नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 238, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः
गतिप्रचार
एवं व्यायामसंयोगे$^१$ कार्यं मण्डलकल्पनम् ।
अतः परं$^२$ प्रवक्ष्यामि गतीस्तु$^३$ प्रकृतिस्थिताः ॥ १ ॥
चारियों के समुदाय से बनने वाले मण्डलों की विधि पिछले अध्याय
में हम बतला आए हैं। अब यहां अभिनय के समय किये जाने वाली
पात्रों की गतियों का$^१$ वर्णन किया जा रहा है ॥ १ ॥
पात्रों का रंगमंच पर प्रवेश—
तत्रोपवहनं$^४$ कृत्वा भाण्डवाद्यपुरस्कृतम् ।
यथामार्गरसोपेतं$^५$ प्रकृतीनां प्रवेशने$^६$ ॥ २ ॥
ध्रुवायां सम्प्रवृत्तायां पटे चैवापकर्षिते$^७$ ।
कार्यः प्रवेशः पात्राणां नानार्थरससम्भवः ॥ ३ ॥
जब विविध वाद्यवादन के साथ मार्ग, कला एवं रसानुकूल-विचार को
ध्यान में रखते हुए उपोहन-क्रिया$^२$ सम्पन्न हो चुकी हो, ध्रुवागान आरम्भ
१. आचार्य अभि० का मत है कि पात्रों की यह गतियाँ उनके स्वरूप,
अवस्था रस, देश एवं काल को ध्यान में रखते हुए निर्देशित करना चाहिए ।
( दृष्ट-गतिश्च प्रकृतिं रसमवस्थां देशं कालञ्चापेक्ष्य वक्तव्या (अभि० भा०
Vol II पृ० १२९) .
२. उपवहन शब्द उपोहन शब्द का समानार्थक है। उपोहन क्रिया का वर्णन
नाट्यशास्त्र खण्ड १ के पृष्ठ २०२ (अध्याय ५।१८४ की टिप्पणी) पर दिया जा
चुका है। आचार्य अभिनव ने उपोहन की व्याख्या करते हुए कहा है—'उपोद्यन्ते
समासव्यासतः पदकालतालमभिहिताः स्वरा यस्मिन्नङ्गे तत्तथोक्तम् ।' (Vol I
पृ० १८४) अर्थात् ध्रुवागान में रागप्रकाशनार्थ स्थायी स्वर पर आश्रित
शुष्काक्षरों का परिग्रह और लघु आदि मात्रिक काल को व्यक्त करने के लिए
१. सञ्जातं—क० । २. ऊर्ध्वं—क० ।
३. गतिं तु प्रकृतिस्थिताम्—क० । ४. तत्रोपवाहनं—ख० ।
५. यथामार्गकलोपेतं—क० । ६. प्रवेशनम्—ग० ।
७. अवघर्षिते, अपघट्टिते—क०, अपकर्षिता—ख०, अवकर्षिते, अवघट्टिते—ग० ।