नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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आकाशिक मण्डल—लक्षण
१आद्यं पादञ्च जनितं कृत्वोद्वाहितमाचरेत् ।
अलातं वामकञ्चैव पार्श्वक्रान्तञ्च दक्षिणम् ॥ ७ ॥
सूचीं२ वामं पुनश्चैव त्रिकञ्च परिवर्तयेत् ।
तथा दक्षिणमुद्धृ³त्तमलातञ्चैव वामकम् ॥ ८ ॥
परिच्छिन्नन्तु कर्तव्यं बाह्यभ्रमरकेण तु ।
अतिक्रान्तं पुनर्वामं दण्डपादञ्च दक्षिणम् ॥ ९ ॥
४विज्ञेयमेतद् व्यायामे त्वतिक्रान्तन्तु मण्डलम् ।
अतिक्रान्त—यदि (आरंभ में) दाहिने पैर से 'जनिता' चारी प्रदर्शित
करें फिर शकटास्या चारी का जिसमें वक्षःस्थल उद्वाहित हो । फिर बाएँ
पैर से 'अलात' तथा दाहिने पैर से 'पार्श्वक्रान्ता' चारी का प्रदर्शन करे ।
फिर बाएँ पैर से 'सूची' और भ्रमरी चारी को कमर का घुमाव लेते हुए
प्रदर्शित करें । पुनः दाहिने पैर से उद्वाहित चारी तथा बाएँ पैर से अलात
चारी को प्रदर्शित कर उसे भ्रमरी चारी में परिवर्तित कर दें । फिर इसी बाएँ
पैर से अलातचारी और दाहिने पैर द्वारा दण्डपाद चारी का प्रदर्शन करने
पर यह (नृत्य) व्यायाम में होनेवाला अतिक्रान्तमण्डल हो जाता है ॥७-१०॥
आद्यन्तु जनितं कृत्वा तेनैव च निकुट्टनम् ॥ १० ॥
आस्पन्दितन्तु वामेन पार्श्वक्रान्तञ्च दक्षिणम् ।
वामं सूचीपदं दद्यादपक्रान्तञ्च दक्षिणम् ॥ ११ ॥
भुजङ्गत्रासितं वाममतिक्रान्तञ्च दक्षिणम् ।
५उद्वृत्तं दक्षिणञ्चैव ह्यलातञ्चैव वामकम् ॥ १२ ॥
पार्श्वक्रान्तं पुनः सव्यं सूची वामक्रमं तथा ।
विक्षेपो दक्षिणस्य स्यादपक्रान्तश्च वामकः ॥ १३ ॥
[ बाह्यभ्रमरकञ्चैव विक्षेपञ्चैव योजयेत् ]
विज्ञेयमेतद् व्यायामे विचित्रं नाम मण्डलम् ।
विचित्र—यदि दाहिने पैर को कंपाते हुए 'जनिता' चारी का प्रदर्शन
करे तथा उसे ही तलसंचर (निकुट्टक) पाद बनाए । फिर बाएँ पैर से
१. आद्यपादं तु तं कृत्वा उद्वाहितमथाचरेत्—ग० ।
२. सूचीपादं—ख०-ग० । ३. मुद्धृत्य अलातं—ख०-ग० ।
४. पद्यार्धमेतत् क-ख-पुस्तकयोः नास्ति ।
५. उद्वृत्तं—ख०-ग० । ६. दपक्रान्तञ्च वामकम्—ख०-ग० ।