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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 668 में से

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पृष्ठ 228

द्वादशोऽध्यायः ११७
स्पन्दिता चारी (आस्पन्दिता) तथा दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता का (फिर)
बाएँ पैर द्वारा 'सूचीचारी' तथा दाहिने पैर से अपक्रान्ता चारी का, फिर
बाएँ पैर से भुजंगत्रासिता चारी तथा दाहिने पैर से 'अतिक्रान्ता' का
फिर दाहिने पैर से उद्वृत्ता चारी का तथा बाएँ पैर से 'अलाताचारी' का,
फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता चारी तथा बाएँ से सूची का, फिर दाहिने
पैर से 'विक्षिप्ता (व आक्षिप्ता) चारी का तथा बाएँ से अपक्रान्ता चारी
का (फिर बाहरी ओर से भ्रमरी तथा आक्षिप्ता चारी का) प्रदर्शन करे तो
'विचित्र' नामक मण्डल कहलाता है ॥ ११-१४ ॥
कृत्वोर्ध्वजानु चरणमाद्यं सूचीं प्रयोजयेत् ॥ १४ ॥
अपक्रान्तः पुनर्वाम आद्यः पार्श्वगतो भवेत् ।
वामं² सूचीं पुनर्द्यात् त्रिकञ्च परिवर्तयेत् ॥ १५ ॥
[ पार्श्वक्रान्तं पुनश्चाद्यमतिक्रान्तञ्च वामकम् ।
सूचीमाद्यक्रमं³ कृत्वा ह्यपक्रान्तञ्च वामकम् ॥ ]
पार्श्वक्रान्तं पुनश्चाद्य⁴मतिक्रान्तञ्च वामकम् ॥ १६ ॥
परिच्छिन्नञ्च कर्तव्यं बाह्यभ्रमरकेण वै⁵ ।
एष चारीप्रयोगस्तु कार्यो ललितसञ्चरे⁶ ॥ १७ ॥
ललितसंचर—यदि दाहिना पैर अपनी जंघा को ऊपर उठाकर 'सूची'
का (प्रदर्शन करे) और बांया पैर 'अपक्रान्ता' का तथा दाहिना पैर
'पार्श्वक्रान्ता' का, (फिर) बांया पैर 'सूची' चारी का प्रदर्शन कर भ्रमरी
चारी का प्रदर्शन करे (भ्रमरी चारी के समय पीठ को एक घुमाव देना
चाहिए) (प्रक्षिप्त—फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता तथा बाएं से
अतिक्रान्ता का फिर दाहिने पैर से 'सूची' तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता
का) फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता चारी
को प्रदर्शित कर उसे भ्रमरी चारी में परिवर्तित (परिच्छिन्न) करे तो
'ललितसंचर' मण्डल बन जाता है ॥ १६-१७ ॥
१. कृत्वोर्ध्वंवामचरण—ख०ग०। २. वामसूचीं—ख०ग०।
३. सूचीवामक्रमं—ख०ग०।
४. पुनश्चान्यो वामोऽतिक्रान्त एव च—ख०-ग०।
५. हि—ख०-ग०। ६. सञ्चरैः—ख०-ग०।

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