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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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१२८ नाट्यशास्त्रम्
हो चुका हो एवं जवनिका को हटाया जा चुका हो तो ऐसे अवसर पर
अनेक अर्थ एवं रसों को उत्पन्न करने वाला पात्र-प्रवेश रंगमंच पर किया
जाता है ॥ २-३ ॥
(रंगमंच पर प्रवेश के समय) उत्तम तथा मध्यमपात्रों की शारीरभङ्गिमा—
स्थानन्तु वैष्णवं कृत्वा ह्युत्तमे मध्यमे पुनः ।
समुन्नतं समञ्चैव चतुरस्तमुरस्तथा ॥ ४ ॥
बाहुशीर्षे प्रसन्ने च नात्युत्क्षिप्ते च कारयेत् ।
ग्रीवाप्रदेशः कर्तव्यो मयूराञ्चित-मस्तकः ॥ ५ ॥
कर्णादष्टाङ्गुलस्थे च बाहुशीर्षे प्रयोजयेत् ।
उरसश्चापि चिबुकं चतुरङ्गुलसंस्थितम् ॥ ६ ॥
हस्तौ तथैव कर्तव्यौ कटिनांभितटस्थितौ ।
दक्षिणो नाभिसंस्थस्तु वामः कटितटे स्थितः ॥ ७ ॥
रंगमंच पर प्रवेश के समय उत्तम तथा मध्यमपात्र वैष्णवस्थान
(अ० ११।५२, ५३) में स्थित रहते हैं । इस समय उनकी छाती सम,
ताल का परिग्रह ही उपोहन है जिससे गीत आरम्भ होता हो। इसकी व्युत्पत्ति
है—उपोद्यन्ते प्रयोगसूचनाभिनयद्वारेण सूच्यते यत्र तदुपोहनम् । (अभि० भा०
Vol IV पृ० २१६) अर्थात् जिसमें प्रयोग या अभिनय के मध्य होने वाली
वस्तु या कलिका के मध्य स्वर तथा कला के नियमनार्थ किया जाने वाला जो
आलाप हो वही उपोहन है । (उपोहन के विषय में ना० शा० ३१।१३ तथा
वहाँ का विवेचन दृष्टव्य । इसके अतिरिक्त सङ्गीतरत्नाकर तालाध्याय में ५।५९ पर
चतुर कल्लिनाथ का व्याख्यान भी दृष्टव्य है (ह० संगी० र० अड्यार सं० पृष्ठ
३१-३२)
१. कार्यमुत्तमे—क० । २. नाभ्युत्क्षिप्ते—ख० ।
३. ग्रीवाप्रवेशः—ख० । ४. मयूराङ्कितमस्तकः—ख० ।
५. कर्णाभ्यां बाहुशिरसी स्यातामष्टाङ्गुलस्थिते—क०, कर्णादष्टाङ्गुलिस्ये
च—ग० । ६. च कारयेत्—क० ।
७. उरसश्चापि देशाच्च चिबुकं चतुरङ्गुलम्—क०, ऊरुदेशश्च चिबुकं—ग० ।
८. सम्मितम्—क० ।
९. कटिं नाभिं तु संस्थितौ—क, कटीनाभि—ग० ।
१०. कटितस्थितः—क०, कटितकेस्थितः—ख० ।