नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः १११९
समावर्त्य त्रिकञ्चैव दण्डपादं प्रसारयेत् ।
सूचीं वामपदं दद्यात् त्रिकञ्च परिवर्तयेत् ॥ २५ ॥
भुजङ्गत्रासितश्चाद्यो वामोऽतिक्रान्त एव च ।
एष चारी प्रयोगस्तु विहृते मण्डले भवेत् ॥ २६ ॥
विहृत—यदि दाहिने पैर द्वारा जनिता चारी का तथा इसी पैर द्वारा
तलसंचर पाद (निकुट्टन) का, फिर बाएं पैर से स्पन्दिता (आस्कन्दिता)
तथा दाहिने पैर से उद्वृत्ता चारी का, फिर बाएं पैर से अलात चारी का
और दाहिने पैर से सूची का, फिर बाएं पैर से पार्श्वक्रान्ता चारी का तथा
दाहिने पैर से आक्षिप्ता का प्रदर्शन कर भ्रमरी चारी प्रदर्शित करे फिर
एक घुमाव लेकर—या त्रिक को परिवर्तित कर दण्डपादा चारी, फिर
बाएं पैर से सूची और भ्रमरी चारी का (त्रिक को घुमाकर) प्रदर्शन करे
फिर दाहिने पैर से भुजंगत्रासिता चारी तथा बाएं पैर से अतिक्रान्ता
चारी का प्रदर्शन करने पर 'विहृत' मण्डल हो जाता है ॥ २३-२६ ॥
सूचीमाद्यक्रमं दद्यौदपक्रान्तञ्च वामकम् ।
पार्श्वक्रान्तः पुनश्चाद्यो ह्यलातश्चैव वामकः ॥ २७ ॥
<sup>७</sup>भ्रान्त्वा चारीभिरेताभिः पर्यायेणाथ मण्डलम् ।
षट्संख्यं सप्तसंख्यं वा ललितैः पादविक्रमैः ॥ २८ ॥
[ <sup>९</sup>आद्यं कुर्यादपक्रान्तमतिक्रान्तञ्च वामकम् । ]
<sup>१०</sup>अपक्रान्तः पुनश्चाद्यो वामोऽतिक्रान्त एव च ।
पादभ्रमरकश्च स्यादलाते खलु मण्डले ॥ २९ ॥
अलात—दाहिने पैर से 'सूची' चारी का तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता
चारी का, फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता चारी और बाएं पैर से अलाता
का फिर इन्हीं चारियों से क्रमशः ललितपाद विन्यासों द्वारा छः या सात
बार घुमाव लेना चाहिए । (प्रक्षिप्त-दाहिने पैर से अपक्रान्ता तथा बाएं
१. परिवृत्य—ग० । २. सूचीवामपदं—ग० । ३. विवृत्ते—ख० ।
४. सूचीमाद्यं क्रमं—ख० । ५. कृत्वा चापक्रान्तं—ग० ।
६. पार्श्वक्रान्तस्ततश्चान्योऽप्यलात—ग० ।
७. इतः प्रभृति सार्ध पद्यत्रयं ग०-पुस्तके नास्ति ।
८. तत् संख्यं—ख० ९. एतत् पद्यार्धं ख०-पुस्तके नास्ति ।
१०. अतिक्रान्तः—ख० ।