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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 668 में से

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पृष्ठ 229

११८ नाट्यशास्त्रम्
सूचीं वामपदं दद्यात् त्रिकञ्च परिवर्तयेत्।
पार्श्वक्रान्तः पुनश्चाद्यो वामोऽतिक्रान्त एव च ॥ १८ ॥
सूचीमाद्यं पुनर्दद्यादपक्रान्तश्च वामकम्।
पार्श्वक्रान्तं पुनश्चाद्यं सूचीविद्धे तु मण्डले ॥ १९ ॥
सूचीविद्ध—यदि बाएं पैर से 'सूची' को प्रदर्शित कर भ्रमरी चारी को
प्रदर्शित करे (अर्थात् शरीर को घुमाव दे दे) फिर दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता
चारी का, बाएं पैर से अतिक्रान्ता चारी का, फिर दाहिने पैर से 'सूची'
चारी का और बाएं पैर से अपक्रान्ता चारी का तथा दाहिने पैर से भी
अपक्रान्ता चारी का प्रदर्शन करे तो 'सूचीविद्ध' मण्डल जानो ॥ १८-१९ ॥
आद्यस्तु जनितो भूत्वा स च दण्डक्रमो भवेत्।
वामं सूचीं पुनर्दद्यात् त्रिकञ्च परिवर्तयेत् ॥ २० ॥
उँद्वृत्तो दक्षिणश्च स्यादलातश्चैव वामकः।
पार्श्वक्रान्तः पुनश्चाद्यो भुजङ्गत्रासितस्तथा ॥ २१ ॥
अतिक्रान्तः पुनर्वामो दण्डपादस्तु दक्षिणः।
वामः सूची त्रिकावर्तो दण्डपादे तु मण्डले ॥ २२ ॥
दण्डपाद—यदि दाहिना पैर जनिताचारी प्रदर्शित कर दण्डपादा चारी
को प्रदर्शित करे फिर बाये पैर से 'सूची' को प्रदर्शित कर भ्रमरी चारी को
प्रदर्शित किया जाए। फिर दाहिने पैर से उद्वृत्ता चारी का, बाएं पैर से
अलाता चारी का, दाहिने पैर से पार्श्वक्रान्ता चारी को, दाहिने पैर से ही
दण्डपादा चारी को तथा बाएं पैर से सूची को प्रदर्शित कर त्रिक को
घुमाव दे कर भ्रमरी चारी को प्रदर्शित करे तो 'दण्डपाद' मण्डल
हो जाता है ॥ २०-२२ ॥
आद्यन्तु जनितं कृत्वा तेनैव च निकुट्टकम्।
आस्पंदितंश्च वामेन ह्युद्वृत्तं दक्षिणेन च ॥ २३ ॥
अलातं वामकं पादं सूचीं दद्यात्तु दक्षिणम्।
पार्श्वक्रान्तः पुनर्वाम आक्षिप्तो दक्षिणस्तथा ॥ २४ ॥
१. श्चान्यो—ख० ग० । २. एतत् पद्यार्धं ख-पुस्तके नास्ति ।
३. तद्वतो—ख० । ४. तद्ववृत्तो—ख०, उद्वर्तो-ग० ।
५. श्चान्यः—ग०। ६. निकुट्टनम्—ख०-ग० ।
७. आस्कन्दितञ्च—ख०-ग० । ८ ह्युत्तम्भं—ख०; उद्धृतं-ग० ।
९. क्रान्तं—ख०-ग०।