नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished668 पृष्ठ
पृष्ठ 240, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 240त्रयोदशोऽध्यायः १२९
त्रयोदशोऽध्यायः १२९
ऊँची उठी हुई तथा चतुरस्र रहती है, बाहु तथा मस्तक उन्नत, गला मोर
के समान सुन्दर तथा प्रसन्न; बाहु, कान तथा मस्तक से आठ अंगुल दूर,
वक्षःस्थल से ढुड्डी चार अंगुल ऊँची और दाहिना तथा बायाँ हाथ क्रमशः
नाभि तथा कटि पर स्थित होना चाहिए ॥ ४-७ ॥
पादों की ताल, कला और लय विधान—
पादयोरन्तरं कार्यं द्वौ तालावर्धमेव च ।
पादोत्क्षेप¹स्तु कर्तव्यः स्वप्रमाणविनिर्मितः ॥ ८ ॥
चतुस्तालो द्विता²लश्चाप्येक³तालस्तथैव च ।
( ऊपर वर्णित स्थिति में ) पात्र अपने पैर ढाई ताल के अन्तर से
उठाए तथा अपने डगों को हाथों के माप के अनुसार, दो तथा एक ताल
के अन्तर से पृथ्वी पर रखें ॥ ८-९ ॥
चतुस्तालस्तु देवानां पार्थि न व च ॥ ९ ॥
द्वितालश्चैव मध्यानां तालः स्त्रीनीचलिङ्गिनाम्⁴ ।
देवता तथा राजा आदि उत्तम पात्रों को चार ताल के, मध्यम पात्रों
को दो ताल के तथा स्त्री तथा नीचपात्रों को एक ताल के अन्तर से डग
( पृथ्वी पर ) रखना चाहिए ॥ ९-१० ॥
⁵चतुष्कलोऽथ द्विकलस्तथा ह्येककलः पुनः ॥ १० ॥
चतुष्कलो ह्युत्तमानां मध्यानां द्विकलो भवेत् ।
तथा चैक⁶कलः पातो⁷ नीचानां सम्प्रकीर्तितः ॥ ११ ॥
कला—इन डगों का पात्रानुसार चार कला, दो कला तथा
एक कला का प्रमाण रखा जाता है । उत्तम पात्रों का चार कला,
मध्यम पात्रों का दो कला तथा अधम पात्रों का एक कला का समय समझना
चाहिए ॥ १०-११ ॥
⁸स्थितं मध्यं द्रुतश्चैव समवेक्ष्य⁹ लयं बुधः ।
यथाप्रकृति नाट्यज्ञो ¹⁰गतिमेवं प्रयोजयेत् ॥ १२ ॥
१. पादक्षेपस्तु—ख०, पादोत्क्षेपश्च—ग० ।
२. द्वितीयश्च—क० । ३. तथा स्यादेकतालकः—क० ।
४. स्त्रीणाञ्च लिङ्गिनाम्—क०, स्त्रीनीचसङ्गिनाम्—ख०-ग० ।
५. पद्यार्धमिदं ख०-पुस्तके प्रक्षिप्तम् । ६. चैष कलः पातो—ख० ।
७. पादो—ग० । ८. स्थिरं मध्यं समं—क० ।
९. समवेक्ष्य लयत्रयम्—ग० । १०. गतिमेव—क० ।
६ ना० शा० द्वि०