नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः १२३
पैर से स्पन्दिता-चारी का और पुनः बाएं पैर से 'शकटास्या' चारी का
प्रदर्शन कर उसे भूमि पर जोर का झटका देकर पटके तो 'आस्पन्दित'
नामक युद्ध में प्रयुक्त होने वाला मण्डल हो जाता है ॥ ४५-४७ ॥
आद्यन्तु जनितं कृत्वा वामेनं तु निकुट्टकम् ।
शकटास्यः पुनश्चाद्य³ ऊरुद्वृत्त स एव तु ॥ ४८ ॥
पृष्ठापसर्पी वामश्च स च चाषगतिर्भवेत् ।
आस्पन्दितः⁴ पुनः सव्यः⁵ शकटास्यश्च वामकः ॥ ४९ ॥
आद्यो भ्रमरकश्चैव त्रिकन्तु परिवर्तयेत् ।
पृष्ठापसर्पी वामश्चेत्यावर्ते मण्डले भवेत् ॥ ५० ॥
आवर्त्त—यदि दाहिने पैर से जनिता चारी तथा बाएं पैर से तलसंचर
(निकुट्टन) का, फिर दाहिने पैर से शकटास्या तथा उसी से ऊरूद्वृत्ता
का, फिर पीठ को घुमाते हुए बाएं पैर से अतिक्रान्ता चारी (अपसर्पी) का
तथा 'चाषगति' चारी का, फिर दाहिने पैर से 'स्कन्दिता' चारी का तथा
बाएं पैर से शकटास्या चारी का, फिर दाहिने पैर से पीठ को चक्कर या
घुमाव देते हुए भ्रमरी चारी तथा बाएं पैर से अपक्रान्ता (अपसर्पी) चारी
को प्रदर्शित करे तो 'आवर्त्त' नामक मण्डल होता है ॥ ४८-५० ॥
⁷कृत्वादौ समपादन्तु स्थानं हस्तौ प्रसारयेत् ।
निरन्तरावूर्ध्वतला वावेष्ट्योद्वेष्ट्य चैव हि ॥ ५१ ॥
कटीतटे विनिक्षिप्य चाद्यमावर्तयेत् क्रमात् ।
यथाक्रमं पुनर्वाममावर्तेन प्रसारयेत् ॥ ५२ ॥
⁹चार्यानया च भ्रान्त्वा तु पर्यायेणाथ मण्डलम् ।
समोत्सारितमेतच्च¹⁰ ज्ञेयं व्यायाममण्डलम् ॥ ५३ ॥
समोत्सारित—सर्वप्रथम समपाद स्थान का प्रदर्शन कर दोनों हाथों
को फैलाकर उनकी हथेली ऊपर की ओर मुंह वाली रखे पुनः हाथों को
१. वामञ्चैव—ग० । २. निकुट्टनम् — ख० ।
३. इचान्यः—ग० । ४. आस्कन्दितः—ख०-ग० ।
५. सद्यः—ख०, सौम्यं—ग० । ६. पृष्ठावसपर्पी—ख० ।
७. समपादं बुधः कृत्वा स्थानं—ख०-ग० ।
८. क्रमम् — ख०-ग० । ९. चार्या चानया—ग० ।
१०. मेतत्तु कार्यं—ग० ।