नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 235, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ नाट्यशास्त्रम्
आवेष्टन (हाथों का पारस्परिक लपेटना) तथा उद्वेष्टन गति युक्त कर ले,
फिर बाएं हाथ को कटि प्रदेश पर रखे और दाहिने हाथ को 'आवर्तित'
गति में रखे, फिर दाहिने हाथ को कटि पर रखे और बाएं हाथ क्रमशः
(पर्याय में) गोल घुमाव लेते हुए रखने तथा आवर्तित चारी में स्थित
रहने पर 'समोत्सारित' मण्डल हो जाता है ॥ ५१-५३ ॥
पादैस्तु भूमिसंयुक्तैः सूचीविद्धैस्तथैव च ।
एलकाक्रीडितैश्चैव $^१$तूर्णैस्त्रिकविवर्तनैः ॥ ५४ ॥
सूचीविद्धापविद्धैश्च क्रमेणावृत्य मण्डलम् ।
एलकाक्रीडितं विद्यात् खण्डमण्डलसंज्ञितम् ॥ ५५ ॥
एलकाक्रीडित—यदि दोनों सम पैरों को पृथ्वी पर टिकाकर फिर 'सूची'
तथा एलकाक्रीडिल चारी को प्रदर्शित करे फिर शीघ्र भ्रमरी चारी का प्रदर्शन
कर त्रिक को घुमाव दे, फिर 'सूची' तथा आविद्धा (अपविद्धा) चारी को
क्रमशः गोल घुमाव देकर प्रदर्शन करे तो 'खण्डमण्डल' नाम वाला
'एलकाक्रीडित' मण्डल हो जाता है ॥ ५४-५५ ॥
सव्यमुद्धट्टितं कृत्वा तेनैवावर्त्तमाचरेत् ।
तेनैवास्कन्दितः कार्यः शकटास्यश्च वामकः ॥ ५६ ॥
आद्यः$^५$ पृष्ठोपसर्पी च स च चाषगतिर्भवेत् ।
अड्डितँश्च पुनर्वाम आद्यश्चैवापसर्पितः ॥ ५७ ॥
वामो भ्रमरकः कार्य आद्य$^७$ आस्कन्दितो भवेत् ।
तेनैवास्फोटनं कुर्यादेतदड्डितमण्डलम् ॥ ५८ ॥
अड्डित—यदि दाहिने पैर को 'उद्घाट्टित' लक्षण के अनुसार घुमावे
फिर (इसी के अनुसार) एक सामान्य गोल घुमाव ले और फिर उसी
पैर को 'आस्यन्दिता' चारी के अनुसार घुमावे तथा बाएं पैर से शकटास्या
चारी का, फिर दाहिने पैर को पीछे की ओर क्रमशः अपक्रान्ता (अपसर्पी)
चारी के अनुसार तथा चाषगति चारी के अनुसार ले जाए, फिर बायां
पैर अड्डिता चारी में तथा दाहिना पैर 'अपक्रान्ता' चारी में रखे, फिर
१. तूर्णेत्रिक—ग०। २. विवर्तनम्—ख० । ३. पविद्धश्च—ग० ।
४. वावृत्त—ख० । ५. आद्यपृष्ठा—ख० ।
६. इतः प्रभृति सार्धश्लोकद्वयं ग०-पुस्तके नास्ति ।
७. आद्यश्चास्कन्दितो—ख० । ८. दड्डित—ख० ।