नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ नाट्यशास्त्रम्
का तथा बाएं पैर से भी इसी चारी का प्रदर्शन कर फिर दोनों भुजंगत्रासिता
चारी वाले पैर वर्तुलाकार गति में घूमते हुए रखे तो इस चारी मण्डल को
'पिष्टकुट्ट' जानों। इसे भी युद्ध प्रदर्शन में प्रयुक्त किया जाए ॥ ६३-६४ ॥
सर्वैश्चाषगतैः पादैः परिक्रम्य१ च मण्डलम् ।
एतच्चाषगतं विद्यान्नियुद्धे चापि२ मण्डलम् ॥ ६५ ॥
चाषगत—यदि 'चाषगत' चारी के पादों से गोल घुमाव लेकर मण्डल
बनाए तो इसे चाषगत नामक मण्डल जानों। इसकी बाहुयुद्ध में योजना
की जाए ॥ ६५ ॥
नानाचारीसमुत्थानि मण्डलानि समासतः ।
उक्तान्यतः परंश्चैव समचारीं३ नियोजयेत् ॥ ६६ ॥
समचारी-प्रयोगो यस्तत् समं नाम मण्डलम् ।
आचार्यबुद्ध्या तानीह कर्तव्यानि प्रयोक्तृभिः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार अनेक चारियों के द्वारा निर्मित इन 'मण्डलों' को मैंने
संक्षेप में बतलाया। अब 'समचारी' मण्डल के बारे में सुनिये ।
जिसमें सम चारियों का निरन्तर प्रयोग हो उसे 'सम (चारी) मण्डल'
जानों। नाट्याचार्य द्वारा निर्देशित विधाओं के अनुसार इनका प्रयोग
किया जाए ।
एतानि खण्डानि समण्डलानि युद्धे नियुद्धे च परिक्रमे च ।
लीलाङ्कमाधुर्यपुरस्कृतानि कार्याणि वाद्यानुगतानि तज्ज्ञैः ॥ ६८ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे मण्डलविकल्पनं नाम द्वादशोऽध्यायः४
इस प्रकार इन मण्डलों को युद्ध, बाहुयुद्ध तथा घूमने में लीलापर्ण,
तथा सुमधुर अंगों का प्रदर्शन करते हुए प्रदर्शित किया जाए तथा वाद्यों
की संगत के साथ इनका प्रदर्शन रखे ॥ ६८ ॥
भरतनाट्यशास्त्र का मण्डल विधान नामक द्वादश अध्याय समाप्त
१. परिभ्राम्य—ग० । २. चारिमण्डलम्—ग० ।
३. समचारीणि योजयेत्—ग० । ४. एकादशोऽध्यायः—क० ।