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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 668 में से

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पृष्ठ 244

त्रयोदशोऽध्यायः १४३
देवांशाजास्तु १ राजानो वेदाध्यात्मसु २ कीर्तिताः ।
एवं देवानुकरणे ३ दोषो ह्यत्र ४ न विद्यते ॥ २८ ॥
ऋषियों ने भरतमुनि से पूछा कि राजा के मनुष्य पात्र के रूप में रहने
पर उसकी दिव्य—पात्रों जैसी गति क्यों रखी जाती है ? उत्तर—राजाओं
की देवगण के समान गति रखने में क्या अड़चन है ? क्योंकि रूपकों में,
दिव्यमानुष तथा मानुष-पात्र होते हैं। इनमें देवताओं की दिव्य, राजाओं
की दिव्यमानुष तथा शेष लोक सुलभ ( प्रसिद्ध ) पात्रों की मानुषी-प्रकृति
मानी गई है। वेद तथा वेदान्त-( अध्यात्म ) शास्त्र में राजा को देवों के
अंश से उत्पन्न माना गया है; इसलिए 'राजा' की दिव्यपात्र जैसी गति
रखने में कोई हानि नहीं समझना चाहिए ॥ २५-२८ ॥
अयं विधिस्तु कर्त्तव्यः ५ स्वच्छन्दगमनं प्रति ।
सम्भ्रमोत्पातरोषेषु प्रमाणं न विधीयते ॥ २९ ॥
यह विधान साधारण ( सामान्य ) गति के लिए हैं। आवेग, उत्पात
तथा क्रोध की दशा में (पात्रों की) गति के कोई नियम नहीं रहते हैं ॥२९॥
विशेष अवस्थाओं में पात्रों की गति—
सर्वासां प्रकृतीनान्तु अवस्थान्तरसंज्ञया ।
उत्तमाधममध्यानां ६ गतिः कार्या प्रयोक्तृभिः ॥ ३० ॥
( किन्तु ) नाट्य विधायक जन सभी पात्रों की—जो कि उत्तम, मध्यम
तथा अधम प्रकृति के हों उनकी अवस्थाओं को देखकर तदनुसार 'गति'
को रखें ॥ ३० ॥
चतुरर्द्धकलं ७ वा स्यात्तदर्धकलमेव च ।
अवस्थान्तर ८ मासाद्य कुर्याद्गतिविचेष्टितम् ॥ ३१ ॥
विशेष अवस्था में इन उत्तमादि पात्रों की गति का समय चार कलाओं
का, उसका आधा (दो कला) तथा उसके अर्धभाग का आधा ( एक कला )
रखना चाहिए ॥ ३१ ॥
१. देवाम्बजास्तु—ख०, ग० । २. वेदाध्यात्मप्रकीर्तिताः—ग० ।
३. देवानुसरणे—क० । ४. देवो—ख० ।
५. विधेयः—क० । ६. मध्योत्तमाधमानाञ्च—ग० ।
७. चतुर्थेककलं चा—क०, चतुरर्धकलंञ्च—ख० । ८. अथवान्तर—क० ।