सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 251

१४० : नाट्यशास्त्रम् :
करुण-रस गति :—
पुनश्च करुणे कार्या गतिः स्थितं१पदैरथ ॥ ६१ ॥
बाष्पाम्बु२रुद्धनयनः सन्नगात्रस्तथैव च ।
उत्क्षिप्तपातितकरस्तथा सस्वनं३रोदनः ॥ ६२ ॥
गच्छेत्तथा४ध्यर्धिकया प्रत्यग्राप्रियसंश्रये ।
एषा स्त्रीणां प्रयोक्तव्या नीचसत्वे तथैव च ॥ ६३ ॥
करुण रस में पात्रों के पैरों की गति धीमी१ रखनी चाहिए (अतएव
करुण रस की गति 'शिथिल-गति' कहलाती है)। आँखें आँसुओं से
लबालब, शरीर सुन्न, हाथों को उठाकर फिर ढीला छोड़ देना तथा जोर से
रोना आदि का अभिनय इसमें किया जाता है। यह गति अत्यन्त
अप्रिय घटना (मरण) के समय रखते हैं तथा 'अध्यर्धिका' चारी में
स्थित-लय में डेढ़ कला के अन्तर या विलम्ब से तथा इसी प्रकार धीमी
गति से पैरों को रखते हुए प्रदर्शित करते हैं। इस गति को स्त्री तथा
नीचपात्र में प्रयुक्त करना चाहिए ॥ ६१-६३ ॥
उत्तमानान्तु कर्तव्या स५धैर्या बाष्पसङ्गता ।
निःश्वासैरायतोत्सृष्टै६स्तथैवोर्द्धनिरीक्षितैः ॥ ६४ ॥
न तत्र सौष्ठवङ्कार्यं न प्रमाणन्तथाविधम् ।
(करुण रस की दशा में) उत्तम पात्रों की गति धैर्ययुक्त, आँसुओं के साथ
तथा ऊर्ध्वनिश्वास छोड़ते हुए तथा ऊपर की ओर देखते हुए (ऊर्ध्वनिरीक्षण
युक्त) रखनी चाहिए। इस प्रकार की गति में कला तथा कालगत
१. :—'स्थितपदै' पद का अर्थ है बिलम्बितगति से चरण रखना। 'आश्रयतो-
त्सृष्टै' का अर्थ है दीर्घ या छोड़ी हुई श्वास अर्थात् ऊर्ध्वनिश्वास। यहाँ ऊर्ध्वनिरीक्षण
पद में देवोपालम्भ का संकेत है। 'न प्रमाणं तथा विधम्' का आशय है कि यहाँ
किसी भी शास्त्रीयप्रमाण वाली गति को न रखते हुए केवल स्वच्छन्द चरणपात की
ही योजना पर्याप्त मानी गयी है। आचार्य कोहल का मत है कि यहाँ जम्भटिका
लय का प्रयोग करना चाहिए।
१. स्थिरपदैः—ख० ग० । २. बाष्पाम्बुनद्ध—क० ।
३. सस्वररोदनः—क० ।
४. तथाविद्धकायः प्रत्यग्रगतिसंश्रये—ख०, ग० । ५. सधैर्य—ग० ।
६. रायतोत्कृष्टै—क०, ग० ।