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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 245

१३४ नाट्यशास्त्रम्
ज्येष्ठे चतुष्कलं यत्र मध्यमे द्विकलं भवेत् ।
द्विकला चोत्तमे यत्र मध्ये त्वेककला भवेत् ॥ ३२ ॥
( विभिन्न पात्रों से सम्बद्ध उनके समय तथा गतियों की विशिष्ट
अवस्थाओं में ) उत्तम पात्र की गति चार कला के प्रमाणवाली, मध्यम पात्र
की दो कला की गति तथा अधम पात्र की गति एक कला की
होती है परन्तु जब उत्तमपात्र की दो कला की हो तो मध्यमपात्र की एक
कला के प्रमाण की गति रखना चाहिए ॥ ३२ ॥
कँलिकं मध्यमे यत्र नीचेष्वर्द्धकलं भवेत् ।
एवमर्द्धार्द्धहीनन्तु कलानां सम्प्रयोजयेत् ॥ ३३ ॥
तथा जब मध्यम पात्र की एक कला की गति हो तो अधम पात्र की
आधी कला की रहती है। इस प्रकार विशेष अवस्थाओं में कला का
परिमाण आधा-आधा कर दिया जाता है ॥ ३३ ॥
उत्तमानां गतिर्या तु न तां मध्येषु योजयेत् ।
मध्यमानां गतिर्या तु न तां नीचेषु योजयेत् ॥ ३४ ॥
उत्तम पात्रों की गति की मध्यम पात्र तथा मध्यम पात्र की गति की
अधम पात्र में योजना नहीं करना चाहिए ॥ ३४ ॥
( विशेष दशा में ) गतियों का लय-विधान—
त्वरार्त्ते च क्षुधार्त्ते च तपः श्रान्ते भयान्विते ।
विस्मये चावहित्ये च तथौत्सुक्यसमन्विते ॥ ३५ ॥
शृङ्गारे चैव शोके च स्वच्छन्दगमने तथा ।
गतिः स्थितलया कार्याधिकलान्तरपातिता ॥ ३६ ॥
पुनश्चिन्तान्विते चैव गतिः कार्या चतुष्कला ।
१. विकला—क०, विकलं चोत्तमा यत्र—ख०, ग० ।
२. नीचेष्वर्द्धकलं भवेत्—ख०, ग० ।
३. श्लोकार्धमेतत् ख०, म० पुस्तकयोर्नास्ति ।
४. मर्द्धार्द्धहानिं तु—ख०, ग० । ५. पद्यमेतत्—क० पुस्तकेऽत्र नास्ति ।
६. विक्षते—क० ।
७. गतिः स्थितलया कार्या विफलान्तरपातिना—ख० ग० ।
८. श्लोकार्धमेतत्—ख० पु० नास्ति ।