत् ।
विस्मय तथा हर्ष की दशा में पैरों की गति लड़खड़ाती हुई तथा
चारों ओर घूमनेवाली रखना चाहिए। इसी प्रकार हास्य रस में ऐसी ही या
इसी प्रकार की अन्य उचित गति की योजना करनी चाहिए। (हास्यरस की
विक्षिप्ता गति तथा अद्भुत रस की 'आश्चर्यगति' कहलाती है) ॥६०-६१॥
१. प्रकर्त्तव्या—ग० । २. पदविक्षेप—ख०, ग० ।
३. द्रुता प्रहरणाविद्धा—ग० । ४. स्तथाविद्धैः—ग० ।
५. कालाकालागतैः—ख०, ग० । ६. मध्यमानामधमानाञ्च—क०, ख० ।
७. विक्षिप्य पदविक्रमान्—ख०, ग० ।
८. एताञ्चान्याश्च—ख०, ग० ।