नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः १३५
ज्वर-ग्रस्त, क्षुधार्त, श्रान्त, भयभीत व्यक्ति की तथा विस्मय,
अवहित्था, औत्सुक्य, शृङ्गार रस (विप्रलम्भ इष्ट है) तथा शोक की
अवस्थाओं में स्थित (विलम्बित) लय में गति रखते हैं—जिसमें चारकलो
से अधिक समय लगता हो (या कम से कम चार कला का समय लगे)
किन्तु सचिन्तायुक्त-दशा में गति चार कला प्रमाणवाली ही रहना चाहिए ॥
अस्वस्थकामिते चैव भये² वित्रासिते तथा ॥ ३७ ॥
आवेगे चैव हर्षे च कार्ये यच्च त्वरान्वितम् ।
अनिष्टश्रवणे चैव क्षेपे⁴ चाद्भुतदर्शने ॥ ३८ ॥
अपि चात्ययिके कार्ये दुःखिते शत्रुमार्गणे ।
अपराद्धानुसरणे⁶ श्वापदानुगतौ⁷ तथा ॥ ३९ ॥
एतेष्वेवं⁸ गतिं प्राज्ञो द्विकलां सम्प्रयोजयेत् ।
प्रच्छन्न-कामिता, (अस्वस्थकामिता) भय, व्यग्रता (वित्रास),
आवेग, हर्ष, शीघ्रता के कार्य, अनिष्ट-श्रवण, निन्दा, अद्भुत-दर्शन,
आवश्यक कार्य, दुःख, शत्रु के ढूँढ़ने, अपराधी का पीछा करने तथा शिकार
के पीछे पड़ने की दशा में ऐसे पात्रों की दो कला की गति बुद्धिमान्
निर्देशक द्वारा संयोजित की जाए ॥ ३७-४० ॥
गतिः शृङ्गारिणी कार्या स्वस्थे¹⁰कामितसम्भवा ॥ ४० ॥
१. आचार्य अभिनवगुप्त ने यहाँ अधिकलान्तरपातिता पद की व्याख्या में
बतलाया कि यहाँ अधिकलान्तरपातिता में अधि शब्द का अर्थ आधिक्यपरक होता
है। यह आधिक्य उत्कर्ष है जो चार कला के प्रमाण की गति से बिलम्बित लय
में पैरों का रखना है। यह प्लुत जैसे स्वर या विराम के आधिक्य में ताल के
बोध का सूचक है। इसका आशय यह कि पाद-पात में छः या आठ कलाओं के
अन्तर से रखी जाने वाली गति या डग का भी आधिक्यपरक स्थिति में ग्रहण
हो सकता है परन्तु ऐसी गतियाँ स्त्री पात्रों में संयोजित नहीं करना चाहिए।
१. अस्वस्थे कामिते—ख०, ग० ।
२. भयाद्वित्रा—क०, भयवित्रा—क० । ३. यच्चतुरान्विते—क० ।
४. कोपेष्याद्भुतदर्शने—ग० । ५. तथा चैवारिमार्गणे—ख० ।
६. अवरुद्धानुकरणे, अपराद्धानुकरणे—क०, अपराध्वानुसरणे—ग० ।
७. नुगते—ख०, ग० । ८. एतेष्वेव—क० ।
९. विकलां—क० । १०. स्वच्छकामित—ख०, ग० ।