नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः १२१
अलातञ्च पुनर्वामः पार्श्वक्रान्तश्च दक्षिणः ।
१सूचीवामं पुनर्दद्यादपक्रान्तश्च दक्षिणः ॥ ३६ ॥
अतिक्रान्तः पुनर्वामः कार्यो ललित²सञ्चरः ।
एष पादप्र³चारस्तु ललिते मण्डले भवेत् ॥ ३७ ॥
ललित—यदि दाहिने पैर से सूची चारी का तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता
चारी का, फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता तथा भुजंगत्रासिता चारी का,
फिर बाएं से अतिक्रान्ता तथा दाहिने पैर से आक्षिप्ता का ) फिर बाएं
से अतिक्रान्ता तथा ऊरूद्वृत्ता चारी को प्रदर्शित कर फिर बाएं से अलात
तथा दाहिने पैर से अपक्रान्ता चारी का और फिर बाएं से अतिक्रान्ता
चारी का ललितगति से प्रदर्शन करने से 'ललित' मण्डल कहलाता है ॥
सूचीमाद्यक्रमं कृत्वा ह्यपक्रान्तञ्च वामकम् ।
पार्श्वक्रान्तं पुनश्चाद्यं वामं⁴ पार्श्वक्रमं तथा ॥ ३८ ॥
भ्रान्त्वा चारीभिरेताभिः पर्यायेणाथ मण्डलम् ।
वामं सूचीं ततो दद्यादपक्रान्तञ्च दक्षिणम् ॥ ३९ ॥
स्वभावगमने ह्येतन्मण्डलं संविधीयते ।
क्रान्तमेतत्तु विज्ञेयं नामतो नामयोक्तृभिः ॥ ४० ॥
क्रान्त—यदि दाहिने पैर से सूची तथा बाएँ पैर से अपक्रान्ता चारी का,
फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता चारी का तथा बाएं पैर से ही पार्श्वक्रान्ता
चारी को प्रस्तुत कर फिर इन्हीं चारियों के द्वारा क्रमशः सभी दिशाओं
में घुमाव लिया जाए। तब फिर बाएं पैर से 'सूची' का तथा दाहिने
पैर से अपक्रान्ता चारी का प्रदर्शन करे तो इस मण्डल को 'क्रान्त' मण्डल
जानो। इसकी स्वाभाविक गति में योजना की जाए क्योंकि इसकी यौगिक
अर्थ के द्वारा यही प्रतीति होती है ॥ ३८-४० ॥
एतान्याकाशगानीह⁵ ज्ञेयान्येवं दशैव तु ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि भौमानामपि लक्षणम् ॥ ४१ ॥
ये दस आकाशिक मण्डल कहे गए हैं। अब आगे मैं भौमिक मण्डलों
के लक्षण बतलाता हूं ॥ ४१ ॥
१. पद्यार्धमेतत् ख०-ग०-पुस्तकयोः नास्ति ।
२. ललितसंज्ञकः—ख० । ३. प्रसारस्तु—ख० ग० ।
४. इचान्यं वामपार्श्वं—ग० । ५. गामिनि—ख० ।