नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० नाट्यशास्त्रम्
पात्रों की गति (उनकी स्थिति के अनुसार) स्थित, मध्य तथा द्रुत
लय में रखनी चाहिए। इन विविध लयों की नाट्याचार्य स्वयं
औचित्यानुसार (पात्रों में) योजना करे ॥ १२ ॥
स्थैर्योपपन्ना¹ गतिरुत्तमानां
मध्या गतिर्मध्यमसम्मतानाम्² ।
द्रुता गतिश्च प्रकृताधमानां³
लयत्रयं सत्त्ववशेन योज्यम् ॥ १३ ॥
उत्तम पात्रों की गति (चार कला या) स्थित लय में, मध्यम पात्रों की
(दो कला या) मध्यलय तथा अधम पात्रों की (एक कला या) द्रुत लय
में उनके सामर्थ्यानुसार संयोजित करना चाहिए ॥ १३ ॥
एष एवं⁴ तु विज्ञेयः कलाताललये विधिः ।
पुनर्गतिप्रचारस्य⁵ प्रयोगं शृणुतानघाः ॥ १४ ॥
इस प्रकार पात्रों के गति में होनेवाले ताल, लय तथा कला के नियम
मैंने बतलाए। अब मैं (विभिन्न पात्रों के उपयुक्त) गतियों के विशिष्टलक्षण,
योजना आदि को बतलाता हूँ ॥ १४ ॥
स्वाभाविक गति—
स्वभावे⁶ तूत्तमगतौ कार्यं⁷ जानु कटीसमम् ।
युद्धचारीप्रयोगेषु पुनस्तनसमं⁸ न्यसेत् ॥ १५ ॥
उत्तम पात्र की स्वाभाविक गति में घुटने को कमर के बराबर रखा
जाए तथा युद्ध में प्रयुक्त चारी (के समय) घुटने को छाती के सामने तक
(उठा कर) ले जाया जाए ॥ १५ ॥
पाश्र्वक्रान्तैः सललितैः पादैर्वाद्यान्वितैरथ ।
रङ्गकोणोन्मुखं¹⁰ गच्छेत् सम्यकपञ्चपदानि तु ॥ १६ ॥
१. धैर्येपपन्ना—क०; ग० । २. संस्थितानाम्—क० ।
३. प्रचुराधमानाम्—क०, ख० । ४. एव भुविज्ञेयः—ख० ।
५. पुनर्गति प्रचारस्थ—ग० । ६. स्वभावै—क०, ग० ।
७. कार्या—क० ।
८. पुनः स्तनसमं भवेत्—ख०, जानुस्तनसमं भवेत्—ग० ।
९. पार्श्वक्रान्तैः—क० । १०. कोणोन्मुखो—क०, ग० ।