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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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१२० नाट्यशास्त्रम्
से अतिक्रान्ता चारी को और ) फिर दाहिने पैर से ‘अपक्रान्ता चारी’
तथा बाएं पैर से अतिक्रान्ता चारी को प्रदर्शित कर ‘भ्रमरी को
( त्रिक परिवर्तन द्वारा ) प्रदर्शन किया जाए तो अलात मण्डल
कहलाता है ॥ २७-२८ ॥
सूचीमाद्यक्रमं कृत्वा ह्यपक्रान्तश्च वामकम् ।
आद्यो दण्डक्रमश्चैव सूची¹ कार्यस्तु वामकः ॥ ३० ॥
कार्यस्त्रिकविवर्तश्च पार्श्वक्रान्तश्च दक्षिणः ।
आक्षिप्तं वामकं कुर्याद् दण्डपादश्च दक्षिणः ॥ ३१ ॥
ऊरुद्वृत्तश्च तेनैव कर्तव्यं दक्षिणेन तु ।
सूची वामक्रमं³ कृत्वा त्रिकश्च परिवर्तयेत् ॥ ३२ ॥
अलातश्च भवेद्वामः पार्श्वक्रान्तश्च दक्षिणः ।
अतिक्रान्तः पुनर्वामो⁴ वामबन्धे तु मण्डले ॥ ३३ ॥
वाम-विद्ध ( वामबन्ध )—दाहिने पैर से ‘सूची’ चारी का तथा बाएं
पैर से अपक्रान्ता चारी का; फिर दाहिने पैर से दण्डपादा चारी का तथा
बाएं पैर से ‘सूची’ चारी का; फिर दाहिने पैर से भ्रमरी चारी को ( त्रिक
का घुमाव देकर ) प्रदर्शित कर पार्श्वक्रान्ता चारी का तथा दाहिने पैर से
दण्डपादा चारी का, फिर दाहिने पैर से ऊरुद्वृत्ता चारी तथा बाएं पैर से
सूची को प्रदर्शित कर ( त्रिक परिवर्तन द्वारा ) भ्रमरी चारी को प्रदर्शित
करे । फिर बाएं पैर से ‘अलाता’ चारी का तथा दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता
चारी का तथा बाएं पैर अतिक्रान्ता चारी का प्रदर्शन किया जाए तो
‘वामविद्ध’ मण्डल कहलाता है ॥ २९-३३ ॥
सूचीमाद्यक्रमं दद्या⁵दपक्रान्तश्च वामकम् ।
पार्श्वक्रान्तः पुनश्चाद्यो भुजङ्गत्रासितः स⁶ च ॥ ३४ ॥
अतिक्रान्तः पुनर्वाम आक्षिप्तो दक्षिणस्तथा ।
अतिक्रान्तः पुनर्वाम ऊरुद्वृत्त⁸स्तथैव च ॥ ३५ ॥
१. सूचीपादस्तु—ख० । २. दण्डपाश्वंल्लच—ग० ।
३. करञ्चैव—ग० । ४. कार्यो ललितसञ्चरः—ख० ।
५. कृत्वा अपक्रान्तं—ग० । ६. श्चान्यो—ख०; ग० ।
७. त्रासितं तथा—ख०; ग० । ८. ऊरुद्वृत्तं तथैव च—ग० ।