नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ नाट्यशास्त्रम्
भौमिक मण्डल—लक्षण—
आद्यस्तु जनितः कार्यो वामश्चास्पन्दितो भवेत् ।
शकटास्यः पुनश्चाद्यो वामश्चापि प्रसारितः ॥ ४२ ॥
आद्यो भ्रमरकः कार्यस्त्रिकश्च परिवर्त्तयेत् ।
आस्पन्दितः पुनर्वाम शकटास्यश्च दक्षिणः ॥ ४३ ॥
वामः पृष्ठापसर्पी च दद्याद् भ्रमरकं तथा।
स एवास्पन्दितः कार्यस्त्वेतद् भ्रमरमण्डलम् ॥ ४४ ॥
भ्रमर—यदि दाहिने पैर से 'जनिता' चारी तथा बाएं पैर से
'आस्कन्दिता' का, फिर दाहिने पैर से शकटास्या चारी को प्रदर्शित कर बाएं
पैर को फैला ले । फिर दाहिने पैर से भ्रमरी चारी का शरीर को घुमाव
देकर प्रदर्शन करे। फिर बाएं पैर से 'आस्कन्दिता' चारी का तथा दाहिने
पैर से 'शकटास्या चारी' का, फिर बाएं पैर से अपक्रान्ता चारी अपसर्पी
का और त्रिक को घुमाव देते हुए भ्रमरी चारी का प्रदर्शन करे तो भ्रमर
नामक मण्डल हो जाता है ॥ ४२-४४ ॥
आद्यो भ्रमरकः कार्यो वामश्चैवाड्डितो भवेत् ।
४कार्यस्त्रिकविवर्त्तश्च शकटास्यश्च दक्षिणः ॥ ४५ ॥
ऊरुद्वृत्तः स एव स्याद्वामश्चैवापसर्पितः ।
कार्यस्त्रिकविवर्त्तश्च दक्षिणः स्पन्दितो भवेत् ॥ ४६ ॥
शकटास्यो भवेद्वामस्तद्देवास्फोटनं भवेत् ।
एतदास्पन्दितं नाम व्यायामे युद्धमण्डलम् ॥ ४७ ॥
आस्पन्दित (आस्यन्दित)—यदि दाहिने पैर से 'भ्रमरी' चारी का
तथा बाएं पैर से 'अड्डिता' तथा पीठ को एक घुमाव देकर भ्रमरी चारी का,
फिर दाहिने पैर से 'शकटास्या' चारी का तथा पुनः 'ऊरूद्वृत्ता' चारी का,
फिर बाएं पैर से अतिक्रान्ता चारी (अपसर्पी) को प्रदर्शित करे और फिर
भ्रमरी को (पीठ को पूरा गोल घुमाव देकर) प्रदर्शित करे, फिर दाहिने
१. इचास्कन्दितो—ख०-ग० । २. आस्कन्दितः—ख०-ग० ।
३. एवास्कन्दितः—ख०-ग० ।
४. 'कार्यस्त्रिक' इत्यादि पद्यद्वयी ग०-पुस्तके नास्ति
५. स्कन्दितो—ख० । ६. तथैवा—ख० ।
७. दास्कन्दितं—ख०-ग० ।