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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 668 में से

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पृष्ठ 242

त्रयोदशोऽध्यायः १३१
वामवेधं ततः कुर्याद्विक्षेपं दक्षिणेन च ।
परिवृत्य द्वितीयन्तु गच्छेत् कोणं ततः परम् ॥ १७ ॥
तत्रापि वामवेधस्तु विक्षेपो दक्षिणेन च ।
ततो भाण्डोन्मुखो गच्छेत्तान्येवं तु पदानि च ॥ १८ ॥
एवं गतागतैर्गत्वा पदानामेकविंशतिम् ।
वामवेधं ततः कुर्याद्विक्षेपं दक्षिणस्य च ॥ १९ ॥
वह पार्श्वक्रान्ता चारी में वाद्यवादन के साथ सुन्दरतापूर्वक पैरों को
रखते हुए रङ्गमञ्च के कोने की ओर पाँच डग भरे । फिर वह 'सूची' चारी
को बाएँ पैर को आगे रखते हुए प्रदर्शित करे तथा दाहिने पैर को पीछे
रख कर 'विक्षेप' को प्रस्तुत करे; फिर (गोल) घूमकर दूसरे कोने की
ओर पाँच डग भरे और बाएँ पैर को आगे रखते सूचीचारी को तथा
दाहिने पैर को उसके पीछे रखकर 'विक्षेप' को प्रदर्शित करे; फिर गोल
घुमाव लेकर वाद्यों की ओर बढ़ते हुए इसी प्रकार पाँच डग भरे । इस
प्रकार आने-जाने में होने वाली डगों की इक्कीस संख्या को पूरी कर वह
बाँए पैर से 'सूची' चारी को तथा उसके पीछे दाहिने पैर को रखकर पुनः
विक्षेप का प्रदर्शन करे ॥ १६-१९ ॥
रङ्गे विकृष्टे भरतेन कार्यो गतागतः पादगतिप्रचारः ।
त्र्यश्रस्त्रिकोणे चतुरस्ररङ्गे गतिप्रचारश्चतुरस्र एव ॥ २० ॥
'विकृष्ट' नाट्यगृह में अभिनेता अपने पैरों की डग आने-जाने वाली
तथा विस्तीर्ण रखे, त्र्यस्रनाट्यगृह में वही चारी (त्रिकोणाभिमुखी या) तिरछी
और चतुरस्र नाट्यगृह में पैरों की डग चतुरश्र प्रकार वाली रखनी चाहिए ॥
यः समैः सहितो गच्छेत्तत्र कार्यो लयाश्रयः ।
चतुष्कलोऽथ द्विकलस्तथैवैककलः पुनः ॥ २१ ॥
जब अभिनेता समगति में अपने समानस्थितिवाले पात्रों के साथ
चल रहा हो तो उसकी गति की लय (उसकी प्रकृति तथा विधि के
अनुसार) चार, दो या एक कला के अनुसार रखी जाए ॥ २१ ॥
१. दक्षिणस्य च—क० । २. तान्येव विपदानि च—ख०; ग० ।
३. गतागतैः कृत्वा—ख०; ग० । ४. विंशतिः—क० ।
५. दक्षिणेन च—ख० । ६. त्र्यस्रे त्रिकोणे—ग० ।
७. द्विकलो भवेदेककलः—ग० ।