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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

११६ नाट्यशास्त्रम्
आकाशिक मण्डल—लक्षण
१आद्यं पादञ्च जनितं कृत्वोद्वाहितमाचरेत् ।
अलातं वामकञ्चैव पार्श्वक्रान्तञ्च दक्षिणम् ॥ ७ ॥
सूचीं२ वामं पुनश्चैव त्रिकञ्च परिवर्तयेत् ।
तथा दक्षिणमुद्धृ³त्तमलातञ्चैव वामकम् ॥ ८ ॥
परिच्छिन्नन्तु कर्तव्यं बाह्यभ्रमरकेण तु ।
अतिक्रान्तं पुनर्वामं दण्डपादञ्च दक्षिणम् ॥ ९ ॥
४विज्ञेयमेतद् व्यायामे त्वतिक्रान्तन्तु मण्डलम् ।
अतिक्रान्त—यदि (आरंभ में) दाहिने पैर से 'जनिता' चारी प्रदर्शित
करें फिर शकटास्या चारी का जिसमें वक्षःस्थल उद्वाहित हो । फिर बाएँ
पैर से 'अलात' तथा दाहिने पैर से 'पार्श्वक्रान्ता' चारी का प्रदर्शन करे ।
फिर बाएँ पैर से 'सूची' और भ्रमरी चारी को कमर का घुमाव लेते हुए
प्रदर्शित करें । पुनः दाहिने पैर से उद्वाहित चारी तथा बाएँ पैर से अलात
चारी को प्रदर्शित कर उसे भ्रमरी चारी में परिवर्तित कर दें । फिर इसी बाएँ
पैर से अलातचारी और दाहिने पैर द्वारा दण्डपाद चारी का प्रदर्शन करने
पर यह (नृत्य) व्यायाम में होनेवाला अतिक्रान्तमण्डल हो जाता है ॥७-१०॥
आद्यन्तु जनितं कृत्वा तेनैव च निकुट्टनम् ॥ १० ॥
आस्पन्दितन्तु वामेन पार्श्वक्रान्तञ्च दक्षिणम् ।
वामं सूचीपदं दद्यादपक्रान्तञ्च दक्षिणम् ॥ ११ ॥
भुजङ्गत्रासितं वाममतिक्रान्तञ्च दक्षिणम् ।
५उद्वृत्तं दक्षिणञ्चैव ह्यलातञ्चैव वामकम् ॥ १२ ॥
पार्श्वक्रान्तं पुनः सव्यं सूची वामक्रमं तथा ।
विक्षेपो दक्षिणस्य स्यादपक्रान्तश्च वामकः ॥ १३ ॥
[ बाह्यभ्रमरकञ्चैव विक्षेपञ्चैव योजयेत् ]
विज्ञेयमेतद् व्यायामे विचित्रं नाम मण्डलम् ।
विचित्र—यदि दाहिने पैर को कंपाते हुए 'जनिता' चारी का प्रदर्शन
करे तथा उसे ही तलसंचर (निकुट्टक) पाद बनाए । फिर बाएँ पैर से
१. आद्यपादं तु तं कृत्वा उद्वाहितमथाचरेत्—ग० ।
२. सूचीपादं—ख०-ग० । ३. मुद्धृत्य अलातं—ख०-ग० ।
४. पद्यार्धमेतत् क-ख-पुस्तकयोः नास्ति ।
५. उद्वृत्तं—ख०-ग० । ६. दपक्रान्तञ्च वामकम्—ख०-ग० ।

द्वादशोऽध्यायः ११७
स्पन्दिता चारी (आस्पन्दिता) तथा दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता का (फिर)
बाएँ पैर द्वारा 'सूचीचारी' तथा दाहिने पैर से अपक्रान्ता चारी का, फिर
बाएँ पैर से भुजंगत्रासिता चारी तथा दाहिने पैर से 'अतिक्रान्ता' का
फिर दाहिने पैर से उद्वृत्ता चारी का तथा बाएँ पैर से 'अलाताचारी' का,
फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता चारी तथा बाएँ से सूची का, फिर दाहिने
पैर से 'विक्षिप्ता (व आक्षिप्ता) चारी का तथा बाएँ से अपक्रान्ता चारी
का (फिर बाहरी ओर से भ्रमरी तथा आक्षिप्ता चारी का) प्रदर्शन करे तो
'विचित्र' नामक मण्डल कहलाता है ॥ ११-१४ ॥
कृत्वोर्ध्वजानु चरणमाद्यं सूचीं प्रयोजयेत् ॥ १४ ॥
अपक्रान्तः पुनर्वाम आद्यः पार्श्वगतो भवेत् ।
वामं² सूचीं पुनर्द्यात् त्रिकञ्च परिवर्तयेत् ॥ १५ ॥
[ पार्श्वक्रान्तं पुनश्चाद्यमतिक्रान्तञ्च वामकम् ।
सूचीमाद्यक्रमं³ कृत्वा ह्यपक्रान्तञ्च वामकम् ॥ ]
पार्श्वक्रान्तं पुनश्चाद्य⁴मतिक्रान्तञ्च वामकम् ॥ १६ ॥
परिच्छिन्नञ्च कर्तव्यं बाह्यभ्रमरकेण वै⁵ ।
एष चारीप्रयोगस्तु कार्यो ललितसञ्चरे⁶ ॥ १७ ॥
ललितसंचर—यदि दाहिना पैर अपनी जंघा को ऊपर उठाकर 'सूची'
का (प्रदर्शन करे) और बांया पैर 'अपक्रान्ता' का तथा दाहिना पैर
'पार्श्वक्रान्ता' का, (फिर) बांया पैर 'सूची' चारी का प्रदर्शन कर भ्रमरी
चारी का प्रदर्शन करे (भ्रमरी चारी के समय पीठ को एक घुमाव देना
चाहिए) (प्रक्षिप्त—फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता तथा बाएं से
अतिक्रान्ता का फिर दाहिने पैर से 'सूची' तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता
का) फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता चारी
को प्रदर्शित कर उसे भ्रमरी चारी में परिवर्तित (परिच्छिन्न) करे तो
'ललितसंचर' मण्डल बन जाता है ॥ १६-१७ ॥
१. कृत्वोर्ध्वंवामचरण—ख०ग०। २. वामसूचीं—ख०ग०।
३. सूचीवामक्रमं—ख०ग०।
४. पुनश्चान्यो वामोऽतिक्रान्त एव च—ख०-ग०।
५. हि—ख०-ग०। ६. सञ्चरैः—ख०-ग०।

११८ नाट्यशास्त्रम्
सूचीं वामपदं दद्यात् त्रिकञ्च परिवर्तयेत्।
पार्श्वक्रान्तः पुनश्चाद्यो वामोऽतिक्रान्त एव च ॥ १८ ॥
सूचीमाद्यं पुनर्दद्यादपक्रान्तश्च वामकम्।
पार्श्वक्रान्तं पुनश्चाद्यं सूचीविद्धे तु मण्डले ॥ १९ ॥
सूचीविद्ध—यदि बाएं पैर से 'सूची' को प्रदर्शित कर भ्रमरी चारी को
प्रदर्शित करे (अर्थात् शरीर को घुमाव दे दे) फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता
चारी का, बाएं पैर से अतिक्रान्ता चारी का, फिर दाहिने पैर से 'सूची'
चारी का और बाएं पैर से अपक्रान्ता चारी का तथा दाहिने पैर से भी
अपक्रान्ता चारी का प्रदर्शन करे तो 'सूचीविद्ध' मण्डल जानो ॥ १८-१९ ॥
आद्यस्तु जनितो भूत्वा स च दण्डक्रमो भवेत्।
वामं सूचीं पुनर्दद्यात् त्रिकञ्च परिवर्तयेत् ॥ २० ॥
उँद्वृत्तो दक्षिणश्च स्यादलातश्चैव वामकः।
पार्श्वक्रान्तः पुनश्चाद्यो भुजङ्गत्रासितस्तथा ॥ २१ ॥
अतिक्रान्तः पुनर्वामो दण्डपादस्तु दक्षिणः।
वामः सूची त्रिकावर्तो दण्डपादे तु मण्डले ॥ २२ ॥
दण्डपाद—यदि दाहिना पैर जनिताचारी प्रदर्शित कर दण्डपादा चारी
को प्रदर्शित करे फिर बाये पैर से 'सूची' को प्रदर्शित कर भ्रमरी चारी को
प्रदर्शित किया जाए। फिर दाहिने पैर से उद्वृत्ता चारी का, बाएं पैर से
अलाता चारी का, दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता चारी को, दाहिने पैर से ही
दण्डपादा चारी को तथा बाएं पैर से सूची को प्रदर्शित कर त्रिक को
घुमाव दे कर भ्रमरी चारी को प्रदर्शित करे तो 'दण्डपाद' मण्डल
हो जाता है ॥ २०-२२ ॥
आद्यन्तु जनितं कृत्वा तेनैव च निकुट्टकम्।
आस्पंदितंश्च वामेन ह्युद्वृत्तं दक्षिणेन च ॥ २३ ॥
अलातं वामकं पादं सूचीं दद्यात्तु दक्षिणम्।
पार्श्वक्रान्तः पुनर्वाम आक्षिप्तो दक्षिणस्तथा ॥ २४ ॥
१. श्चान्यो—ख० ग० । २. एतत् पद्यार्धं ख-पुस्तके नास्ति ।
३. तद्वतो—ख० । ४. तद्ववृत्तो—ख०, उद्वर्तो-ग० ।
५. श्चान्यः—ग०। ६. निकुट्टनम्—ख०-ग० ।
७. आस्कन्दितञ्च—ख०-ग० । ८ ह्युत्तम्भं—ख०; उद्धृतं-ग० ।
९. क्रान्तं—ख०-ग०।

द्वादशोऽध्यायः १११९
समावर्त्य त्रिकञ्चैव दण्डपादं प्रसारयेत् ।
सूचीं वामपदं दद्यात् त्रिकञ्च परिवर्तयेत् ॥ २५ ॥
भुजङ्गत्रासितश्चाद्यो वामोऽतिक्रान्त एव च ।
एष चारी प्रयोगस्तु विहृते मण्डले भवेत् ॥ २६ ॥
विहृत—यदि दाहिने पैर द्वारा जनिता चारी का तथा इसी पैर द्वारा
तलसंचर पाद (निकुट्टन) का, फिर बाएं पैर से स्पन्दिता (आस्कन्दिता)
तथा दाहिने पैर से उद्वृत्ता चारी का, फिर बाएं पैर से अलात चारी का
और दाहिने पैर से सूची का, फिर बाएं पैर से पार्श्वक्रान्ता चारी का तथा
दाहिने पैर से आक्षिप्ता का प्रदर्शन कर भ्रमरी चारी प्रदर्शित करे फिर
एक घुमाव लेकर—या त्रिक को परिवर्तित कर दण्डपादा चारी, फिर
बाएं पैर से सूची और भ्रमरी चारी का (त्रिक को घुमाकर) प्रदर्शन करे
फिर दाहिने पैर से भुजंगत्रासिता चारी तथा बाएं पैर से अतिक्रान्ता
चारी का प्रदर्शन करने पर 'विहृत' मण्डल हो जाता है ॥ २३-२६ ॥
सूचीमाद्यक्रमं दद्यौदपक्रान्तञ्च वामकम् ।
पार्श्वक्रान्तः पुनश्चाद्यो ह्यलातश्चैव वामकः ॥ २७ ॥
<sup>७</sup>भ्रान्त्वा चारीभिरेताभिः पर्यायेणाथ मण्डलम् ।
षट्संख्यं सप्तसंख्यं वा ललितैः पादविक्रमैः ॥ २८ ॥
[ <sup>९</sup>आद्यं कुर्यादपक्रान्तमतिक्रान्तञ्च वामकम् । ]
<sup>१०</sup>अपक्रान्तः पुनश्चाद्यो वामोऽतिक्रान्त एव च ।
पादभ्रमरकश्च स्यादलाते खलु मण्डले ॥ २९ ॥
अलात—दाहिने पैर से 'सूची' चारी का तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता
चारी का, फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता चारी और बाएं पैर से अलाता
का फिर इन्हीं चारियों से क्रमशः ललितपाद विन्यासों द्वारा छः या सात
बार घुमाव लेना चाहिए । (प्रक्षिप्त-दाहिने पैर से अपक्रान्ता तथा बाएं
१. परिवृत्य—ग० । २. सूचीवामपदं—ग० । ३. विवृत्ते—ख० ।
४. सूचीमाद्यं क्रमं—ख० । ५. कृत्वा चापक्रान्तं—ग० ।
६. पार्श्वक्रान्तस्ततश्चान्योऽप्यलात—ग० ।
७. इतः प्रभृति सार्ध पद्यत्रयं ग०-पुस्तके नास्ति ।
८. तत् संख्यं—ख० ९. एतत् पद्यार्धं ख०-पुस्तके नास्ति ।
१०. अतिक्रान्तः—ख० ।

१२० नाट्यशास्त्रम्
से अतिक्रान्ता चारी को और ) फिर दाहिने पैर से ‘अपक्रान्ता चारी’
तथा बाएं पैर से अतिक्रान्ता चारी को प्रदर्शित कर ‘भ्रमरी को
( त्रिक परिवर्तन द्वारा ) प्रदर्शन किया जाए तो अलात मण्डल
कहलाता है ॥ २७-२८ ॥
सूचीमाद्यक्रमं कृत्वा ह्यपक्रान्तश्च वामकम् ।
आद्यो दण्डक्रमश्चैव सूची¹ कार्यस्तु वामकः ॥ ३० ॥
कार्यस्त्रिकविवर्तश्च पार्श्वक्रान्तश्च दक्षिणः ।
आक्षिप्तं वामकं कुर्याद् दण्डपादश्च दक्षिणः ॥ ३१ ॥
ऊरुद्वृत्तश्च तेनैव कर्तव्यं दक्षिणेन तु ।
सूची वामक्रमं³ कृत्वा त्रिकश्च परिवर्तयेत् ॥ ३२ ॥
अलातश्च भवेद्वामः पार्श्वक्रान्तश्च दक्षिणः ।
अतिक्रान्तः पुनर्वामो⁴ वामबन्धे तु मण्डले ॥ ३३ ॥
वाम-विद्ध ( वामबन्ध )—दाहिने पैर से ‘सूची’ चारी का तथा बाएं
पैर से अपक्रान्ता चारी का; फिर दाहिने पैर से दण्डपादा चारी का तथा
बाएं पैर से ‘सूची’ चारी का; फिर दाहिने पैर से भ्रमरी चारी को ( त्रिक
का घुमाव देकर ) प्रदर्शित कर पार्श्वक्रान्ता चारी का तथा दाहिने पैर से
दण्डपादा चारी का, फिर दाहिने पैर से ऊरुद्वृत्ता चारी तथा बाएं पैर से
सूची को प्रदर्शित कर ( त्रिक परिवर्तन द्वारा ) भ्रमरी चारी को प्रदर्शित
करे । फिर बाएं पैर से ‘अलाता’ चारी का तथा दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता
चारी का तथा बाएं पैर अतिक्रान्ता चारी का प्रदर्शन किया जाए तो
‘वामविद्ध’ मण्डल कहलाता है ॥ २९-३३ ॥
सूचीमाद्यक्रमं दद्या⁵दपक्रान्तश्च वामकम् ।
पार्श्वक्रान्तः पुनश्चाद्यो भुजङ्गत्रासितः स⁶ च ॥ ३४ ॥
अतिक्रान्तः पुनर्वाम आक्षिप्तो दक्षिणस्तथा ।
अतिक्रान्तः पुनर्वाम ऊरुद्वृत्त⁸स्तथैव च ॥ ३५ ॥
१. सूचीपादस्तु—ख० । २. दण्डपाश्वंल्लच—ग० ।
३. करञ्चैव—ग० । ४. कार्यो ललितसञ्चरः—ख० ।
५. कृत्वा अपक्रान्तं—ग० । ६. श्चान्यो—ख०; ग० ।
७. त्रासितं तथा—ख०; ग० । ८. ऊरुद्वृत्तं तथैव च—ग० ।

द्वादशोऽध्यायः १२१
अलातञ्च पुनर्वामः पार्श्वक्रान्तश्च दक्षिणः ।
१सूचीवामं पुनर्दद्यादपक्रान्तश्च दक्षिणः ॥ ३६ ॥
अतिक्रान्तः पुनर्वामः कार्यो ललित²सञ्चरः ।
एष पादप्र³चारस्तु ललिते मण्डले भवेत् ॥ ३७ ॥
ललित—यदि दाहिने पैर से सूची चारी का तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता
चारी का, फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता तथा भुजंगत्रासिता चारी का,
फिर बाएं से अतिक्रान्ता तथा दाहिने पैर से आक्षिप्ता का ) फिर बाएं
से अतिक्रान्ता तथा ऊरूद्वृत्ता चारी को प्रदर्शित कर फिर बाएं से अलात
तथा दाहिने पैर से अपक्रान्ता चारी का और फिर बाएं से अतिक्रान्ता
चारी का ललितगति से प्रदर्शन करने से 'ललित' मण्डल कहलाता है ॥
सूचीमाद्यक्रमं कृत्वा ह्यपक्रान्तञ्च वामकम् ।
पार्श्वक्रान्तं पुनश्चाद्यं वामं⁴ पार्श्वक्रमं तथा ॥ ३८ ॥
भ्रान्त्वा चारीभिरेताभिः पर्यायेणाथ मण्डलम् ।
वामं सूचीं ततो दद्यादपक्रान्तञ्च दक्षिणम् ॥ ३९ ॥
स्वभावगमने ह्येतन्मण्डलं संविधीयते ।
क्रान्तमेतत्तु विज्ञेयं नामतो नामयोक्तृभिः ॥ ४० ॥
क्रान्त—यदि दाहिने पैर से सूची तथा बाएँ पैर से अपक्रान्ता चारी का,
फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता चारी का तथा बाएं पैर से ही पार्श्वक्रान्ता
चारी को प्रस्तुत कर फिर इन्हीं चारियों के द्वारा क्रमशः सभी दिशाओं
में घुमाव लिया जाए। तब फिर बाएं पैर से 'सूची' का तथा दाहिने
पैर से अपक्रान्ता चारी का प्रदर्शन करे तो इस मण्डल को 'क्रान्त' मण्डल
जानो। इसकी स्वाभाविक गति में योजना की जाए क्योंकि इसकी यौगिक
अर्थ के द्वारा यही प्रतीति होती है ॥ ३८-४० ॥
एतान्याकाशगानीह⁵ ज्ञेयान्येवं दशैव तु ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि भौमानामपि लक्षणम् ॥ ४१ ॥
ये दस आकाशिक मण्डल कहे गए हैं। अब आगे मैं भौमिक मण्डलों
के लक्षण बतलाता हूं ॥ ४१ ॥
१. पद्यार्धमेतत् ख०-ग०-पुस्तकयोः नास्ति ।
२. ललितसंज्ञकः—ख० । ३. प्रसारस्तु—ख० ग० ।
४. इचान्यं वामपार्श्वं—ग० । ५. गामिनि—ख० ।

१२२ नाट्यशास्त्रम्
भौमिक मण्डल—लक्षण—
आद्यस्तु जनितः कार्यो वामश्चास्पन्दितो भवेत् ।
शकटास्यः पुनश्चाद्यो वामश्चापि प्रसारितः ॥ ४२ ॥
आद्यो भ्रमरकः कार्यस्त्रिकश्च परिवर्त्तयेत् ।
आस्पन्दितः पुनर्वाम शकटास्यश्च दक्षिणः ॥ ४३ ॥
वामः पृष्ठापसर्पी च दद्याद् भ्रमरकं तथा।
स एवास्पन्दितः कार्यस्त्वेतद् भ्रमरमण्डलम् ॥ ४४ ॥
भ्रमर—यदि दाहिने पैर से 'जनिता' चारी तथा बाएं पैर से
'आस्कन्दिता' का, फिर दाहिने पैर से शकटास्या चारी को प्रदर्शित कर बाएं
पैर को फैला ले । फिर दाहिने पैर से भ्रमरी चारी का शरीर को घुमाव
देकर प्रदर्शन करे। फिर बाएं पैर से 'आस्कन्दिता' चारी का तथा दाहिने
पैर से 'शकटास्या चारी' का, फिर बाएं पैर से अपक्रान्ता चारी अपसर्पी
का और त्रिक को घुमाव देते हुए भ्रमरी चारी का प्रदर्शन करे तो भ्रमर
नामक मण्डल हो जाता है ॥ ४२-४४ ॥
आद्यो भ्रमरकः कार्यो वामश्चैवाड्डितो भवेत् ।
४कार्यस्त्रिकविवर्त्तश्च शकटास्यश्च दक्षिणः ॥ ४५ ॥
ऊरुद्वृत्तः स एव स्याद्वामश्चैवापसर्पितः ।
कार्यस्त्रिकविवर्त्तश्च दक्षिणः स्पन्दितो भवेत् ॥ ४६ ॥
शकटास्यो भवेद्वामस्तद्देवास्फोटनं भवेत् ।
एतदास्पन्दितं नाम व्यायामे युद्धमण्डलम् ॥ ४७ ॥
आस्पन्दित (आस्यन्दित)—यदि दाहिने पैर से 'भ्रमरी' चारी का
तथा बाएं पैर से 'अड्डिता' तथा पीठ को एक घुमाव देकर भ्रमरी चारी का,
फिर दाहिने पैर से 'शकटास्या' चारी का तथा पुनः 'ऊरूद्वृत्ता' चारी का,
फिर बाएं पैर से अतिक्रान्ता चारी (अपसर्पी) को प्रदर्शित करे और फिर
भ्रमरी को (पीठ को पूरा गोल घुमाव देकर) प्रदर्शित करे, फिर दाहिने
१. इचास्कन्दितो—ख०-ग० । २. आस्कन्दितः—ख०-ग० ।
३. एवास्कन्दितः—ख०-ग० ।
४. 'कार्यस्त्रिक' इत्यादि पद्यद्वयी ग०-पुस्तके नास्ति
५. स्कन्दितो—ख० । ६. तथैवा—ख० ।
७. दास्कन्दितं—ख०-ग० ।

द्वादशोऽध्यायः १२३
पैर से स्पन्दिता-चारी का और पुनः बाएं पैर से 'शकटास्या' चारी का
प्रदर्शन कर उसे भूमि पर जोर का झटका देकर पटके तो 'आस्पन्दित'
नामक युद्ध में प्रयुक्त होने वाला मण्डल हो जाता है ॥ ४५-४७ ॥
आद्यन्तु जनितं कृत्वा वामेनं तु निकुट्टकम् ।
शकटास्यः पुनश्चाद्य³ ऊरुद्वृत्त स एव तु ॥ ४८ ॥
पृष्ठापसर्पी वामश्च स च चाषगतिर्भवेत् ।
आस्पन्दितः⁴ पुनः सव्यः⁵ शकटास्यश्च वामकः ॥ ४९ ॥
आद्यो भ्रमरकश्चैव त्रिकन्तु परिवर्तयेत् ।
पृष्ठापसर्पी वामश्चेत्यावर्ते मण्डले भवेत् ॥ ५० ॥
आवर्त्त—यदि दाहिने पैर से जनिता चारी तथा बाएं पैर से तलसंचर
(निकुट्टन) का, फिर दाहिने पैर से शकटास्या तथा उसी से ऊरूद्वृत्ता
का, फिर पीठ को घुमाते हुए बाएं पैर से अतिक्रान्ता चारी (अपसर्पी) का
तथा 'चाषगति' चारी का, फिर दाहिने पैर से 'स्कन्दिता' चारी का तथा
बाएं पैर से शकटास्या चारी का, फिर दाहिने पैर से पीठ को चक्कर या
घुमाव देते हुए भ्रमरी चारी तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता (अपसर्पी) चारी
को प्रदर्शित करे तो 'आवर्त्त' नामक मण्डल होता है ॥ ४८-५० ॥
⁷कृत्वादौ समपादन्तु स्थानं हस्तौ प्रसारयेत् ।
निरन्तरावूर्ध्वतला वावेष्ट्योद्वेष्ट्य चैव हि ॥ ५१ ॥
कटीतटे विनिक्षिप्य चाद्यमावर्तयेत् क्रमात् ।
यथाक्रमं पुनर्वाममावर्तेन प्रसारयेत् ॥ ५२ ॥
⁹चार्यानया च भ्रान्त्वा तु पर्यायेणाथ मण्डलम् ।
समोत्सारितमेतच्च¹⁰ ज्ञेयं व्यायाममण्डलम् ॥ ५३ ॥
समोत्सारित—सर्वप्रथम समपाद स्थान का प्रदर्शन कर दोनों हाथों
को फैलाकर उनकी हथेली ऊपर की ओर मुंह वाली रखे पुनः हाथों को
१. वामञ्चैव—ग० । २. निकुट्टनम् — ख० ।
३. इचान्यः—ग० । ४. आस्कन्दितः—ख०-ग० ।
५. सद्यः—ख०, सौम्यं—ग० । ६. पृष्ठावसपर्पी—ख० ।
७. समपादं बुधः कृत्वा स्थानं—ख०-ग० ।
८. क्रमम् — ख०-ग० । ९. चार्या चानया—ग० ।
१०. मेतत्तु कार्यं—ग० ।

१२४ नाट्यशास्त्रम्
आवेष्टन (हाथों का पारस्परिक लपेटना) तथा उद्वेष्टन गति युक्त कर ले,
फिर बाएं हाथ को कटि प्रदेश पर रखे और दाहिने हाथ को 'आवर्तित'
गति में रखे, फिर दाहिने हाथ को कटि पर रखे और बाएं हाथ क्रमशः
(पर्याय में) गोल घुमाव लेते हुए रखने तथा आवर्तित चारी में स्थित
रहने पर 'समोत्सारित' मण्डल हो जाता है ॥ ५१-५३ ॥
पादैस्तु भूमिसंयुक्तैः सूचीविद्धैस्तथैव च ।
एलकाक्रीडितैश्चैव $^१$तूर्णैस्त्रिकविवर्तनैः ॥ ५४ ॥
सूचीविद्धापविद्धैश्च क्रमेणावृत्य मण्डलम् ।
एलकाक्रीडितं विद्यात् खण्डमण्डलसंज्ञितम् ॥ ५५ ॥
एलकाक्रीडित—यदि दोनों सम पैरों को पृथ्वी पर टिकाकर फिर 'सूची'
तथा एलकाक्रीडिल चारी को प्रदर्शित करे फिर शीघ्र भ्रमरी चारी का प्रदर्शन
कर त्रिक को घुमाव दे, फिर 'सूची' तथा आविद्धा (अपविद्धा) चारी को
क्रमशः गोल घुमाव देकर प्रदर्शन करे तो 'खण्डमण्डल' नाम वाला
'एलकाक्रीडित' मण्डल हो जाता है ॥ ५४-५५ ॥
सव्यमुद्धट्टितं कृत्वा तेनैवावर्त्तमाचरेत् ।
तेनैवास्कन्दितः कार्यः शकटास्यश्च वामकः ॥ ५६ ॥
आद्यः$^५$ पृष्ठोपसर्पी च स च चाषगतिर्भवेत् ।
अड्डितँश्च पुनर्वाम आद्यश्चैवापसर्पितः ॥ ५७ ॥
वामो भ्रमरकः कार्य आद्य$^७$ आस्कन्दितो भवेत् ।
तेनैवास्फोटनं कुर्यादेतदड्डितमण्डलम् ॥ ५८ ॥
अड्डित—यदि दाहिने पैर को 'उद्घाट्टित' लक्षण के अनुसार घुमावे
फिर (इसी के अनुसार) एक सामान्य गोल घुमाव ले और फिर उसी
पैर को 'आस्यन्दिता' चारी के अनुसार घुमावे तथा बाएं पैर से शकटास्या
चारी का, फिर दाहिने पैर को पीछे की ओर क्रमशः अपक्रान्ता (अपसर्पी)
चारी के अनुसार तथा चाषगति चारी के अनुसार ले जाए, फिर बायां
पैर अड्डिता चारी में तथा दाहिना पैर 'अपक्रान्ता' चारी में रखे, फिर
१. तूर्णेत्रिक—ग०। २. विवर्तनम्—ख० । ३. पविद्धश्च—ग० ।
४. वावृत्त—ख० । ५. आद्यपृष्ठा—ख० ।
६. इतः प्रभृति सार्धश्लोकद्वयं ग०-पुस्तके नास्ति ।
७. आद्यश्चास्कन्दितो—ख० । ८. दड्डित—ख० ।

द्वादशोऽध्यायः १२५
बाएं पैर से 'भ्रमरी' और दाहिने पैर से स्यन्दिता चारी का प्रदर्शन कर पृथ्वी
पर पैरों को जोर से पटके तो 'अङ्कित' मण्डल होजाता है ॥ ५६-५८ ॥
आद्यन्तु जनितं कृत्वा तेनैव च निकुट्टकम् ।
स एव शकटास्यश्च वामश्चास्कन्दितो भवेत् ॥ ५९ ॥
पादैश्च शकटास्यस्थैः पर्यायेणाथ मण्डलम् ।
विज्ञेयं शकटास्यन्तु व्यायामे युद्धमण्डलम् ॥ ६० ॥
शकटास्य—यदि दाहिने पैर द्वारा 'जनिता' चारी को और फिर इसे
तलसंचरपाद (निकुट्टक) लक्षण में गतिशील रखे, फिर इसी पैर से
'शकटास्य' चारी तथा बाएं पैर से स्यन्दिता (आस्यन्दिता) चारी का
प्रदर्शन करे । फिर शकटास्या चारी में दोनों पैरों के द्वारा क्रमशः गोल
घुमाव ले तो 'शकटास्य' मण्डल होता है । युद्धप्रदर्शन में इसी मण्डल की
योजना की जाती है ॥ ५९-६० ॥
आद्यस्तु जनितो भूत्वा स एवास्कन्दितो भवेत् ।
अपसर्पी पुनर्वामः शकटास्यश्च दक्षिणः ॥ ६१ ॥
भ्रान्त्वा चारीभिरेताभिः पर्यायेणाथ मण्डलम् ।
अध्यर्धमेतद्विज्ञेयं नियुद्धे चापि⁵ मण्डलम् ॥ ६२ ॥
अध्यर्ध—यदि दाहिने पैर द्वारा 'जनिता' चारी तथा पुनः उसी से
आस्कन्दिता चारी का प्रदर्शन करे, फिर बायां पैर अपक्रान्ता (अपसर्पित)
चारी का तथा दाहिना पैर शकटास्या चारी का रखे । इस प्रकार इन
चारियों में क्रमशः घुमते हुए मण्डल बनाया जाए तो उसे 'अध्यर्ध' मण्डल
जानो । इसकी बाहुयुद्ध में योजना की जाती है ॥ ६१-६२ ॥
सूचीमाद्यक्रमं कृत्वा ह्यपक्रान्तश्च वामकम् ।
भुजङ्गत्रासितैश्चाद्य² एवमेव³ च वामकः ॥ ६३ ॥
भुजङ्गत्रासितैर्भ्रान्त्वा पादैरपि⁴ च मण्डलम् ।
पिष्टकुट्टश्च विज्ञेयं चौरीभिर्मण्डलं¹ बुधैः ॥ ६४ ॥
पिष्टकुट्ट—यदि दाहिने पैर द्वारा 'सूची' चारी का तथा बाएं पैर से
अपक्रान्ता चारी का प्रदर्शन करे, फिर दाहिने पैर से भुजंगत्रासिता चारी
१. चारिमण्डलम्—ग० । २. त्रासितञ्चान्य—ग० ।
३. एष एव तु—ग० । ४. चारैरपि—० ।
५. नियुद्धे चारिमण्डलम्—ग० ।

१२६ नाट्यशास्त्रम्
का तथा बाएं पैर से भी इसी चारी का प्रदर्शन कर फिर दोनों भुजंगत्रासिता
चारी वाले पैर वर्तुलाकार गति में घूमते हुए रखे तो इस चारी मण्डल को
'पिष्टकुट्ट' जानों। इसे भी युद्ध प्रदर्शन में प्रयुक्त किया जाए ॥ ६३-६४ ॥
सर्वैश्चाषगतैः पादैः परिक्रम्य१ च मण्डलम् ।
एतच्चाषगतं विद्यान्नियुद्धे चापि२ मण्डलम् ॥ ६५ ॥
चाषगत—यदि 'चाषगत' चारी के पादों से गोल घुमाव लेकर मण्डल
बनाए तो इसे चाषगत नामक मण्डल जानों। इसकी बाहुयुद्ध में योजना
की जाए ॥ ६५ ॥
नानाचारीसमुत्थानि मण्डलानि समासतः ।
उक्तान्यतः परंश्चैव समचारीं३ नियोजयेत् ॥ ६६ ॥
समचारी-प्रयोगो यस्तत् समं नाम मण्डलम् ।
आचार्यबुद्ध्या तानीह कर्तव्यानि प्रयोक्तृभिः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार अनेक चारियों के द्वारा निर्मित इन 'मण्डलों' को मैंने
संक्षेप में बतलाया। अब 'समचारी' मण्डल के बारे में सुनिये ।
जिसमें सम चारियों का निरन्तर प्रयोग हो उसे 'सम (चारी) मण्डल'
जानों। नाट्याचार्य द्वारा निर्देशित विधाओं के अनुसार इनका प्रयोग
किया जाए ।
एतानि खण्डानि समण्डलानि युद्धे नियुद्धे च परिक्रमे च ।
लीलाङ्कमाधुर्यपुरस्कृतानि कार्याणि वाद्यानुगतानि तज्ज्ञैः ॥ ६८ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे मण्डलविकल्पनं नाम द्वादशोऽध्यायः४
इस प्रकार इन मण्डलों को युद्ध, बाहुयुद्ध तथा घूमने में लीलापर्ण,
तथा सुमधुर अंगों का प्रदर्शन करते हुए प्रदर्शित किया जाए तथा वाद्यों
की संगत के साथ इनका प्रदर्शन रखे ॥ ६८ ॥
भरतनाट्यशास्त्र का मण्डल विधान नामक द्वादश अध्याय समाप्त
१. परिभ्राम्य—ग० । २. चारिमण्डलम्—ग० ।
३. समचारीणि योजयेत्—ग० । ४. एकादशोऽध्यायः—क० ।

त्रयोदशोऽध्यायः
गतिप्रचार
एवं व्यायामसंयोगे$^१$ कार्यं मण्डलकल्पनम् ।
अतः परं$^२$ प्रवक्ष्यामि गतीस्तु$^३$ प्रकृतिस्थिताः ॥ १ ॥
चारियों के समुदाय से बनने वाले मण्डलों की विधि पिछले अध्याय
में हम बतला आए हैं। अब यहां अभिनय के समय किये जाने वाली
पात्रों की गतियों का$^१$ वर्णन किया जा रहा है ॥ १ ॥
पात्रों का रंगमंच पर प्रवेश—
तत्रोपवहनं$^४$ कृत्वा भाण्डवाद्यपुरस्कृतम् ।
यथामार्गरसोपेतं$^५$ प्रकृतीनां प्रवेशने$^६$ ॥ २ ॥
ध्रुवायां सम्प्रवृत्तायां पटे चैवापकर्षिते$^७$ ।
कार्यः प्रवेशः पात्राणां नानार्थरससम्भवः ॥ ३ ॥
जब विविध वाद्यवादन के साथ मार्ग, कला एवं रसानुकूल-विचार को
ध्यान में रखते हुए उपोहन-क्रिया$^२$ सम्पन्न हो चुकी हो, ध्रुवागान आरम्भ
१. आचार्य अभि० का मत है कि पात्रों की यह गतियाँ उनके स्वरूप,
अवस्था रस, देश एवं काल को ध्यान में रखते हुए निर्देशित करना चाहिए ।
( दृष्ट-गतिश्च प्रकृतिं रसमवस्थां देशं कालञ्चापेक्ष्य वक्तव्या (अभि० भा०
Vol II पृ० १२९) .
२. उपवहन शब्द उपोहन शब्द का समानार्थक है। उपोहन क्रिया का वर्णन
नाट्यशास्त्र खण्ड १ के पृष्ठ २०२ (अध्याय ५।१८४ की टिप्पणी) पर दिया जा
चुका है। आचार्य अभिनव ने उपोहन की व्याख्या करते हुए कहा है—'उपोद्यन्ते
समासव्यासतः पदकालतालमभिहिताः स्वरा यस्मिन्नङ्गे तत्तथोक्तम् ।' (Vol I
पृ० १८४) अर्थात् ध्रुवागान में रागप्रकाशनार्थ स्थायी स्वर पर आश्रित
शुष्काक्षरों का परिग्रह और लघु आदि मात्रिक काल को व्यक्त करने के लिए
१. सञ्जातं—क० । २. ऊर्ध्वं—क० ।
३. गतिं तु प्रकृतिस्थिताम्—क० । ४. तत्रोपवाहनं—ख० ।
५. यथामार्गकलोपेतं—क० । ६. प्रवेशनम्—ग० ।
७. अवघर्षिते, अपघट्टिते—क०, अपकर्षिता—ख०, अवकर्षिते, अवघट्टिते—ग० ।

१२८ नाट्यशास्त्रम्
हो चुका हो एवं जवनिका को हटाया जा चुका हो तो ऐसे अवसर पर
अनेक अर्थ एवं रसों को उत्पन्न करने वाला पात्र-प्रवेश रंगमंच पर किया
जाता है ॥ २-३ ॥
(रंगमंच पर प्रवेश के समय) उत्तम तथा मध्यमपात्रों की शारीरभङ्गिमा—
स्थानन्तु वैष्णवं कृत्वा ह्युत्तमे मध्यमे पुनः ।
समुन्नतं समञ्चैव चतुरस्तमुरस्तथा ॥ ४ ॥
बाहुशीर्षे प्रसन्ने च नात्युत्क्षिप्ते च कारयेत् ।
ग्रीवाप्रदेशः कर्तव्यो मयूराञ्चित-मस्तकः ॥ ५ ॥
कर्णादष्टाङ्गुलस्थे च बाहुशीर्षे प्रयोजयेत् ।
उरसश्चापि चिबुकं चतुरङ्गुलसंस्थितम् ॥ ६ ॥
हस्तौ तथैव कर्तव्यौ कटिनांभितटस्थितौ ।
दक्षिणो नाभिसंस्थस्तु वामः कटितटे स्थितः ॥ ७ ॥
रंगमंच पर प्रवेश के समय उत्तम तथा मध्यमपात्र वैष्णवस्थान
(अ० ११।५२, ५३) में स्थित रहते हैं । इस समय उनकी छाती सम,
ताल का परिग्रह ही उपोहन है जिससे गीत आरम्भ होता हो। इसकी व्युत्पत्ति
है—उपोद्यन्ते प्रयोगसूचनाभिनयद्वारेण सूच्यते यत्र तदुपोहनम् । (अभि० भा०
Vol IV पृ० २१६) अर्थात् जिसमें प्रयोग या अभिनय के मध्य होने वाली
वस्तु या कलिका के मध्य स्वर तथा कला के नियमनार्थ किया जाने वाला जो
आलाप हो वही उपोहन है । (उपोहन के विषय में ना० शा० ३१।१३ तथा
वहाँ का विवेचन दृष्टव्य । इसके अतिरिक्त सङ्गीतरत्नाकर तालाध्याय में ५।५९ पर
चतुर कल्लिनाथ का व्याख्यान भी दृष्टव्य है (ह० संगी० र० अड्यार सं० पृष्ठ
३१-३२)
१. कार्यमुत्तमे—क० । २. नाभ्युत्क्षिप्ते—ख० ।
३. ग्रीवाप्रवेशः—ख० । ४. मयूराङ्कितमस्तकः—ख० ।
५. कर्णाभ्यां बाहुशिरसी स्यातामष्टाङ्गुलस्थिते—क०, कर्णादष्टाङ्गुलिस्ये
च—ग० । ६. च कारयेत्—क० ।
७. उरसश्चापि देशाच्च चिबुकं चतुरङ्गुलम्—क०, ऊरुदेशश्च चिबुकं—ग० ।
८. सम्मितम्—क० ।
९. कटिं नाभिं तु संस्थितौ—क, कटीनाभि—ग० ।
१०. कटितस्थितः—क०, कटितकेस्थितः—ख० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १२९
ऊँची उठी हुई तथा चतुरस्र रहती है, बाहु तथा मस्तक उन्नत, गला मोर
के समान सुन्दर तथा प्रसन्न; बाहु, कान तथा मस्तक से आठ अंगुल दूर,
वक्षःस्थल से ढुड्डी चार अंगुल ऊँची और दाहिना तथा बायाँ हाथ क्रमशः
नाभि तथा कटि पर स्थित होना चाहिए ॥ ४-७ ॥
पादों की ताल, कला और लय विधान—
पादयोरन्तरं कार्यं द्वौ तालावर्धमेव च ।
पादोत्क्षेप¹स्तु कर्तव्यः स्वप्रमाणविनिर्मितः ॥ ८ ॥
चतुस्तालो द्विता²लश्चाप्येक³तालस्तथैव च ।
( ऊपर वर्णित स्थिति में ) पात्र अपने पैर ढाई ताल के अन्तर से
उठाए तथा अपने डगों को हाथों के माप के अनुसार, दो तथा एक ताल
के अन्तर से पृथ्वी पर रखें ॥ ८-९ ॥
चतुस्तालस्तु देवानां पार्थि न व च ॥ ९ ॥
द्वितालश्चैव मध्यानां तालः स्त्रीनीचलिङ्गिनाम्⁴ ।
देवता तथा राजा आदि उत्तम पात्रों को चार ताल के, मध्यम पात्रों
को दो ताल के तथा स्त्री तथा नीचपात्रों को एक ताल के अन्तर से डग
( पृथ्वी पर ) रखना चाहिए ॥ ९-१० ॥
⁵चतुष्कलोऽथ द्विकलस्तथा ह्येककलः पुनः ॥ १० ॥
चतुष्कलो ह्युत्तमानां मध्यानां द्विकलो भवेत् ।
तथा चैक⁶कलः पातो⁷ नीचानां सम्प्रकीर्तितः ॥ ११ ॥
कला—इन डगों का पात्रानुसार चार कला, दो कला तथा
एक कला का प्रमाण रखा जाता है । उत्तम पात्रों का चार कला,
मध्यम पात्रों का दो कला तथा अधम पात्रों का एक कला का समय समझना
चाहिए ॥ १०-११ ॥
⁸स्थितं मध्यं द्रुतश्चैव समवेक्ष्य⁹ लयं बुधः ।
यथाप्रकृति नाट्यज्ञो ¹⁰गतिमेवं प्रयोजयेत् ॥ १२ ॥

१. पादक्षेपस्तु—ख०, पादोत्क्षेपश्च—ग० ।
२. द्वितीयश्च—क० । ३. तथा स्यादेकतालकः—क० ।
४. स्त्रीणाञ्च लिङ्गिनाम्—क०, स्त्रीनीचसङ्गिनाम्—ख०-ग० ।
५. पद्यार्धमिदं ख०-पुस्तके प्रक्षिप्तम् । ६. चैष कलः पातो—ख० ।
७. पादो—ग० । ८. स्थिरं मध्यं समं—क० ।
९. समवेक्ष्य लयत्रयम्—ग० । १०. गतिमेव—क० ।
६ ना० शा० द्वि०

१३० नाट्यशास्त्रम्
पात्रों की गति (उनकी स्थिति के अनुसार) स्थित, मध्य तथा द्रुत
लय में रखनी चाहिए। इन विविध लयों की नाट्याचार्य स्वयं
औचित्यानुसार (पात्रों में) योजना करे ॥ १२ ॥
स्थैर्योपपन्ना¹ गतिरुत्तमानां
मध्या गतिर्मध्यमसम्मतानाम्² ।
द्रुता गतिश्च प्रकृताधमानां³
लयत्रयं सत्त्ववशेन योज्यम् ॥ १३ ॥
उत्तम पात्रों की गति (चार कला या) स्थित लय में, मध्यम पात्रों की
(दो कला या) मध्यलय तथा अधम पात्रों की (एक कला या) द्रुत लय
में उनके सामर्थ्यानुसार संयोजित करना चाहिए ॥ १३ ॥
एष एवं⁴ तु विज्ञेयः कलाताललये विधिः ।
पुनर्गतिप्रचारस्य⁵ प्रयोगं शृणुतानघाः ॥ १४ ॥
इस प्रकार पात्रों के गति में होनेवाले ताल, लय तथा कला के नियम
मैंने बतलाए। अब मैं (विभिन्न पात्रों के उपयुक्त) गतियों के विशिष्टलक्षण,
योजना आदि को बतलाता हूँ ॥ १४ ॥
स्वाभाविक गति—
स्वभावे⁶ तूत्तमगतौ कार्यं⁷ जानु कटीसमम् ।
युद्धचारीप्रयोगेषु पुनस्तनसमं⁸ न्यसेत् ॥ १५ ॥
उत्तम पात्र की स्वाभाविक गति में घुटने को कमर के बराबर रखा
जाए तथा युद्ध में प्रयुक्त चारी (के समय) घुटने को छाती के सामने तक
(उठा कर) ले जाया जाए ॥ १५ ॥
पाश्र्वक्रान्तैः सललितैः पादैर्वाद्यान्वितैरथ ।
रङ्गकोणोन्मुखं¹⁰ गच्छेत् सम्यकपञ्चपदानि तु ॥ १६ ॥
१. धैर्येपपन्ना—क०; ग० । २. संस्थितानाम्—क० ।
३. प्रचुराधमानाम्—क०, ख० । ४. एव भुविज्ञेयः—ख० ।
५. पुनर्गति प्रचारस्थ—ग० । ६. स्वभावै—क०, ग० ।
७. कार्या—क० ।
८. पुनः स्तनसमं भवेत्—ख०, जानुस्तनसमं भवेत्—ग० ।
९. पार्श्वक्रान्तैः—क० । १०. कोणोन्मुखो—क०, ग० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १३१
वामवेधं ततः कुर्याद्विक्षेपं दक्षिणेन च ।
परिवृत्य द्वितीयन्तु गच्छेत् कोणं ततः परम् ॥ १७ ॥
तत्रापि वामवेधस्तु विक्षेपो दक्षिणेन च ।
ततो भाण्डोन्मुखो गच्छेत्तान्येवं तु पदानि च ॥ १८ ॥
एवं गतागतैर्गत्वा पदानामेकविंशतिम् ।
वामवेधं ततः कुर्याद्विक्षेपं दक्षिणस्य च ॥ १९ ॥
वह पार्श्वक्रान्ता चारी में वाद्यवादन के साथ सुन्दरतापूर्वक पैरों को
रखते हुए रङ्गमञ्च के कोने की ओर पाँच डग भरे । फिर वह 'सूची' चारी
को बाएँ पैर को आगे रखते हुए प्रदर्शित करे तथा दाहिने पैर को पीछे
रख कर 'विक्षेप' को प्रस्तुत करे; फिर (गोल) घूमकर दूसरे कोने की
ओर पाँच डग भरे और बाएँ पैर को आगे रखते सूचीचारी को तथा
दाहिने पैर को उसके पीछे रखकर 'विक्षेप' को प्रदर्शित करे; फिर गोल
घुमाव लेकर वाद्यों की ओर बढ़ते हुए इसी प्रकार पाँच डग भरे । इस
प्रकार आने-जाने में होने वाली डगों की इक्कीस संख्या को पूरी कर वह
बाँए पैर से 'सूची' चारी को तथा उसके पीछे दाहिने पैर को रखकर पुनः
विक्षेप का प्रदर्शन करे ॥ १६-१९ ॥
रङ्गे विकृष्टे भरतेन कार्यो गतागतः पादगतिप्रचारः ।
त्र्यश्रस्त्रिकोणे चतुरस्ररङ्गे गतिप्रचारश्चतुरस्र एव ॥ २० ॥
'विकृष्ट' नाट्यगृह में अभिनेता अपने पैरों की डग आने-जाने वाली
तथा विस्तीर्ण रखे, त्र्यस्रनाट्यगृह में वही चारी (त्रिकोणाभिमुखी या) तिरछी
और चतुरस्र नाट्यगृह में पैरों की डग चतुरश्र प्रकार वाली रखनी चाहिए ॥
यः समैः सहितो गच्छेत्तत्र कार्यो लयाश्रयः ।
चतुष्कलोऽथ द्विकलस्तथैवैककलः पुनः ॥ २१ ॥
जब अभिनेता समगति में अपने समानस्थितिवाले पात्रों के साथ
चल रहा हो तो उसकी गति की लय (उसकी प्रकृति तथा विधि के
अनुसार) चार, दो या एक कला के अनुसार रखी जाए ॥ २१ ॥
१. दक्षिणस्य च—क० । २. तान्येव विपदानि च—ख०; ग० ।
३. गतागतैः कृत्वा—ख०; ग० । ४. विंशतिः—क० ।
५. दक्षिणेन च—ख० । ६. त्र्यस्रे त्रिकोणे—ग० ।
७. द्विकलो भवेदेककलः—ग० ।

१३२ नाट्यशास्त्रम्
अथ मध्यमनीचैस्तु गच्छेद्यः परिवारितः ।
चतुष्कलमथोर्द्ध्वञ्च¹ तथा चैककलं पुनः ॥ २२ ॥
किन्तु जब कोई (अभिनेता) मध्य तथा नीच प्रकृति के पात्रों के
साथ चले तो (इस वर्ग की गति के समय) लय को चार, दो तथा एक
कला वाली (स्थिति या योग्यतानुसार) रखी जाय ॥ २२ ॥
देव²-दानव-यक्षाणां नृपपन्नगरक्षसाम् ।
चतुस्तालप्रमाणेन कर्त्तव्याथ गतिर्बुधैः ॥ २३ ॥
देव, दानव, नाग, राक्षस, यक्ष तथा राजा (जैसे उत्तम पात्रों) की
गति चारताल के प्रमाणवाले डग भरते हुए रहना चाहिए ॥ २३ ॥
दिवौकसान्तु सर्वेषां³ मध्यमा गतिरिष्यते ।
तत्रापि चो⁴द्धृता ये तु तेषां देवैः समा गतिः ॥ २४ ॥
स्वर्ग के (सभी प्रकृति के) देवताओं की मध्यमा गति होती है। पर
उनमें भी जो उद्धत प्रकृति के पात्र हों उनकी गति देवताओं के समान
प्रमाणवाली रखी जाए ॥ २४ ॥
पात्रानुसारी गति—
ऋषयः ऊचुः—
यदा मनुष्या राजानस्तेषां दैव⁶गतिः कथम् ।
अत्रोच्यते⁵ कथं नैषा गतिं⁷ राज्ञां भविष्यति ॥ २५ ॥
अथ⁸ दिव्या प्रकृतयो दिव्यमा⁹नुष्य एव च ।
मानुष्यं¹⁰ इति विज्ञेया नाट्यवृत्तिक्रियां¹¹ प्रति ॥ २६ ॥
देवानां¹² प्रकृतिर्दिव्या राज्ञां¹³ वै दिव्यमानुषी ।
यात्वन्या लोकविदिता मानुषी सा प्रकीर्तिता ॥ २७ ॥
१. अथोर्द्ध्वञ्च—ख०, ग० । २. दैत्य—ख० ।
३. शेषाणां—क० । ४. चोर्द्ध्वगा—ख०, ग० ।
५. अत्राह—ग० । ६. तथा दैवगतिः—क० । ७. गते—क० ।
८. इह प्रकृतयो दिव्या—ख० ग० ।
९. तथा च दिव्यमानुषी—ख०, ग० । १०. मानुषी चेति—ख०, ग० ।
११. नाट्यस्य प्रक्रियां—क०, नाट्यनृत्तक्रियां—ख० ।
१२. देवा हि—ख० । १३. राजानो—ख० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १४३
देवांशाजास्तु १ राजानो वेदाध्यात्मसु २ कीर्तिताः ।
एवं देवानुकरणे ३ दोषो ह्यत्र ४ न विद्यते ॥ २८ ॥
ऋषियों ने भरतमुनि से पूछा कि राजा के मनुष्य पात्र के रूप में रहने
पर उसकी दिव्य—पात्रों जैसी गति क्यों रखी जाती है ? उत्तर—राजाओं
की देवगण के समान गति रखने में क्या अड़चन है ? क्योंकि रूपकों में,
दिव्यमानुष तथा मानुष-पात्र होते हैं। इनमें देवताओं की दिव्य, राजाओं
की दिव्यमानुष तथा शेष लोक सुलभ ( प्रसिद्ध ) पात्रों की मानुषी-प्रकृति
मानी गई है। वेद तथा वेदान्त-( अध्यात्म ) शास्त्र में राजा को देवों के
अंश से उत्पन्न माना गया है; इसलिए 'राजा' की दिव्यपात्र जैसी गति
रखने में कोई हानि नहीं समझना चाहिए ॥ २५-२८ ॥
अयं विधिस्तु कर्त्तव्यः ५ स्वच्छन्दगमनं प्रति ।
सम्भ्रमोत्पातरोषेषु प्रमाणं न विधीयते ॥ २९ ॥
यह विधान साधारण ( सामान्य ) गति के लिए हैं। आवेग, उत्पात
तथा क्रोध की दशा में (पात्रों की) गति के कोई नियम नहीं रहते हैं ॥२९॥
विशेष अवस्थाओं में पात्रों की गति—
सर्वासां प्रकृतीनान्तु अवस्थान्तरसंज्ञया ।
उत्तमाधममध्यानां ६ गतिः कार्या प्रयोक्तृभिः ॥ ३० ॥
( किन्तु ) नाट्य विधायक जन सभी पात्रों की—जो कि उत्तम, मध्यम
तथा अधम प्रकृति के हों उनकी अवस्थाओं को देखकर तदनुसार 'गति'
को रखें ॥ ३० ॥
चतुरर्द्धकलं ७ वा स्यात्तदर्धकलमेव च ।
अवस्थान्तर ८ मासाद्य कुर्याद्गतिविचेष्टितम् ॥ ३१ ॥
विशेष अवस्था में इन उत्तमादि पात्रों की गति का समय चार कलाओं
का, उसका आधा (दो कला) तथा उसके अर्धभाग का आधा ( एक कला )
रखना चाहिए ॥ ३१ ॥
१. देवाम्बजास्तु—ख०, ग० । २. वेदाध्यात्मप्रकीर्तिताः—ग० ।
३. देवानुसरणे—क० । ४. देवो—ख० ।
५. विधेयः—क० । ६. मध्योत्तमाधमानाञ्च—ग० ।
७. चतुर्थेककलं चा—क०, चतुरर्धकलंञ्च—ख० । ८. अथवान्तर—क० ।

१३४ नाट्यशास्त्रम्
ज्येष्ठे चतुष्कलं यत्र मध्यमे द्विकलं भवेत् ।
द्विकला चोत्तमे यत्र मध्ये त्वेककला भवेत् ॥ ३२ ॥
( विभिन्न पात्रों से सम्बद्ध उनके समय तथा गतियों की विशिष्ट
अवस्थाओं में ) उत्तम पात्र की गति चार कला के प्रमाणवाली, मध्यम पात्र
की दो कला की गति तथा अधम पात्र की गति एक कला की
होती है परन्तु जब उत्तमपात्र की दो कला की हो तो मध्यमपात्र की एक
कला के प्रमाण की गति रखना चाहिए ॥ ३२ ॥
कँलिकं मध्यमे यत्र नीचेष्वर्द्धकलं भवेत् ।
एवमर्द्धार्द्धहीनन्तु कलानां सम्प्रयोजयेत् ॥ ३३ ॥
तथा जब मध्यम पात्र की एक कला की गति हो तो अधम पात्र की
आधी कला की रहती है। इस प्रकार विशेष अवस्थाओं में कला का
परिमाण आधा-आधा कर दिया जाता है ॥ ३३ ॥
उत्तमानां गतिर्या तु न तां मध्येषु योजयेत् ।
मध्यमानां गतिर्या तु न तां नीचेषु योजयेत् ॥ ३४ ॥
उत्तम पात्रों की गति की मध्यम पात्र तथा मध्यम पात्र की गति की
अधम पात्र में योजना नहीं करना चाहिए ॥ ३४ ॥
( विशेष दशा में ) गतियों का लय-विधान—
त्वरार्त्ते च क्षुधार्त्ते च तपः श्रान्ते भयान्विते ।
विस्मये चावहित्ये च तथौत्सुक्यसमन्विते ॥ ३५ ॥
शृङ्गारे चैव शोके च स्वच्छन्दगमने तथा ।
गतिः स्थितलया कार्याधिकलान्तरपातिता ॥ ३६ ॥
पुनश्चिन्तान्विते चैव गतिः कार्या चतुष्कला ।
१. विकला—क०, विकलं चोत्तमा यत्र—ख०, ग० ।
२. नीचेष्वर्द्धकलं भवेत्—ख०, ग० ।
३. श्लोकार्धमेतत् ख०, म० पुस्तकयोर्नास्ति ।
४. मर्द्धार्द्धहानिं तु—ख०, ग० । ५. पद्यमेतत्—क० पुस्तकेऽत्र नास्ति ।
६. विक्षते—क० ।
७. गतिः स्थितलया कार्या विफलान्तरपातिना—ख० ग० ।
८. श्लोकार्धमेतत्—ख० पु० नास्ति ।

त्रयोदशोऽध्यायः १३५
ज्वर-ग्रस्त, क्षुधार्त, श्रान्त, भयभीत व्यक्ति की तथा विस्मय,
अवहित्था, औत्सुक्य, शृङ्गार रस (विप्रलम्भ इष्ट है) तथा शोक की
अवस्थाओं में स्थित (विलम्बित) लय में गति रखते हैं—जिसमें चारकलो
से अधिक समय लगता हो (या कम से कम चार कला का समय लगे)
किन्तु सचिन्तायुक्त-दशा में गति चार कला प्रमाणवाली ही रहना चाहिए ॥
अस्वस्थकामिते चैव भये² वित्रासिते तथा ॥ ३७ ॥
आवेगे चैव हर्षे च कार्ये यच्च त्वरान्वितम् ।
अनिष्टश्रवणे चैव क्षेपे⁴ चाद्भुतदर्शने ॥ ३८ ॥
अपि चात्ययिके कार्ये दुःखिते शत्रुमार्गणे ।
अपराद्धानुसरणे⁶ श्वापदानुगतौ⁷ तथा ॥ ३९ ॥
एतेष्वेवं⁸ गतिं प्राज्ञो द्विकलां सम्प्रयोजयेत् ।
प्रच्छन्न-कामिता, (अस्वस्थकामिता) भय, व्यग्रता (वित्रास),
आवेग, हर्ष, शीघ्रता के कार्य, अनिष्ट-श्रवण, निन्दा, अद्भुत-दर्शन,
आवश्यक कार्य, दुःख, शत्रु के ढूँढ़ने, अपराधी का पीछा करने तथा शिकार
के पीछे पड़ने की दशा में ऐसे पात्रों की दो कला की गति बुद्धिमान्
निर्देशक द्वारा संयोजित की जाए ॥ ३७-४० ॥
गतिः शृङ्गारिणी कार्या स्वस्थे¹⁰कामितसम्भवा ॥ ४० ॥
१. आचार्य अभिनवगुप्त ने यहाँ अधिकलान्तरपातिता पद की व्याख्या में
बतलाया कि यहाँ अधिकलान्तरपातिता में अधि शब्द का अर्थ आधिक्यपरक होता
है। यह आधिक्य उत्कर्ष है जो चार कला के प्रमाण की गति से बिलम्बित लय
में पैरों का रखना है। यह प्लुत जैसे स्वर या विराम के आधिक्य में ताल के
बोध का सूचक है। इसका आशय यह कि पाद-पात में छः या आठ कलाओं के
अन्तर से रखी जाने वाली गति या डग का भी आधिक्यपरक स्थिति में ग्रहण
हो सकता है परन्तु ऐसी गतियाँ स्त्री पात्रों में संयोजित नहीं करना चाहिए।
१. अस्वस्थे कामिते—ख०, ग० ।
२. भयाद्वित्रा—क०, भयवित्रा—क० । ३. यच्चतुरान्विते—क० ।
४. कोपेष्याद्भुतदर्शने—ग० । ५. तथा चैवारिमार्गणे—ख० ।
६. अवरुद्धानुकरणे, अपराद्धानुकरणे—क०, अपराध्वानुसरणे—ग० ।
७. नुगते—ख०, ग० । ८. एतेष्वेव—क० ।
९. विकलां—क० । १०. स्वच्छकामित—ख०, ग० ।